भगवद्गीता 5.4
Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः | एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ||५-४||
sāṅkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ . ekamapyāsthitaḥ samyagubhayorvindate phalam ||5-4||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि सांख्य योग (ज्ञान का मार्ग) और कर्म योग (कर्म करने का मार्ग) दो अलग-अलग रास्ते नहीं हैं। मूर्ख या बालबुद्धि वाले लोग इन्हें भिन्न मानते हैं, लेकिन बुद्धिमान पुरुष इन दोनों में से किसी एक को भी सही ढंग से अपना लेता है तो उसे दोनों का फल प्राप्त हो जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अगर आप कर्मयोगी बनकर निष्काम भाव से कार्य करते हैं, तो वह स्वतः ज्ञान की प्राप्ति में मदद करता है और वही आध्यात्मिक परिणाम देता है जो संन्यास या केवल ज्ञान मार्ग का होता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भगवद गीता के सिद्धांत को कर्म योग (Yoga of Action) और ज्ञान योग (Jnana Yoga) की अविभाज्य एकता पर जोर देकर विकसित करता है। यह 'अभेद' (non-duality) का दर्शन प्रस्तुत करता है कि बाहरी कार्यों के त्याग से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक नैष्कर्म्य या कर्तराही भाव में स्थिरता प्राप्त करना है, जो दोनों मार्गों को एक ही सिंथेसिस (समन्वय) में ला देता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा गया है, जहाँ अर्जुन ने गंभीर संदेह और दुख की स्थिति में अपने युद्ध छोड़ने का विकल्प चुना था। इससे ठीक पहले कृष्ण ने 'संन्यास' (त्याग) के महत्व पर बात शुरू की थी, जिसके बाद अर्जुन को लगा कि उसे संसार त्यागकर जंग नहीं लड़ना चाहिए और न ही कार्य करना चाहिए। यह स्थिति तब है जब अर्जुन कर्मों से बचने का रास्ता ढूंढ रहा है और कृष्ण उन्हें बता रहे हैं कि बाहरी आश्रम या कार्य छोड़ने की परिभाषा नहीं, बल्कि मन के त्याग में ही सच्चा योग है।
आज के जीवन में
आजकल एक व्यावसायिक दबाव का सामना करने वाले व्यक्ति को अक्सर लगता है कि उसे अपनी नौकरी छोड़कर ध्यान या साधु-सत्तों के पास जाने से ही आत्मिक शांति मिलेगी। इस श्लोक की प्रेरणा यह देती है कि बिना नौकरी छोड़े, अगर वह अपने कार्यों को कर्तव्य मान कर और फल की चिंता किए बगैर (निष्काम भाव) करता है, तो उसे वही शांति मिल जाएगी जो एक संन्यासी को मिलती। इस प्रकार, आप अपने वर्तमान दायित्वों में ही 'योग' का अनुभव कर सकते हैं और मानसिक तनाव से मुक्ति पा सकते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करें कि स्कूल जाने के दो तरीके हैं: एक सिर्फ पढ़कर, दूसरा खेल-खेल में सीखकर। कुछ बच्चे सोचते हैं कि इन दोनों को अलग करना होगा, लेकिन समझदार बच्चा जानता है कि अगर वह किसी भी एक तरिके से पूरे मन और ध्यान के साथ काम कर देगा, तो उसे अच्छे नंबर आने का फल दोनों तरीकों से मिल जाएगा। असली बात यह नहीं है कि आप क्या करते हैं (पढ़ना या खेलना), बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि आप उसमें अपने सारे दिल-से लगाकर कैसे काम करते हैं।
दैनिक चिंतन
मित्र, अक्सर हम सोचते हैं कि या तो हमें घर से निकलकर संन्यासी बनना चाहिए या फिर गृहस्थ जीवन में ही रहना चाहिए; लेकिन भगवान कृष्ण बता रहे हैं कि यह बालबुद्धि का विचार है। जब आप अपनी बुद्धि को स्थिर करके किसी एक मार्ग, चाहे वह ज्ञान हो या कर्मयोग, पर पूर्ण विश्वास के साथ चलते हैं, तो दोनों में निहित समग्र फल आपको मिल जाता है। यह आश्वसन देता है कि आपके वर्तमान कार्यस्थल पर ही आप इस संपूर्ण शांति और सिद्धि को पा सकते हैं यदि आपका दृष्टिकोण शुद्ध हो।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए, यह विचार करें कि सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म) दो अलग-अलग रास्तों की भाँति नहीं हैं, बल्कि एक ही सत्य के दो पहलू हैं। जब आप अपने कर्तव्यों को निष्फल होकर करते हुए भी उनके फलों में आसक्त नहीं रहते हैं, तो वास्तव में दोनों का सम्यक अनुभव होता है। इस एकाग्रता में स्थिर हों और देखें कि कैसे एक ही क्रिया ज्ञान और कर्म दोनों के पारिपक्व को लाती है।
मुख्य शिक्षाएँ
- ज्ञान और कर्म का अद्वैत स्वरूप
पांडित्यवान (पंडित) लोग समझते हैं कि सांख्य योग और कर्मयोग एक दूसरे से विरोधी नहीं बल्कि परस्पर पूरक हैं। जो व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक को गहराई से अंगीकार करता है, उसे वास्तविकता का वह संपूर्ण फल प्राप्त होता है जो अन्यथा केवल संयोजन द्वारा ही मिल सकता था। - बालबुद्धि बनाम पंडित बुद्धि
भगवान कृष्ण उन लोगों को 'बाळा' (बच्चे) कहते हैं जो सत्यों के सूक्ष्म अंतरों और उनकी एकता को नहीं समझ पाते। यही कारण है कि वे ज्ञान और कर्म को विभाजित देखकर भ्रमित होते हैं, जबकि वास्तविक पंडित इन दोनों का एकीकृत स्वरूप देख लेते हैं। - सम्यक् स्थिति की शक्ति
'एकम् अपि आस्थितः' (कोई एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थिर) होने का तात्पर्य है कि पूर्ण समर्पण और एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। जब मन किसी एक मार्ग पर पूरी तरह केंद्रित हो जाता है, तो वह स्वाभाविक रूप से उसकी सभी गहराइयों को अनुभव कर लेता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — इस अध्याय की शुरुआत में कर्मयोग के मूल सिद्धांत को समझने के लिए जो यह स्पष्ट करता है कि आपको अपने कर्त्तव्य पर अधिकार है, न कि फल पर।
- 3.30 — कर्मों को ईश्वर में अर्पित करने का एक और गहरा विवरण जो कर्मयोग के व्यावहारिक पहलू को सांख्य ज्ञान से जोड़ता है।
- 12.15 — उस पुरुष का वर्णन करता है जो सभी भक्तों में प्रिय है और कर्मयोग के परिपक्व फल को प्राप्त कर चुका होता है, जो ज्ञान और कर्म की एकता का पराकाष्ठा है।
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