भगवद्गीता 4.21
Jnana Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः | शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||४-२१||
nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ . śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||4-21||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति फलाशंका (परिणाम की इच्छा) से रहित हो, अपने मन और आत्मा पर पूर्ण नियंत्रण रखता है तथा सभी प्रकार के लालच या परिग्रहों का त्याग कर देता है, वह शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त करता। इस श्लोक में यह सिद्ध किया गया है कि जब कारकत्व (कर्मी) की भावना और फल की आसक्ति समाप्त हो जाती है, तो कार्य करने से कोई दुष्प्रभाव या पाप का बोझ नहीं लगता।
इसके पीछे का सिद्धांत
इस श्लोक 'कर्म योग' और 'ज्ञान योग' के सिद्धांतों को जोड़ता है, जहां कर्म करते समय फल की आसक्ति (राग) का त्याग करना मुख्य तात्विक बिंदु है। यह दर्शाता है कि पाप या पुण्य न तो कार्य में निहित होता है बल्कि करने वाले के 'चित्त' और 'अहंकार' में, अतः जब चित्त शान्त हो जाता है तब कर्म पवित्र बन जाते हैं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुருक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया संदेश है, जहां अर्जुन ने अपने स्वजन और गुरुओं का वध करने से इनकार करके विषाद (उदासी) में डूबे हुए थे। इससे ठीक पहले कृष्ण जी ने 'ज्ञान-कर्म सन्न्यास योग' की बातें शुरू की थीं, जहां उन्होंने समझाया कि आत्मा अमर है और केवल शरीर ही नष्ट होता है। वर्तमान संदर्भ में अर्जुन कर्म करने या न करने को लेकर भ्रमित था, इसलिए कृष्ण जी इस श्लोक द्वारा उसे सही मार्ग (कर्मायोग) दिखा रहे हैं कि कैसे बिना लालच के कार्य करते हुए पाप से मुक्त रहें।
आज के जीवन में
आज की दुनिया में एक प्रबंधक को माना जाए जो अपने कर्मचारियों पर अत्यधिक दबाव डाल रहा है और सिर्फ अपनी बोनस या प्रमोशन (फल) के लिए कार्य करवाता है, जिससे उसे निरंतर तनाव और चिंता होती रहती है। यदि वह वही काम करता लेकिन बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की आशा के, बल्कि अपने कर्मचारियों की भलाई और संगठन के हित को देखते हुए करता, तो उसके मन में कोई पाप या बोझ नहीं होगा; उसे सफलता मिलेगी फिर भी विजय का अहंकार नहीं रहेगा।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
मान लो तुम स्कूल के लिए पढ़ाई कर रहे हो लेकिन सिर्फ इसलिए कि मम्मी-पापा खुश होंगे और तुम्हें इनाम मिलेगा, इसमें चिंता रहती है। कृष्ण जी कहते हैं जैसे एक खेल में जो बच्चा अकेले खेलने के आनंद से खेल रहा हो, बिना किसी को हार या जीत की फिक्र किए, वह न तो थकता है और न ही डरता है; वैसे ही अगर हम अपने कर्तव्य (जैसे पढ़ाई) को सिर्फ उसी लिए करें कि यह सही काम है, बस इससे कोई पाप नहीं लगता।
दैनिक चिंतन
आप आज जिस कार्य में लगे हुए हैं, क्या आप उसमें केवल प्रकट करने या सेवा का भाव रखते हैं, या परिणाम की चिंता आपके मन को घेरे हुई है? भगवान कृष्ण इस श्लोक में हमें बताते हैं कि जब हम अपने 'चित्त' और 'आत्मा' पर संयम बनाए रखकर सब प्रकार के अहंकारात्मक संपर्कों का त्याग कर देते हैं, तो हमारी आंतरिक शांति बनी रहती है। आप शरीर से कर्म करने वाले होते हुए भी यदि हृदय में 'निष्कांक्षा' (आशा-शून्यता) की भावना ला सकें, तो पाप या पश्चाताप का बोझ आपके ऊपर नहीं आएगा और प्रत्येक कार्य आपको आत्मिक शक्ति देकर गुजर जाएगा।
आज के लिए एक अभ्यास
अपने मन को आशा और परिणाम की चिंता से मुक्त करके, वर्तमान क्षण में शरीर के द्वारा किये जा रहे कार्य पर ध्यान दें। यह अभ्यास आपको इस बात का अनुभव कराएगा कि जब आप 'परिग्रह' (जमाव) को त्याग देते हैं और आशा रहित होकर काम करते हैं, तो मन की वृत्तियां शांत हो जाती हैं और कर्म शुद्ध बन जाता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- निष्कांक्षा: कर्म की निस्वार्थ भावना
यह शिक्षा बताती है कि जब कोई व्यक्ति फल की आशा छोड़ देता है, तो वह कार्य करने में भी बंधन नहीं पाता। 'आशा रहित' होने का अर्थ यह नहीं कि हम लक्ष्य न रखें, बल्कि परिणाम के प्रति पूर्ण समर्पण और निरुपाय होना आवश्यक है। - परिग्रह त्याग: आध्यात्मिक मुक्ति
'सभी परिग्रहों का त्याग' करने से व्यक्ति बाहरी वस्तुओं और मन के आसक्तियों में फंसा नहीं रहता। यह अंतरंग संयम (चित्त-आत्मा) तब तक बनाए रखना है जब हम शारीरिक रूप से कार्य कर रहे हों, जो पाप या क्लिष्टता को समाप्त करता है। - कर्म में शुद्धि: अविचलित आत्मा
शरीर द्वारा किए गए कर्म करने वाले पुरुष भी यदि उसकी अवस्था 'निराशी' और 'संयत' है, तो वह पाप को प्राप्त नहीं होता। इसका तात्पर्य यह है कि कार्य की शुद्धि आत्म के भाव पर निर्भर करती है, न कि कर्म की प्रकृति पर।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग की नींव रखता है और बताता है कि केवल कार्य करने का अधिकार है, फल का नहीं, जो इस अध्याय के मुख्य विचार को पूरा करता है।
- 3.30 — इसमें कर्मों को ईश्वर में समर्पित करने की बात आती है, जिससे 'परिग्रह त्याग' और 'निष्कांक्षा' का अभ्यास गहरा होता है।
- 12.15 — यह श्लोक उन गुणों की व्याख्या करता है जो एक भक्त में होने चाहिए, जिनमें 'कर्मफल त्यागी' और 'सर्वत्र समदर्शी' होना शामिल है।
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