भगवद्गीता 5.3
Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति | निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ||५-३||
jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati . nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhātpramucyate ||5-3||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि सच्चा संन्यासी वही है जो न किसी से घृणा करता है और न ही किसी की आकांक्षा या इच्छा रखता है। यह श्लोक बताता है कि यदि कोई व्यक्ति दुनिया के दो ध्रुवों (सुकह-दुःख, लाभ-हानि) से मुक्त रहकर जीता है, तो वह अपने कर्मों और मनोवालों की जंजीरों में बंधा नहीं होता। अंततः, द्वंद्वों के बिना जीवन जीने वाला व्यक्ति सहज ही आत्मिक बाधाओं या मोक्ष से निकल जाता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्मा योग' और 'ज्ञान योग' की संकरी धाराओं को जोड़ता है, जहाँ यह स्पष्ट करता है कि वास्तविक मुक्ति केवल आश्रमों या कपड़ों में नहीं बल्कि मन के स्वभाव में निहित है। इसमें 'निर्द्वंद्व भाव' (जो युग्म-विरोधों से रहित हो) को उच्चतम योग की परिपूर्णता माना गया है, जो सांख्य दर्शन और कर्मयोग का सामान्य आधार है कि अंतःकरण के शांतिपूर्ण होने पर ही आत्मज्ञान संभव होता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया एक संदेश है, जहाँ पांडवों और कौरवों के बीच भीषण संघर्श होने वाला था। इससे ठीक पहले, जब अर्जुन ने युद्ध करने से इनकार कर दिया था और गुरु द्रोणाचार्य की ओर देखकर रो रहे थे, तब कृष्ण ने उन्हें ज्ञान का मार्ग दिखाया। 'कर्मा संन्यास योग' के इस अध्याय में, कृष्ण अर्जुन को यह स्पष्ट कर रहे हैं कि शारीरिक गृहस्थी त्यागना ही सच्चा संन्यास नहीं है, बल्कि मन से वासना और द्वेष का त्याग करना ही असली योग है।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप अपने ऑफिस में एक कठिन प्रोजेक्ट के लिए जवाबदेह हैं और आपके सहकर्मी उसमें विफल हो गए हैं, जिससे आप बहुत नाराज (द्वेष) या घबराए हुए हैं। इस स्थिति में, यदि आप किसी को दोष नहीं देते और 'क्या होता अगर मैं जीत जाता' की अत्यधिक आकांक्षा भी त्याग देते हैं, तो आप तनाव से मुक्त होकर निर्णय ले पाएंगे। यह दृष्टिकोण न केवल आपके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है बल्कि आपको परिस्थितियों पर नियंत्रण रखने में सक्षम करता है ताकि आप बिना किसी आंतरिक द्वंद्व के कार्य कर सकें और अपने कर्तव्य का पालन कर सकें।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम्हारे दोस्त और खेल के साथी एक-दूसरे को पसंद भी करते हैं और कभी-कभी झगड़ते भी हैं, लेकिन अगर कोई बच्चा न तो किसी से गुस्सा करता है और न ही सिर्फ उस चीज़ की इच्छा रखता है जो दूसरों के पास है, तो वह बहुत खुश रह सकता है। जैसे एक पक्षी बिना किसी को डांटने या ललचाने के आसमान में उड़ता है, वैसे ही हम भी जब नफ़रत और अत्यधिक चाहत छोड़ देते हैं, तो मन शांत हो जाता है। कृष्ण कह रहे हैं कि जो ऐसे स्वभाव का होता है, वह असली 'अभ्यासी' या संन्यासी बनता है क्योंकि उसका दिमाग हल्का रहता है और उसे डर नहीं लगता।
दैनिक चिंतन
आपके भीतर अक्सर एक शोर होता है जो दूसरे से नफरत करने या किसी चीज़ को पा लेने की आकांक्षा में डुबो देता है, लेकिन कृष्ण आज आपको बताते हैं कि सच्चा शांत वही है जो इन दोनों विपरीत भावनाओं से मुक्त हो। जब आप प्रेम और द्वेष के बीच का संघर्ष बंद कर देंगे, तो जीवन की बाधाएं अपने आप हटने लगेंगी और मन को एक गहरा सुख अनुभव होगा। कल तक जो आपको परेशान करता था या जिसका अभाव आपके लिए दर्द बन गया है, आज उसे त्यागकर आप स्वतंत्रता का स्वागत करेंगे।
आज के लिए एक अभ्यास
आज की साधना में मन को इस बात पर केंद्रित करें कि आप किसी से द्वेष क्यों कर रहे हैं और किस चीज़ के लिए लालायित होकर त्रस्त रहते हैं। स्वस्थ रूप से बैठ जाएं, गहरी श्वास लें और मानसिक रूप से उन सभी वासनाओं को त्याग दें जो आपको बंधन में बांधे रखती हैं, यह समझते हुए कि सच्चा संन्यासी वही है जो इन द्वंद्वों के पार होकर जीता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- सच्चा संन्यासी कौन है?
शरीर से वस्त्र न छोड़ने वाले ही सत्य में नहीं, बल्कि मन से द्वेष और आकांक्षा को त्याग देने वाला पुरुष वास्तविक 'सदा-सन्न्यारी' होता है। यह शिक्षण स्पष्ट करता है कि बाह्याचरणों की तुलना में आंतरिक भावात्मक मुक्ति ही संन्यास का मूल स्वरूप है। - द्वंद्वों से मुक्ति
धर्म और अधर्म, सुख और दुःख जैसे द्वंद्व (विपरीत ध्रुव) मानसिक बंधन बनाते हैं; जो व्यक्ति इनसे रहित होता है वह स्वयं ही बंधनों को तोड़ देता है। यह 'निर्द्वंद्व' अवस्था आत्म-ज्ञान की ओर पहला और महत्वपूर्ण कदम है। - सुख में रहते हुए भी मुक्ति
जब कोई व्यक्ति द्वेष नहीं करता और न ही किसी वस्तु के लिये इच्छा रखता है, तो वह तुरंत बंधन से प्रमुक्त होकर सहज सुख का अनुभव प्राप्त कर लेता है। यह सिद्ध करता है कि बाहरी परिस्थितियों में बदलाव की आवश्यकता नहीं, बल्कि आंतरिक दृष्टि परिवर्तन ही मुक्ति के लिए पर्याप्त है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.15 — इस श्लोक में 'द्वंद्वों' के अभाव और उससे उत्पन्न सुख की गहराई पर चर्चा है, जो वर्तमान श्लोक का सीधा विस्तार करता है।
- 5.21 — यह श्लोक 'निष्काम कर्म' और मन की स्थिरता पर बताता है कि कैसे द्वंद्वों से रहित होकर आत्म-सुख प्राप्त किया जा सकता है।
- 13.24 — यहाँ 'ज्ञान योग' के माध्यम से बंधनों को तोड़ने और परमात्मा (ब्रह्मान) की प्राप्ति का वर्णन है, जो संन्यास का अंतिम लक्ष्य दर्शाता है।
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