भगवद्गीता 15.3
Purushottama Yoga · हिन्दी अनुवाद
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा | अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलं असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ||१५-३||
na rūpamasyeha tathopalabhyate nānto na cādirna ca sampratiṣṭhā . aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūlaṃ asaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā ||15-3||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को संसार की असत्य प्रकृति समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि इस ब्रह्मांड के वृक्ष (अश्वत्थ) का कोई निश्चित स्वरूप नहीं है, न उसकी शुरुआत है और न ही अंत या कोई स्थिर आधार है। इस जटिल मूल वाले संसार को 'न-संलग्नता' नामक तेज धार वाला असंग के द्वारा काटना पड़ता है ताकि आत्मा मुक्त हो सके। यह श्लोक हमें सिखाता है कि दुनिया की बंधनों से निकलने का एकमात्र रास्ता साधना और वैराग्य है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) के सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करता है, जो आत्मा की चेतना और संसार की अस्थायी प्रकृति पर केंद्रित है। यह 'द्वैत' (भेदभाव) को नकारकर बताता है कि भौतिक दुनिया का कोई स्थायी रूप या आधार नहीं है और केवल ब्रह्म ही सत्य है। इसमें संसार की जड़ों से मुक्ति पाने के लिए वैराग्य (असंग) का महत्व बताया गया है, जो सांख्य दर्शन के तर्क पर आधारित है कि दुनिया माया या अज्ञान द्वारा प्रबद्ध है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत की युद्धभूमि कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश भाग है, जो अध्याय 15 में 'पुरुषोत्तम योग' का हिस्सा है। इससे ठीक पहले कृष्ण ने अपने रूप और संसार की प्रकृति के बारे में बातें शुरू की थीं, जबकि अर्जुन अभी भी युद्ध से भयभीत और संशयास्पद थे। यह श्लोक विशेष रूप से तब आता है जब कृष्ण समझा रहे हैं कि दुनिया का सुख-दुःख और बंधनों की प्रकृति अस्थायी और अनिश्चित क्यों है, ताकि अर्जुन अपने धर्म के लिए युद्ध में उतर सकें।
आज के जीवन में
मान लो आप एक नई जॉब या बिज़नेस शुरू करने का फैसला कर रहे हैं जो बहुत बड़ा रिस्क लेता है और आपको लगातार चिंता सता रही है कि 'क्या यह सफल होगा?' इस श्लोक की शिक्षा के अनुसार, आपको परिणाम (नतीजे) पर अपनी पूरी आत्मा को केंद्रित नहीं करना चाहिए। आपका काम सिर्फ उचित प्रयास करना है; नौकरियां, पैसा या स्थिति जैसे 'अश्वत्थ वृक्ष' की जड़ें हमेशा बदलती रहती हैं और इनमें कोई स्थायी सुरक्षा नहीं होती। जब आप 'न-संलग्नता' के असंग शस्त्र का उपयोग करते हैं, तो भविष्य की अनिश्चितता आपको डरा नहीं सकती और आप शांत मन से निर्णय ले पाते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम एक बहुत पुराने, घने जंगल में हो जिसके पेड़ों के फूल कभी नहीं खिलते हैं और कोई रास्ता भी नहीं दिखता। यही दुनिया की तरह है; हमें लगता है सब कुछ ठोस है लेकिन असल में यह धुंधला और बदलता रहता है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि इस जंगल से बाहर निकलने के लिए तुम्हें एक जादूई तलवार की जरूरत होगी, जिसका नाम 'न-संलग्नता' (असंग) है। जब हम किसी चीज को बहुत ज्यादा प्यार करने या डरने में फंसते नहीं हैं, तो यह तलवार जंगल के पेड़ों को काट देती है और हम आजाद हो जाते हैं।
दैनिक चिंतन
प्रिय पाठक, क्या आपने कभी महसूस किया है कि संसार के सुख और दुख हमेशा बदलते रहते हैं? गीता का यह श्लोक告诉我们 कि इस वृक्ष की कोई निश्चित जड़ या अंत नहीं है, इसलिए इसे पकड़कर रखना व्यर्थ है। जब आप अपनी आत्मा को इन परिवर्तनशील बंधनों से मुक्त करते हैं, तो आपको एक गहरी शांति और स्वतंत्रता का अनुभव होगा जो हमेशा आपके साथ रहती है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन को उस अश्वत्थ वृक्ष की भांति देखें जो संसार में जड़ों से जुड़ा है। गहरी सांस लें और आंतरिक रूप से 'असङ्ग शस्त्र' (बिना लगन का हथियार) द्वारा इन बंधनों को कटने दें, यह सोचकर कि इस वृक्ष की कोई निश्चित पहचान या अंत नहीं है।
मुख्य शिक्षाएँ
- संसार की अस्थिरता
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि संसारिक वृक्ष का कोई निश्चित आदि, अंत या स्थायी प्रतिष्ठा नहीं है। यह समझना आवश्यक है कि सभी सामग्री और संबंध क्षणभंगुर हैं और इनमें टिका होना भ्रम है। - असङ्ग शस्त्र का महत्व
कृष्ण इस विलक्षण बंधन को तोड़ने के लिए 'दृढ़ असङ्ग' (बिना लगाव) नामक हथियार की बात करते हैं। यह वह साधना है जिससे हम संसारिक आसक्तियों से मुक्त होकर परमात्मा में स्थिर होते हैं। - मूल के गहराई और प्रतीकात्मकता
अश्वत्थ वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर होती हैं, जो इस तथ्य का संकेत देती है कि इसके मूल कर्मों में छिपे होते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि दुनिया के बंधन अज्ञान और वासनाओं से उत्पन्न होते हैं जिन्हें ज्ञान द्वारा काटना आवश्यक है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — इस अध्याय का प्रस्तावना है जो कर्म योग की मूल बात समझाता है, अर्थात फल के आशा छोड़कर कार्य करना।
- 3.6 — असङ्ग और संयम का महत्व बताता है कि कैसे एक व्यक्ति अपने इंद्रियों को नियंत्रित करके जीवन जी सकता है।
- 12.15 — जो सभी से प्रिय हैं और जो दुख-सुख में सम रहते हैं, वे परमात्मा के निकटतम होते हैं; यह असङ्ग की प्राप्ति का फल है।
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