भगवद्गीता 15.2
Purushottama Yoga · हिन्दी अनुवाद
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः | अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ||१५-२||
adhaścordhvaṃ prasṛtāstasya śākhā guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ . adhaśca mūlānyanusantatāni karmānubandhīni manuṣyaloke ||15-2||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि यह संसार एक विशाल और उल्टा पेड़ जैसा है जिसकी जड़ें ऊपर दिशा में (ब्रह्म या ईश्वर की ओर) हैं, जबकि शाखाएं नीचे की ओर फैली हुई हैं। इस वृक्ष के अंकुर संसारिक विषयों (इंद्रियों का सुख-दुःख) से बनते हैं और इनकी जड़ें मनुष्यों के कर्मों पर निर्भर करती रहती हैं। यह श्लोक हमें समझाता है कि इस दुनिया में बंधन कैसे पैदा होते हैं क्योंकि लोग अनायास ही इन्द्रियों की खोज में उलझे हुए आते-जाते हैं और अपनी जड़ों को नहीं पहचान पाते, जो उन्हें मोक्ष से दूर रखती हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'ज्ञान योग' और 'संख्या दर्शन' के तहत आता है जो अद्वैत वेदांत का एक केंद्रीय सिद्धांत प्रस्तुत करता है कि यह संसार (माया) ईश्वर की सृष्टि का एक विकृत रूप है। इसमें वृक्ष का रूपक 'संसासर' के बंधनों और 'पुरुषोत्तम' (परब्रह्म) को समझने के लिए उपयोग किया गया है, जो हमें बताता है कि कर्मों की जड़ें ऊपर हैं लेकिन उनकी शाखाएं नीचे की ओर फैली हुई हैं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जब अर्जुने संताप (विषाद) और निराशा की गहराई से घिरे हुए थे। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने आत्म-ज्ञान और धर्म के महत्व पर चर्चा करके अर्जुन को समझाया था कि मृत्यु के बाद भी आत्मा नहीं मरती है। अब यह दसवीं अध्याय 'पुरुषोत्तम योग' में कृष्ण संसार की वास्तविक प्रकृति का एक गहरा रूपक दे रहे हैं ताकि अर्जुन को इस दुनिया के वंचित और झूठे आकर्षणों से मुक्त कर सके।
आज के जीवन में
आज के समय में जब हमारी नौकरियों, सोशल मीडिया की पसंद या भविष्य की चिंताओं (विवशय) ने दिमाग को पूरी तरह घेर लिया है, तो यह श्लोक एक चेतावनी देता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति लगातार नई खरीदारी और स्टाटस अपडेट्स की तलाख में अपने कर्मों (अनुभव) का अनुसरण कर रहा है, तो वह हमेशा असंतुष्ट रहेगा क्योंकि यह 'उल्टे पेड़' जैसा व्यवहार उसे निरंतर चिंता और बंधन में डालता है। इसका समाधान यह समझना है कि सच्चा सुख इन बाहरी विषयों में नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की गहराई (मूल) को खोजने में है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि एक ऐसा पेड़ है जिसकी जड़े हवा में लटकी हुई हैं और शाखाएं नीचे की ओर झुकी हुई हैं। यह हमारे दुनिया के जैसे व्यवहार को दर्शाता है, जहाँ लोग बार-बार अलग-अलग चीजों (जैसे खिलौने या मिठाई) का पीछा करते रहते हैं जो कभी पूरा नहीं मिलतीं और फिर से नया पीछा शुरू कर देते हैं। अगर हम इस पेड़ की असली जड़े, यानी अच्छे काम और ईश्वर को पहचान लें, तो यह सब बंधन टूट जाएगा और मन शांत हो जाएगा।
दैनिक चिंतन
क्या आपने महसूस किया है कि आपके काम कैसे दूसरे दुख या सुख की जड़ें बन जाते हैं? यह वृक्ष हमारे अहंकार को पोषित करता है, लेकिन इसकी जड़े आपको मनुष्य लोक में कर्मों के चक्रबांध में फँसाए रखती हैं। आज आप अपनी दृष्टि ऊपर उठाकर उस पुरुषोत्तम की ओर ले जाएं जो इस वृक्ष को काटने वाला है, ताकि आप मुक्त हो सकें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने अंदर की उस 'कामवासना' वृक्ष को देखें जो नीचे-ऊपर फैला है। अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, उन मूलों (प्रायः) को काटने के लिए प्रार्थना करें जो आपको संसार में और बांधे रखते हैं।
मुख्य शिक्षाएँ
- संसारी जीवन एक पेड़ जैसा है
यह श्लोक संसार के सौंदर्य और आकर्षण को 'विशाल वृक्ष' से तुलना करता है जिसकी शाखाएँ गुणों (गुण) द्वारा बढ़ती हैं। यह दर्शाता है कि हमारा जीवन कर्मों और इच्छाओं की जटिल संरचना पर आधारित है जो नीचे-ऊपर फैली हुई है। - कर्म के मूल अविचलित रहते हैं
वृक्ष की जड़ें 'अनुसंतत' (नीचे की ओर) हैं जो कर्मों को अनुबंधित करती हैं। यह समझाता है कि प्रत्येक कार्य एक नया बंधन बनाता है, जिससे मनुष्य लोक में पुनःजन्म का चक्र चलता रहता है। - पुरुषोत्तम द्वारा वृक्ष की कटाई
इस जटिल बंधन को तोड़ने के लिए 'अस्त्र' (धनुष) का उपयोग करके इस पेड़ को काटना होगा। यह अंतिम लक्ष्य है कि हमें संसार से मोह त्यागकर परमात्मा की ओर आगे बढ़ना है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 15.3 — इस श्लोक के तुरंत बाद आता है और बताता है कि यह बंधन का प्रकृत रूप क्या नहीं है, बल्कि संसार की वास्तविक स्थिति क्या है।
- 2.47 — यह मूल सिद्धांत देता है कि कर्मफल में आसक्ति न रखकर कार्य करना चाहिए, जो इस वृक्ष से मुक्त होने की कुंजी है।
- 15.4 — यह श्लोक बताता है कि कैसे उस 'अमर धाम' तक पहुँचना संभव है, जो इस वृक्ष के ऊपर स्थित है और जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।
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