भगवद्गीता 13.24
Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह | सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ||१३-२४||
ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha . sarvathā vartamāno.api na sa bhūyo.abhijāyate ||13-24||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो मनुष्य पुरुष (आत्मा) और प्रकृति (संसार/शरीर) तथा उनके गुणों का सही ज्ञान रखता है, उसे पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता। यह श्लोक बताता है कि भले ही व्यक्ति इस संसार में सभी प्रकार के कार्य करता रहे और जीवन जीए, लेकिन जब तक वह आत्मा को प्रकृति से अलग समझकर जान लेगा, तब तक उसका बंधन टूट जाएगा। मुख्य शिक्षा यह है कि ज्ञान की प्राप्ति होने पर पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है और व्यक्ति मोक्ष की स्थिति में पहुँचता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक सांख्य दर्शन और ज्ञान योग के सिद्धांत पर आधारित है जो आत्मा (पुरुष) को प्रकृति से पूर्णतः भिन्न बताता है। इसमें 'अभेद' की अवधारणा विकसित होती है कि जब पुरुष अपने आप में शुद्ध और निष्क्रिय होने का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो वह गुणों के प्रभाव (गुण-कर्म) से मुक्त हो जाता है। यह भक्ति योग या कर्म योग की अंतिम स्थिति को दर्शाता है जहाँ कार्यशील रहते हुए भी व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करके संसार चक्र से बाहर निकल जाता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जो गीता के तेरहवें अध्याय 'क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग' का हिस्सा है। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने अर्जुन को शरीर (क्षेत्र) और उसका ज्ञाता (पुरुष/आत्मा) के बीच के भेद की गहन व्याख्या दी थी। अर्जुन युद्ध के भार से टूटा हुआ था और इस समय उसे आत्म-ज्ञान का सही समझने में कठिनाई हो रही है, इसलिए कृष्ण उन्हें बता रहे हैं कि यह ज्ञान प्राप्त करने पर जीवन की सबसे बड़ी समस्या—पुनर्जन्म—कैसे समाप्त होती है।
आज के जीवन में
आज के तनावपूर्ण करियर में जब आप किसी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट या परिवारिक संघर्ष का सामना करते हैं, तो अक्सर हम खुद को उस समस्या से एक कर देते हैं और डरकर भागने की सोचते हैं। इस श्लोक के अनुसार, आपको यह समझना चाहिए कि आप वह 'कर्म' (प्रोजेक्ट/संघर्ष) नहीं हैं जो चल रहा है, बल्कि आप वह साक्षी आत्मा हैं जो इसे देख रही है। जब आप काम करते हुए भी अपने अस्तित्व को उस समस्या से अलग रखते हैं और जान लेते हैं कि यह केवल प्रकृति का खेल (गुणों की क्रिया) है, तो आपके मन में कोई चिंता या डर नहीं रहेगा और आप शांत रहेंगे।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम्हारा शरीर एक कार्टून कैरेक्टर है जो स्कूल या खेल के मैदान में बहुत मज़े से नाटक कर रहा है, लेकिन असली तुम (तुम्हारी आत्मा) उसका डायरेक्टर हो। जब तक तुम्हें यह नहीं पता चलता कि 'यह शरीर सिर्फ एक कपड़ा है और मैं हूँ', तब तक तुम बार-बार नए कैरेक्टर्स बनने के लिए जन्म लेते रहोगे, जैसे बच्चों की कहानियों में दोहराव हो। लेकिन जब तुम्हें समझ आ जाता है कि असली तुम अलग हो और यह शरीर सिर्फ एक वेशभूषा है, तो तुम इस 'खेल' से मुक्त हो जाते हो और अब कभी भी नया जन्म नहीं लेना पड़ता।
दैनिक चिंतन
प्यारे मित्र, क्या आप कभी महसूस करते हैं कि आपकी परिस्थितियाँ और भावनाएँ आपको घेर लेती हैं? आज भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि आप वह 'प्रश्न' नहीं हैं जो बदलता है, बल्कि वह गवाह पुरुष हैं जो इन सभी परिवर्तनों के बावजूद अटूट रहता है। चाहे जीवन आपको कितना भी चुनौतीपूर्ण लगे, यह ज्ञान आपकी आत्मा को उस निरंतर प्रवाह से मुक्त कर देगा जिससे पुनःजन्म का बंधन टूट जाता है।
आज के लिए एक अभ्यास
इस क्षण अपने भीतर 'क्षेत्र' (शरीर और मन) को देखें, जो गत गुणों से घिरा हुआ है। इस निश्चल 'पुरुष' के रूप में स्वयं को पहचानें जो इन सभी बदलावों का साक्षी मात्र है। जब आप हर स्थिति में सक्रिय रहते हुए भी अंदर से निर्लिप्त बने रहें, तो जन्म-मरण की चक्र से मुक्ति का अनुभव होता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद ज्ञान
यह समझना आवश्यक है कि शरीर, मन और बुद्धि 'प्रकृति' के गुणों से बने हैं जो बदलते रहते हैं। जब हमारा चेतन स्वरूप या पुरुष इनके साथ मिलकर भी अलग पहचान रखता है, तो वह ज्ञान ही मुक्ति का द्वार है। - सर्वथा वर्तमान होने पर भी निरपेक्ष
योगी को घर या संसार में सक्रिय रूप से रहना चाहिए और कर्म करना चाहिए, लेकिन उसे यह नहीं लगना चाहिए कि वह उस कार्य का फल है। जब कोई व्यक्ति गुणों के सहित व्यवहार करता हुआ भी अंतरात्मा में स्थिर रहता है, तो उसे नया जन्म नहीं मिलता। - जन्म-मरण चक्र से मुक्ति
यह श्लोक स्पष्ट रूप से बताता है कि केवल कर्म करने या त्याग करने से मोक्ष नहीं, बल्कि 'पुरुष' और 'प्रकृति' का सही ज्ञान ही अंतिम लक्ष्य है। यह साक्षात्कार व्यक्ति को पुनःजन्म की प्रक्रिया से बाहर निकाल देता है क्योंकि वह अब गुणों के अधीन नहीं रहता।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — कर्म का फल त्यागने और कर्तव्य पालन करने के इस सिद्धांत को समझना यह श्लोक की व्याख्या के लिए मूलभूत है।
- 13.20 — इससे पहले प्रकृति और पुरुष के अंतराल का विस्तृत वर्णन मिलता है जो इस श्लोक की नींव बनाता है।
- 8.16 — पुनःजन्म से मुक्ति और परमात्मा में लीन होने के बाद नई अवस्था को समझने हेतु यह श्लोक उपयुक्त है।
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