भगवद्गीता 3.24

Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 3.24 — "यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये समस्त लोक नष्ट हो जायेंगे; और मैं वर्णसंकर का कर्ता तथा इस प्रजा का हनन क"
भगवद्गीता 3.24 — Karma Yoga
संस्कृत

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् | सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ||३-२४||

लिप्यंतरण

utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham . saṅkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ ||3-24||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि यदि वे युद्ध नहीं लड़ेंगे, तो समाज में भ्रष्टाचार और वर्णाश्रम व्यवस्था का विनाश होगा। यह श्लोक बताता है कि महान पुरुषों के आदर्श से हटने पर सामूहिक कल्याण खतरे में पड़ जाता है। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि यदि हम अपनी दायित्व निभाते हैं, तो ही समाज का संरक्षण होता है और नष्ट होने से बचता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग (Karma Yoga) और सत्त्विक चेतना का मुख्य सिद्धांत प्रस्तुत करता है जहाँ कार्य को स्वार्थ-रहित निष्ठा से करने पर सामूहिक भलाई होती है। यह संकल्प देता है कि व्यक्तिगत आनंद या डर के कारण धर्म (dharma) का त्याग करना न तो उचित है और न ही सुरक्षित, क्योंकि इससे समाज की व्यवस्था में गड़बड़ी (संकर) पैदा होगी।

शब्दार्थ
उत्सीदेयुः would perish, इमे these, लोकाः worlds, न not, कुर्याम् would do, कर्म action, चेत् if, अहम् I, सङ्करस्य of confusion of castes, च and, कर्ता author, स्याम् would be, उपहन्याम् would destroy, इमाःthese, प्रजाः beings
पारंपरिक भाष्य
If I did not engage in action, people would also be inactive. They would not do their duties according to the Varnasrama Dharma (code of morals governing their own order and stage of life). Hence confusion of castes would arise. I would have to destroy these beings.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध की भूमि कुरुक्षेत्र पर, श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन से वार्तालाप का एक हिस्सा है जब अर्जुन ने हथियार फेंक दिए थे और युक्त में पड़ गए। अर्जुन स्वजन के साथ युद्ध करने की सोच कर शोक और भ्रम में डूबे हुए हैं, इसलिए वे कृष्ण से विराम मांगते हैं। इस संदर्भ में, श्री कृष्ण ने समझाया कि यदि एक महान पुरुष (जैसे अर्जुन) अपने धर्म का त्याग कर देता है, तो समाज में अनिष्ट और वर्णाश्रम व्यवस्था का विनाश होगा।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप किसी बड़े प्रोजेक्ट की टीम के लीडर हैं और आपको लग रहा है कि काम बहुत कठिन है या परिणाम निश्चित नहीं, इसलिए आप छुट्टियां लेने का विचार कर रहे हैं। इस श्लोक सिखाता है कि यदि आप अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटेंगे, तो न केवल टीम की प्रगति रुक जाएगी बल्कि पूरी संरचना (जैसे वर्णसंकर) भी बिगड़ सकती है और लोगों का भरोसा खत्म हो जाएगा। इसलिए मुश्किल समय में ही सबसे अधिक आवश्यकता अपने दायित्व को निभाने की होती है, न कि भावनाओं के आधार पर पीछे हटने की।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम एक स्कूल के क्लास में हो जहाँ सब कुछ बिगड़ने वाला है अगर कोई लीडर नहीं बनता, तो क्या होगा? अर्जुन ने भी सोचा था कि वह युद्ध से बच जाएंगे ताकि उन्हें डर न लगे। लेकिन श्री कृष्ण ने कहा कि यदि नेता (कैसा) अपना काम नहीं करेंगे, तो दुनिया में गड़बड़ी फैल जाएगी और सबकी पढ़ाई-लिखाई बाधित हो सकती है। इसलिए हमें भी अपने कामों को पूरी जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए ताकि घर और समाज सुरक्षित रहे।

दैनिक चिंतन

आप जब भी किसी काम में अनिच्छा या थकावट महसूस करते हैं, तो यह विचार करें कि आपका छोटा सा कार्य पूरे विश्व की संतुलन बनाए रखने में कैसे मदद करता है। कर्म करने से न केवल बाहर का जगत सुरक्षित रहता है, बल्कि आपके भीतर अहंकार और भय भी मिटते हैं। आप स्वयं को इस वैश्विक धारा का एक अनिवार्य हिस्सा मानें जो प्रजा की रक्षा और लोक कल्याण के लिए चल रहा है।

आज के लिए एक अभ्यास

अपने कर्मों को केवल एक उत्तरदायित्व के रूप में देखें, न कि परिणाम की आशा या डर से। आज सोचिए कि यदि आप अपना धर्मीय कार्य नहीं करेंगे तो समाज और प्रकृति दोनों पर क्या असर पड़ेगा, और अपने अहंकार को त्यागकर उस कर्म का भागी बनें जो सभी के लिए आवश्यक है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. समाज में अराजकता से बचाव (Prevention of Chaos)
    यदि गुरु या नेतृत्वकर्ता अपने धर्म का पालन नहीं करते, तो समस्त समाज 'संकर' यानी भ्रष्ट और विकृत हो जाता है। कर्त्ता की अनुपस्थिति से प्रजा में अज्ञान फैलता है जो नैतिक ढांचे को विघटित कर देता है।
  2. कर्म का वैश्विक महत्व (Universal Impact of Action)
    हर व्यक्ति के कर्मों का सीधा प्रभाव समस्त लोकों पर पड़ता है; इसलिए निष्काम कर्तव्यपालन अनेकों की रक्षा करता है। यह दर्शाता है कि हमारा हर कार्य स्वयं-हित से बड़ा और सार्वभौमिक होता है।
  3. अहंकार का त्याग (Renunciation of Ego)
    कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि कर्म करना स्वयं के लिए नहीं, बल्कि लोकसंग्रह और प्रजा की रक्षा के लिए है। जब हम 'मैं' का भाव छोड़ देते हैं, तो हम दुष्ट परिणामों से भी बच जाते हैं जो अकेलेपन में उत्पन्न होते हैं।

विषय

कर्म का महत्व (Importance of Action)सामाजिक दायित्व (Social Responsibility)वर्णाश्रम व्यवस्था की रक्षा (Protection of Social Order)आदर्श पुरुष और नेतृत्व (Ideal Leader and Leadership)धर्म का त्याग न करना (Not Abandoning Duty)संसार का संरक्षण (Preservation of the World)

संबंधित श्लोक

2.473.304.185.169.2

आगे पढ़ें

  1. 2.47 — इस अध्याय में कार्य का मूल सिद्धांत, अर्थात् कर्म फल के लिए नहीं करना, की व्याख्या इसमें मिलती है।
  2. 3.9 — कर्म को यज्ञ रूप में करने और संसार से बंधन मुक्त होने का यह अति महत्वपूर्ण उपदेश समझने के लिए आवश्यक है।
  3. 12.4 — समस्त प्राणियों की भलाई और लोक कल्याण में रत रहने वाले महात्माओं का वर्णन, जो इस विषय को गहरा करता है।

अनुशंसित पुस्तकें

GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.

इस श्लोक को साझा करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'वर्णाशंकर' (Sanakara) का अर्थ क्या है?
'वर्णाशंकर' या 'सङ्करास्त्रुत' का शाब्दिक अर्थ है वर्णों का मिश्रण या भ्रष्टता। इसका तात्पर्य यह है कि यदि नेतृत्व स्तर के पुरुष अपने कर्म (धर्म) नहीं करेंगे, तो समाज में व्यवस्था बिगड़ जाएगी और लोग अपनी उचित स्थिति से हटकर गलत रास्ते पर चलेंगे।
क्या यह श्लोक बताता है कि हमें कर्म करना चाहिए भले ही परिणाम नकारात्मक हो?
नहीं, इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको बिना सोचे-समझे या गलत कार्यों में लिप्त रहना चाहिए। इसका सिद्धांत यह है कि यदि आप अपने कर्तव्य (धर्म) को त्याग देंगे, तो समाज का नुकसान होगा; इसलिए हमें अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और परिणामों की चिंता किए बिना कार्य करना चाहिए।
अर्जुन ने कर्म क्यों नहीं करने का सोचा था?
अर्जुन को अपने ही गुरुजन, भाइयों और शिक्षकों के साथ युद्ध करने में भारी संशय और भ्रांति थी। उन्हें लग रहा था कि यदि वे युद्ध करेंगे तो पाप होगा, इसलिए वे कर्म न करने का विकल्प चुनने की सोच रहे थे।
क्या यह श्लोक केवल राजाओं या नेताओं के लिए है?
यह श्लोक विशेष रूप से उन लोगों पर लागू होता है जो समाज में आदर्श हैं और दूसरों को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इसका व्यापक अर्थ यह भी है कि हर व्यक्ति का अपना कर्तव्य निभाना सामाजिक संतुलन के लिए आवश्यक है, क्योंकि यदि कोई छोटे स्तर पर भी अपने दायित्व से हटता है, तो वह बड़े पैमाने पर असंतोष फैला सकता है।
अन्य भाषाओं में: भगवद्गीता 3.24 →