भगवद्गीता 4.20

Jnana Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 4.20 — "जो पुरुष,  कर्मफलासक्ति को त्यागकर,  नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते ह"
भगवद्गीता 4.20 — Jnana Karma Sanyasa Yoga
संस्कृत

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः | कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ||४-२०||

लिप्यंतरण

tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ . karmaṇyabhipravṛtto.api naiva kiñcitkaroti saḥ ||4-20||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जो व्यक्ति कर्म के फल में लगने वाला आसक्ति त्याग देता है और स्वयं को सर्वत्र संतुष्ट (नित्यतृप्त) व किसी बाहरी सहारे पर निर्भर रहित (निराश्रय) मान लेता है, वह भले ही कर्मों में व्यस्त रहे, लेकिन आत्मा के स्तर पर उसका कोई नया कर्म नहीं होता। यह श्लोक 'ज्ञान' और 'कर्म सन्यास योग' का मूल सिद्धांत प्रस्तुत करता है कि बाहरी क्रियाएं होते हुए भी मन अंतरंगता से मुक्त रहना ही असली निष्क्रियता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्मा योग' (Karma Yoga) की मूल अवधारणा को विकसित करता है, जहाँ अर्थात् कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्म के फल में आसक्ति का त्याग किया जाता है। यह 'ज्ञान योग' और 'वैराग्य' के सिद्धांतों पर आधारित है कि जो व्यक्ति अपनी आत्म-स्वरूप (आत्मा) को सर्वत्र संतुष्ट जानता है, उसे बाहरी कर्म उसके अस्तित्व में कोई नया बोझ नहीं डालते।

शब्दार्थ
त्यक्त्वा having abandoned, कर्मफलासङ्गम् attachment to the fruits of action, नित्यतृप्तः even content, निराश्रयः depending on nothing, कर्मणि in action, अभिप्रवृत्तः engaged, अपि even, न not, एव verily, किञ्चित् anything, करोति does, सः he
पारंपरिक भाष्य
The same idea of inaction in action is repeated here to produce a deep impression on the minds of the aspirants. He who works for the wellbeing of the world and he who performs actions without egoism and attachment for the fruits, to set an example to the masses, really does nothing at all though he is ever engaged in activity, as he possesses the knowledge of the Self which is beyond all activity and as he has realised his identity with It. As Brahman the Absolute is selfcontained, all the desires are gratified if one realises the Self. He is ever satisfied and does not depend on anything, just as a man who has the favour of the king does not depend on the minister or the government official for anything. (Cf. IV.41)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश भाग है, जहाँ कौरवों की सेना का सामना करने वाला अर्जुन अपने ही बंधुओं और गुरुजनों पर धनुष नहीं चलाने के कारण विक्षिप्त होकर बैठ गए थे। इससे पहले श्री कृष्ण ने 'ज्ञान' (विद्या) और 'कर्म सन्यास योग' का वर्णन करके अर्जुन को यह समझाया था कि आत्मा न मरती है और कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन फल की इच्छा त्यागनी चाहिए। इस संदर्भ में श्री कृष्ण अर्जुन के मानसिक उथल-पुथल को दूर करने के लिए यह श्लोक प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि वे पूर्ण निश्चिंतता और साहस से युद्ध का मार्ग अपना सकें।

आज के जीवन में

कल्पना करें कि आप एक महत्वपूर्ण कार्य परियोजना (project) में लगे हुए हैं, लेकिन आपको इसका परिणाम या बोनस पाने की चिंता नहीं है; आप केवल अपने कर्तव्य को पूर्ण करने और प्रक्रिया का आनंद लेने पर ध्यान देते हैं। ऐसी स्थिति में भी यदि कोई विफलता हो जाती है, तो वह आपके मन को हिलाती नहीं है क्योंकि आपका संतोष बाहरी परिणामों से स्वतंत्र था। इस दृष्टिकोण के साथ काम करने वाले व्यक्ति का तनाव कभी-कभार ही होता है और वे निर्णय लेने में अधिक स्पष्टता रखते हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे एक बच्चा खेलते वक्त केवल अपनी पसंद की गेंद को देखकर नहीं, बल्कि खुशियों और दोस्तों में खोया होता है; ठीक वैसा ही सनातनी हो जाता है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि अगर तुम किसी चीज़ का फल (जैसे इनाम या तारीफ) पाने के लिए न खेलकर, बस खेलने की खुशी में खेलो और हर समय संतोषी रहो, तो तुम्हें लगेगा कि कुछ किया भी नहीं है। जब हम बिना लाइडरों या डर के काम करते हैं, तो हमारे मन का बोझ हलका हो जाता है।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप किसी कार्य को बिना फल की कामना के करते हैं तो वह आनंद में बदल जाता है? इस भगवद्गीता के वाक्य आपको याद दिलाते हैं कि जो व्यक्ति परिणाम से मुक्त होकर भी सक्रिय रहता है, वह अंततः किसी कर्म को करने वाला नहीं माना जाता। आपकी आंतरिक शांति और पूर्णता बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती; जब आप 'निराश्रय' होकर भी पूरी तरह से कार्य में लगे रहते हैं, तो वह आपके अहंकार का विनाश करता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपनी सभी प्रतीक्षाओं और परिणाम की चिंता को छोड़कर, जो कार्य आपके हाथों में है उसे पूर्ण समर्पण के साथ करें। मन को यह स्मरण दिलाएं कि आप नित्यतृप्त हैं और आपको बाहरी सहायता या आश्रय की आवश्यकता नहीं है; बस कर्म ही कर्म है, परिणाम ईश्वर पर छोड़ दें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. कर्मफलासक्ति का त्याग (Renunciation of Attachment to Results)
    यदि हम कार्य के फल में लगे रहते हैं, तो कर्म बंधन बन जाता है; इसे छोड़ना ही सच्चा त्याग है। यह नकारात्मक नहीं है बल्कि सक्रिय रूप से परिणाम की चिंता को हटाने का मार्ग है जो मन को स्थिर रखता है।
  2. नित्यतृप्त और निराश्रय अवस्था (The State of Eternal Fullness)
    आत्मा स्वयं में पूर्ण है, इसलिए उसे किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति से सहायता की आवश्यकता नहीं होती। यह आत्म-निर्भरता हमें डर और लालच से मुक्त करती है ताकि कर्म शुद्ध हो सकें।
  3. सक्रिय रहते हुए भी अकर्म (Doing Nothing While Doing Everything)
    जब कोई व्यक्ति बिना 'मैं करता हूँ' के भाव के कार्य करे, तो भौतिक रूप से वह कुछ करने वाला है लेकिन आध्यात्मिक रूप में उसे कर्म का बंधन नहीं लगता। यह दृष्टिभंग ही अकर्म की प्राप्ति है जो मनुष्य को मोक्ष के निकट ले जाती है।

विषय

कर्मयोग की परिभाषाफल त्याग का महत्वनित्यतृप्त और निराश्रयताआत्म-ज्ञान और कर्तव्यमनोवैज्ञानिक शांतिकर्मासक्ति से मुक्ति

संबंधित श्लोक

2.473.304.185.106.5

आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक सीधे 'कर्मफलासक्त' और कर्म योग की मूलभूत सिद्धांत पर चर्चा करता है जो इस अध्याय का सार है।
  2. 3.20 — इसमें भगवान ने राजकुमारों को कर्म करने के लिए प्रेरित किया बिना किसी स्वार्थ के, जो 'काम्य' की चर्चा से आगे बढ़ता है।
  3. 12.15 — यह श्लोक ऐसे भक्त का वर्णन करता है जो सभी को दुख नहीं पहुंचाता और खुद भी किसी से डरता नहीं, जो 'तृप्त' अवस्था की चमकदार छवि है।

अनुशंसित पुस्तकें

GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.

इस श्लोक को साझा करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह श्लोक कहता है कि हमें कर्म करना चाहिए?
नहीं, बल्कि श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि व्यक्ति 'कर्मणि अभिप्रवृत' (action में प्रवृत्त) होना चाहिए। अर्थात् आप काम करें, लेकिन उसमें आसक्ति न रखें; यह श्लोक निष्क्रियता या बंजरपन की बात नहीं करता है, बल्कि एक सक्रिय और पूर्ण कर्म के तरीके को दर्शाता है जिसमें मन मुक्त हो।
अन्य भाषाओं में: भगवद्गीता 4.20 →