भगवद्गीता 3.23
Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||३-२३||
yadi hyahaṃ na varteyaṃ jātu karmaṇyatandritaḥ . mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||3-23||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि यदि वे स्वयं कर्म न करेंगे, तो समाज में सब लोग उनका अनुसरण करके निरंतरता खो देंगे। यह श्लोक बताता है कि बड़े से बड़ा व्यक्ति भी कार्यशील होकर ही दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकता है। इसमें मुख्य शिक्षा यह है कि नेतृत्व का अर्थ सिर्फ आदेश देना नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण स्वरूप कर्म करना है।
इसके पीछे का सिद्धांत
इस श्लोक को 'कर्मेयोग' (योग of Action) की अवधारणा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जहां आध्यात्मिकता और सामान्य कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाया गया है। यह सिद्धांत विकसित करता है कि 'कर्म' करना ही साध्य नहीं, बल्कि निष्कांक्ष भाव से कार्य करना और दूसरों की भलाई के लिए स्वयं को समर्पण देना आवश्यक है। इसमें दर्शाया गया विचार यह भी है कि प्रत्येक व्यक्ति का कर्म समाज के कुल विकास पर निर्भर करता है, इसलिए नेतृत्व करने वाला व्यक्ति सबसे पहले 'अतन्द्रित' (निरंतर और जागृत) होना चाहिए।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
भगवद्गीता का तीसरा अध्याय कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर हुआ है, जहां अर्जुन ने हथियार फेंक दिए थे और युद्ध न करने की बात कर रहे थे। भगवान कृष्ण ने पहले 'ज्ञान योग' समझाया था कि आत्मा नहीं मरती, लेकिन अब वे 'कर्मेयोग' का मार्ग बताते हैं क्योंकि अर्जुन को कार्य से हटना चाहिए। इस संदर्भ में, अर्जुन भ्रमित है और कृष्ण उसे यह बताने के लिए कह रहे हैं कि एक राजा या योद्धा होने के नाते उन्हें अपनी दायित्व निभाकर ही दूसरों की नेतृत्व शक्ति प्रदान करनी चाहिए।
आज के जीवन में
मान लीजिए आप किसी कंपनी में नया मैनेजर बनें और आपके कर्मचारी काम छोड़ रहे हैं या धैर्य खो देते हैं, तो सबसे बेहतर तरीका यह नहीं है कि सिर्फ चिढ़-चिड़ाव करें। यदि आप स्वयं अपनी कुर्सी से उठकर वहां जाकर मशाल की तरह कर्म करते हुए दिखाएंगे और मेहनत करके दिखेंगे, तो आपके टीम मेंबर भी प्रेरित होकर अपने काम पर ध्यान देंगे। एक माता-पिता के रूप में यदि आप बच्चों को नौटंकी से दूर रखना चाहते हैं लेकिन स्वयं रोज़ फोन चलाते रहेंगे, तो वे नहीं मानेंगे; यह श्लोक कहता है कि सही मार्ग दिखाने के लिए आपको पहले खुद चलकर दिखाया होगा।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो अगर तुम्हारे स्कूल के प्रधानाध्यापक (Principal) हर रोज़ स्कूल में आएंगे और सबका ध्यान रखेंगे, लेकिन खुद कुछ काम नहीं करेंगे तो क्या होगा? बच्चे भी शायद खेलने लग जाएं या क्लास न पढ़ पाएं। ठीक वैसे ही जैसे भगवान कृष्ण कहते हैं कि यदि वे स्वयं मेहनत करके दिखाएंगे, तभी दुनिया के लोग भी अच्छा काम करना सीखेंगे और हम सब मिलकर एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं।
दैनिक चिंतन
आपने सोचा होगा कि आपकी छोटी सी उपस्थिति या एक दिन का विश्राम दुनिया पर कोई असर नहीं डालेगा, लेकिन श्री कृष्ण कहते हैं कि आपके प्रत्येक कार्य से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं। यदि आप स्वयं अपने धर्म में अलस हो जाएंगे और निराशा या आलस्य का मार्ग अपनाएंगगे, तो समाज भी उसी दिशा में चलने लगता है। इसलिए आज के दिन को ऐसे बिताएं कि आपके कर्मों से दूसरों को प्रेरणा मिल सके और आप उनका सर्वोत्तम उदाहरण बन सकें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन को स्थिर करके यह विचार करें कि यदि मैं, जैसे ईश्वर या गुरु के रूप में भी कार्य नहीं करता, तो समाज का मार्ग कैसे खो जाएगा। कर्म करना ही मेरी प्रकृति और दायित्व है; इस निष्ठा के साथ आज अपना हर कार्य आनंदपूर्वक करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- गुरु का आदर्श स्वरूप (The Ideal of the Teacher)
जब तक एक गुरु या नेतृत्व करने वाला व्यक्ति कार्य में सचेतन और सक्रिय रहता है, तभी समाज उसका अनुसरण कर सकता है। यदि स्वयं कर्म नहीं करते हैं, तो शिक्षा देने की क्षमता खो जाती है क्योंकि लोग शब्दों से अधिक आचरण पर भरोसा करते हैं। - कर्म का अनिवार्य स्वरूप (The Necessity of Action)
यहाँ कृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि कार्य करना प्रकृति की नियत है; यदि वे भी आलस नहीं करेंगे, तो इसका अर्थ है कि कर्म का त्याग संभव नहीं है। इसलिए 'अनंतरित' (सावधान) रहना ही सच्चा धर्म और जीवन जीने का तरीका है। - मास्टर की भूमिका में सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility in Leadership)
श्री कृष्ण यह बता रहे हैं कि बड़े व्यक्ति या 'पार्थ' जैसे गीतकार के लिए, उनके कार्य का प्रभाव सीधे समाज पर पड़ता है। यदि वे आलस्य में डूब जाएंगे, तो मनुष्यों को भी वही रास्ता अपना लेना होगा और न्याय या धर्म की रक्षा खत्म हो जाएगी।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 3.21 — इस श्लोक में श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे स्वयं भी कार्य क्यों नहीं कर सकते, जिससे यह समझा जाता है कि उनके आचरण का महत्व क्या है।
- 3.25 — इस श्लोक में कर्म योग के नियमों और सजगता (अतन्द्रित) की आवश्यकता पर चर्चा की गई है, जो वर्तमान विषय का सीधा समर्थन करती है।
- 18.73 — गीता के अंतिम श्लोक में अर्जुन का कृष्ण की आज्ञा स्वीकार करना दिखाया गया है, जो इस सिद्धांत पर आधारित है कि आदर्श आचरण ही सफलता और शांति लाता है।
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