भगवद्गीता 15.19

Purushottama Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 15.19 — "हे भारत ! इस प्रकार, जो, संमोहरहित, पुरुष मुझ पुरुषोत्तम को जानता है, वह सर्वज्ञ होकर सम्पूर्ण भाव स"
भगवद्गीता 15.19 — Purushottama Yoga
संस्कृत

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् | स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ||१५-१९||

लिप्यंतरण

yo māmevamasammūḍho jānāti puruṣottamam . sa sarvavidbhajati māṃ sarvabhāvena bhārata ||15-19||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो व्यक्ति बिना किसी भ्रम के पुरुषोत्तम (परमात्मा) की पहचान कर लेता है, वही सर्वज्ञ बन जाता है। यह श्लोक कहता है कि पूर्ण ज्ञान का परिणाम ही सच्ची और समर्पित भक्ति है। जब कोई व्यक्ति ईश्वर को उनके सबसे उच्च स्वरूप में जान लेता है, तो वह पूरे हृदय से उनकी आराधना करने लगता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) के सिद्धांतों पर आधारित है, जो भक्ति योग (Bhakti Yoga) और कर्म योग का अंतिम परिणाम बताता है। इसमें 'असम्मूढ' (बिना भ्रमित हुए) होने की अवधारणा को प्रस्तुत किया गया है, जहाँ सच्चा ज्ञान ही वह कुंजी है जो मनुष्य को आत्म-भ्रांतियों से मुक्त कर पूर्ण समर्पण में ले जाती है। यह 'सर्वज्ञ' (सबको जानने वाला) होने की स्थिति दर्शाता है, जहाँ व्यक्ति ईश्वर और जीवात्मा के बीच का भेद समझकर सर्वभाव से अर्चना करता है।

शब्दार्थ
यः who, माम् Me, एवम् thus, असम्मूढः undeluded, जानाति knows, पुरुषोत्तमम् the Supreme Purusha, सः he, सर्ववित् allknowing, भजति worships, माम् Me, सर्वभावेन with his whole being (heart), भारत O Bharata
पारंपरिक भाष्य
The glory of the knowledge of the Self is described in this verse. Asammudhah Undeluded, free from delusion. The undeluded does not identify himself with the physical body. He never looks upon the physical body, the lifeforce, senses, mind, intellect and the causal body as the Self or as belonging to himself, because he is resting in his own essential nature as ExistenceKnowledgeBliss Absolute and because he identifies himself with Brahman or the Supreme Being. That aspirant who knows that Sri Krishna is not a human being and that He is the highest Purusha or the Supreme Being is undeluded. Such an aspirant or devotee alone worships Him with his whole being. He is the Sarvavit or Sarvajna, allknower. He knows and realises that Lord Krishna, the supreme Lord, is the Inner Self of all beings. He beholds the One in the many, and the many in the One. For him there is neither high nor low, neither pleasure nor pain, neither virtue nor vice, neither good nor evil, neither likes nor dislikes. Me The Lord as specified above. Sarvavit One who knows everything in detail. Knows that I am He. Sarvabhavena With all his heart, with his whole being, wholeheartedly with his whole thought devoted exclusively to the Self of all with his whole mind centred on the Supreme Self alone.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर स्थित चैत्रा (15) अध्याय 'पुरुषोत्तम योग' का अंतिम संदेश है, जहाँ श्री कृष्ण ने ब्रह्मांडीय दृश्य (विश्वरूप दर्शन) के बाद मानव जीवन की प्रकृति और उससे मुक्ति पर चर्चा की थी। इससे ठीक पहले कृष्ण ने 'अक्षरब्रह्म' और 'पुरुषोत्तम' में अंतर समझाया था, जो एक जटिल दार्शनिक अवधारणा है जिसमें अर्जुन गंभीर रूप से चिंतित थे। कृष्ण अब अपने सबसे प्रिय मित्र और सैन्य नेता को यह आश्वासन दे रहे हैं कि यदि वे इस उच्चतम तत्व की पहचान कर लें, तो वह न केवल ज्ञानी बल्कि पूर्ण भक्त भी बन जाएगा।

आज के जीवन में

मान लीजिए एक कर्मठ प्रबंधक बिना किसी चिंता या द्वंद्व के अपने कार्य में जुड़ा है और उसे यह स्पष्ट समझ है कि वह ईश्वर की इच्छा से काम कर रहा है; ऐसे व्यक्ति को कोई भी विफलता डरा नहीं सकती। जब आप जीवन की कठिन चुनौतियों, जैसे नई जॉब या परिवार का संघर्ष, के सामने होते हैं और आपको स्पष्ट पता होता है कि एक उच्च शक्ति आपके साथ है, तो आप पूरी भावनात्मक गहराई (सर्वभावेन) से अपने कर्मों को समर्पित कर देते हैं। इस दृष्टिकोण से डर खत्म हो जाता है और निर्णय लेने में एक शांतिपूर्ण स्पष्टता आ जाती है, जो आपको सफलता की ओर ले जाती है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करें कि एक बच्चा अपने पिता की ताकत और प्यार को पूरी तरह समझ जाता है; तब वह बिना किसी डर या भ्रम के उनके पास दौड़कर उनसे लगा हुआ आसक्त हो जाता है। श्री कृष्ण कहते हैं, जैसे उस बच्चे ने अपना सही पिता पहचान लिया, वैसे ही जो हमारे असली ईश्वरीय स्वरूप को जान लेता है, वह पूरी ताकत और प्यार के साथ उनका भक्त बन जाता है। यह समझना कि ईश्वर सबसे ऊपर हैं, बस उतना ही जरूरी है जितना घर में अपने असली माता-पिता से जुड़ना।

दैनिक चिंतन

प्रिय पाठक, क्या आपने कभी सोचा है कि आपके भीतर एक गहराई से जुड़ा हुआ सत्य है जो आपको पूरी तरह जान सकता है? जैसे-जैसे आप श्री कृष्ण को 'पुरुषोत्तम' के रूप में जानते हैं और उनके प्रति पूर्ण हृदय समर्पित होते हैं, आपके भीतर का वह अज्ञान भाव धीरे-धीरे दूर हो जाता है। यह ज्ञान आपको सभी विद्याओं से श्रेष्ठ बनाता है और आपकी प्रार्थना को केवल एक मांग नहीं, बल्कि एक पूर्ण भक्ति में बदल देता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने भीतर उस अनादिकालीन चेतना को पहचानने का प्रयास करें जो आपकी व्यक्तिगत सीमाओं से परे है। जब मृगमरीचिका की तरह भ्रामक संसार में फंस जाने के बजाय, आप 'पुरुषोत्तम' (श्री कृष्ण) को अपनी वास्तविक पहचान मानकर उनमें समर्पित हो जाएं, तो मन का वह मलिनता और अज्ञान मिट जाएगा।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. संमोह का अंत: पुरुषोत्तम ज्ञान
    यह श्लोक बताता है कि जब हम संसार के भ्रामक प्रभाव (असम्मुद) से मुक्त होकर 'पुरुषोत्तम' को पहचانتे हैं, तो अज्ञान का नाश होता है। यह एक ऐसा ज्ञान है जो न केवल मनुष्य की सीमाओं में बल्कि उससे भी उच्च अवस्था तक ले जाता है।
  2. सर्वज्ञता और पूर्ण समर्पण
    जो व्यक्ति पुरुषोत्तम को जान लेता है, वह स्वयं सर्वज्ञ (sarva-vid) बन जाता है क्योंकि उसे सत्य का अहसास हो जाता है। यह ज्ञान केवल बुद्धिगत नहीं होता, बल्कि 'सरवभावेन' या पूर्ण भाव से भक्ति करने की ओर ले जाता है।
  3. भारत (अर्जुन) को समर्पित संदेश
    श्री कृष्ण इस ज्ञान का उपहार 'भारत' या अर्जुन, और सभी मानवता के लिए दे रहे हैं। यह एक आमंत्रण है कि हमें अपने भेदभावों को त्यागकर पूर्ण हृदय से ईश्वर में लीना चाहिए जो सबका आत्मा है।

विषय

पुरुषोत्तम की पहचानसच्चा ज्ञान और भक्तिभ्रम से मुक्ति (असम्मूढ)पूर्ण समर्पणकर्म योग का फलईश्वर के प्रति श्रद्धा

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  1. 15.7 — इस अध्याय की शुरुआत जो 'मूल पुरुष' और जड़ तंत्र का वर्णन करती है, यह विचार को गहरा करने के लिए आवश्यक है।
  2. 18.54 — यह श्लोक बताता है कि पारमार्थिक ज्ञान और पूर्ण समर्पण (पूर्ण हृदय) की स्थिति क्या होती है, जो इस अध्याय के अंत का निष्कर्ष है।
  3. 10.8 — श्री कृষ্ण द्वारा स्वयं को 'पुरुषोत्तम' और सभी स्रोतों का मूल कहा गया है, जो इस श्लोक के आधार की पुष्टि करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्लोक 'असम्मूढ' (बिना भ्रमित हुए) क्यों कहता है?
'असम्मूढ' शब्द इस बात पर जोर देता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए मानवीय भ्रांतियों और संदेहों को दूर करना आवश्यक है। जब तक व्यक्ति ईश्वर या आत्मा की वास्तविक प्रकृति में भ्रम बना रहता है, उसे पूर्ण समझ नहीं मिलती। यह श्लोक बताता है कि सच्ची पहचान का अर्थ है धार्मिक और दार्शनिक गलतफहमी से मुक्त होना।
'सर्वज्ञ' होने का क्या मतलब है, क्या इसका तात्पर्य ईश्वर जैसा सब जानने वाला बनना है?
यहाँ 'सर्वज्ञ' का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति स्वयं सर्वज्ञ (ईश्वरीय) हो जाता है, बल्कि वह उस स्तर तक पहुँचता है जिससे उसे ईश्वर की सारी शक्तियाँ और नियम स्पष्ट दिखते हैं। जब कोई पुरुषोत्तम को जान लेता है, तो उसके लिए बाकी सब कुछ भी ज्ञात हो जाता है क्योंकि वह सभी का आधार देख पाता है। यह एक आध्यात्मिक दृष्टि की स्थिति है जो पूर्ण समझ देती है।
'सर्वभावेन' (पूर्ण भाव से) भक्ति करना क्या अर्थ रखता है?
"सर्वभावेन" का अर्थ है पूरे हृदय, मन और आत्मा के साथ पूर्ण समर्पण। इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों छोड़ दे, बल्कि वह अपने सभी कर्मों और विचारों को ईश्वर की इच्छा में विलीन कर देता है। जब कोई बिना किसी आसक्ति या द्वंद्व के पूरे अस्तित्व से भक्त बन जाता है, तो उसे 'पुरुषोत्तम' का सच्चा अनुभव होता है।
क्या यह श्लोक सिर्फ कर्मयोगियों के लिए है या सभी साधकों के लिए?
यह श्लोक सभी आध्यात्मिक मार्गों, विशेष रूप से ज्ञान योग और भक्ति योग को जोड़ता है। चाहे कोई व्यक्ति कर्म करता हो, ध्यान करे या विचार करे, यदि उसे 'पुरुषोत्तम' की सही पहचान नहीं होती तो वह असम्पूर्ण रह जाता है। अंत में, यह श्लोक बताता है कि सभी योगों का लक्ष्य ही इस पूर्ण ज्ञान और समर्पित भक्ति को प्राप्त करना है।
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