भगवद्गीता 3.22

Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 3.22 — "यद्यपि मुझे त्रैलोक्य में कुछ भी कर्तव्य नहीं हैं तथा किंचित भी प्राप्त होने योग्य (अवाप्तव्यम्) वस्"
भगवद्गीता 3.22 — Karma Yoga
संस्कृत

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन | नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ||३-२२||

लिप्यंतरण

na me pārthāsti kartavyaṃ triṣu lokeṣu kiñcana . nānavāptamavāptavyaṃ varta eva ca karmaṇi ||3-22||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वे स्वयं को कोई भी कर्तव्य नहीं करना है और न ही उन्हें कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता है, क्योंकि वे पूर्ण रूप से समग्र हैं। फिर भी, वे दूसरों के लिए उदाहरण स्थापित करने हेतु निश्चित रूप से कार्य करते रहते हैं। इसका मुख्य संदेश यह है कि भले ही व्यक्ति को स्वयं कुछ करने या प्राप्त करने की आवश्यकता न हो, लेकिन समाज और अन्य लोगों की शिक्षा के लिए कर्म करना अनिवार्य है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्म योग' (Karma Yoga) की गहराई को दर्शाता है और कर्माश्रम या फलत्याग के सिद्धांत का विस्तार करता है। यह बताता है कि जब व्यक्ति आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, तो वे स्वयं के लिए कोई कर्म नहीं करते क्योंकि उन्हें कुछ बाधा की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन वे लोकसंग्रह (समाज का भला) और उदाहरण स्थापित करने के लिए निष्काम भाव से कार्य जारी रखते हैं। यह सिद्धांत 'निष्काम कर्म' की पूर्ण अवस्था को परिभाषित करता है जहाँ स्वार्थ पूरी तरह समाप्त हो चुका होता है।

शब्दार्थ
न not, मे my, पार्थ O Partha, अस्ति is, कर्तव्यम् to be done (duty), त्रिषु in the three, लोकेषु worlds, किञ्चन anything, न not, अनवाप्तम् unattained, अवाप्तव्यम् to be attained, वर्ते am, एव also, च and, कर्मणि in action
पारंपरिक भाष्य
I am the Lord of the universe and therefore I have no personal grounds to engage. Myself in action. I have nothing to achieve as I have all divine wealth, as the wealth of the universe is Mine, and yet I engage Myself in action. Why do you not follow My example Why do you not endeavour to prevent the masses from following the wrong path by setting an example yourself If you set an example, people will follow you as you are a leader with noble alities.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में स्थित है, जहाँ अर्जुन अपने ही गुरुओं और पितामहाओं से लड़ने की भावना को छोड़कर विषाद (उदासी) का अनुभव कर रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने पहले 'ज्ञान योग' के माध्यम से आत्मा की अविनाशी प्रकृति और कर्म फल के सिद्धांतों पर चर्चा पूरी करते हुए, अब एक गहरा दार्शनिक बिंदु को स्पष्ट कर रहे हैं। इस संवाद में, कृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का उद्घोष करके अर्जुन की भ्रम दूर करने और उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करने हेतु कहते हैं कि एक पूर्ण व्यक्ति भी कार्य करता है यदि वह सामाजिक अनुशासन बनाए रखना चाहता हो।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक वरिष्ठ व्यवसायी या संस्थापक हैं जो अपने क्षेत्र में पूरी तरह से सफल और स्वतंत्र हैं, आपके पास कोई नया लाभ प्राप्त करने की इच्छा नहीं है और आपको लगता है कि अब 'मैंने सब कुछ पा लिया'। फिर भी, यदि आप अपनी टीम के लिए एक प्रोत्साहन भाषण देते हैं या अपने अनुभव साझा करते हैं ताकि नए कर्मचारी सही दिशा में चल सकें, तो यह वही सिद्धांत है जो इस श्लोक में वर्णित है। आपको स्वयं कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि दूसरों को मार्गदर्शन देने और 'कामकाजी' रहने की आदत बनाने के लिए काम करना चाहिए, भले ही आपकी व्यक्तिगत आवश्यकताएं पूरी हो चुकी हों।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करें कि आपकी स्कूल में एक बहुत बड़े लीडर हैं जो सभी जानते हैं और उनके पास सब कुछ पहले से मौजूद है; उन्हें क्या सीखने या पाने की ज़रूरत नहीं है, फिर भी वे दिन भर खेलों को सिखाकर और काम करके अपने दोस्तों का मार्गदर्शन करते हैं। ठीक वैसे ही, भगवान कृष्ण के पास करने के लिए कुछ बचा हुआ नहीं था या उन्हें कुछ पाने की जरूरत नहीं थी, लेकिन उन्होंने देखा कि अर्जुन (और हम सभी) उदास और हतोत्साहित हैं। इसलिए वे अपने काम करते रहते ताकि आप सब सीख सकें कि बिना किसी लाभ के आशा किए भी कर्म करना कैसे होता है।

दैनिक चिंतन

आप अक्सर यह सोचते होंगे कि आपको आगे बढ़ने के लिए कुछ प्राप्त करना होगा या कोई बड़ा कार्य करने का दायित्व महसूस होगा, लेकिन भगवान कृष्ण आज हमें बता रहे हैं कि वे स्वयं पूर्णता में ही रहकर भी सक्रिय हैं। आपका यह सच है कि आपके पास जो चाहिए वह पहले से ही मौजूद है और आपकी कोई भी आवश्यकता पूरी हो चुकी है; फिर भी जीवन का प्रवाह चल रहा है। आज के दिन, अपने कर्मों को 'प्राप्त करने' की इच्छा से नहीं बल्कि 'काम करते रहने' की स्वाभाविक गतिशीलता में करें, और देखें कि कैसे आपका मन शांत हो जाता है।

आज के लिए एक अभ्यास

अर्जुन के प्रश्नों और अपने कर्मों की चिंताओं को बीच में रखकर, यह सोचें कि ईश्वर स्वयं भी पूर्ण होने के बावजूद लोकांगीकरण के लिए कार्य करते हैं। आज का अपना हर काम इसे एक निस्वाथ्य याज्ञिक रूप से करें, बिना किसी फल की अपेक्षा किए और न ही इस बात को लेकर कि 'मेरे पास क्या नहीं है'।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. परम पूर्णता का कार्य (Action of Fullness)
    कृष्ण स्वयं को 'त्रैलोक्य' में कुछ भी प्राप्त करने योग्य या अवाप्तव्य नहीं बताते, फिर भी वे निरंतर कर्म करते हैं। यह सिद्धांत दर्शाता है कि ईश्वरीय स्तर पर कार्य करना कोई आवश्यकता से प्रेरित नहीं होता, बल्कि पूर्णता का एक स्वाभाविक व्यक्तित्व है।
  2. फल की आसक्ति से मुक्ति (Freedom from Attachment to Results)
    जब आपका कर्म किसी 'प्राप्त' करने या 'कम पाने' के डर/लालसा से प्रेरित नहीं होता, तो वह शुद्ध बन जाता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कृष्ण का कार्य स्वयं को सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि लोकांगीकरण (पृथ्वी पर धर्म की स्थापना) और उत्तम आचरण का उदाहरण देने के लिए होता है।
  3. कर्म योग: कर्ता न होकर अकर्ता बनना
    यह श्लोक हमें 'वक्त एव च कार्मणि' (कर्म में ही ब्रतन करने) का संकेत देता है, जहाँ व्यक्ति स्वयं को कर्म से नहीं जोड़ते। यह भाव वही है जिसका वर्णन गीता के दूसरे अध्याय में किया गया है: 'कर्तव्य' के पालन में अहंकार की अनुपस्थिति और पूर्ण समर्पण।

विषय

निष्काम कर्म (Nishkama Karma)लोकसंग्रह (Social Welfare)उदाहरण स्थापना (Leading by Example)अकर्ता भाव (Non-doership)भगवान का स्वभावकर्मयोग की परिपाटी

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  1. 2.47 — यह श्लोक 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का आधार है, जो इस अध्याय में कर्म के सही ढंग से करने और फल की इच्छा न रखने पर विस्तृत रूप से बताता है।
  2. 3.30 — इसमें भगवान कहते हैं कि सभी कर्मों को ईश्वर में अर्पित कर दें, जो 3.22 के 'कर्म में ब्रतन' वाले भाव का आगे का विस्तार है।
  3. 18.59 — अंत में इस अध्याय में कृष्ण अर्जुन को पुकारते हैं कि यदि आप अपने स्वभाव के अनुसार चिंता नहीं करेंगे, तो भी आपको वही कार्य करना चाहिए जो धर्म है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यदि भगवान को कोई कर्तव्य नहीं है, तो वे युद्ध क्यों लड़ रहे थे?
भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि उन्हें स्वयं के लिए या किसी लाभ की प्राप्ति के लिए कार्य करने की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी, उन्होंने 'लोकसंग्रह' (समाज का भला) और दूसरों को सही रास्ता दिखाने के उद्देश्य से युद्ध में भाग लिया ताकि वे एक आदर्श कर्मयोगी के रूप में कार्य करें।
'त्रिषु लोकेषु किंचन' (तीनों लोकों में कुछ भी) का क्या अर्थ है?
इसका तात्पर्य यह है कि भगवान स्वयं पूर्ण और सर्वशक्तिमान हैं; उनमें कोई कमी नहीं है जो उन्हें किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर सके। वे न तो कुछ खो चुके हैं जिसे वापस पाया जाए, और न ही वे कुछ ऐसे हैं जो अभी तक उनके पास नहीं आया हो जिसकी आवश्यकता हो।
क्या हमें भी तब कार्य करना चाहिए जब हमारे पास कोई लक्ष्य या लाभ न हो?
जी हाँ, इस श्लोक का मूल संदेश यह है कि यदि आप स्वयं को पूर्ण समझते हैं और फल की आशा नहीं रखते, तो भी आपको समाज के लिए कार्य करना चाहिए। कर्म करना ही एक साधन है जो हमें अहंकार से मुक्त रखता है और दूसरों के मार्गदर्शन में सहायक होता है।
इस श्लोक का संबंध 'कर्मा योग' और 'ज्ञान योग' से कैसे है?
यह श्लोक दोनों को जोड़ता है: ज्ञान यह दर्शाता है कि कर्म करने वाले में कोई आत्मीय आवश्यकता नहीं है (अज्ञान की समाप्ति), जबकि कर्मयोग वह मार्ग है जिस पर पूर्ण व्यक्ति निष्काम भाव से कार्य करता रहता है। यह दिखाता है कि उच्च ज्ञान प्राप्त होने के बाद भी, व्यक्तित्व और सामाजिक दायित्वों का पालन करना आवश्यक होता है।
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