भगवद्गीता 15.10
Purushottama Yoga · हिन्दी अनुवाद
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् | विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ||१५-१०||
utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam . vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ ||15-10||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि आत्मा शरीर के साथ जुड़ी होती है और उसमें गुणों का प्रभाव रहता है। जब कोई व्यक्ति मृत्यु के समय शरीर छोड़ रहा होता है, या फिर जीवन में किसी भी स्थिति में हो या सुख-दुःख भोग रहा हो, तब भी विमूढ़ लोग उसे देख नहीं पाते हैं। लेकिन ज्ञान की दृष्टि वाले पुरुष आत्मा को उसकी सच्ची पहचान के साथ ही देख लेते हैं। यह श्लोक बताता है कि मूर्खों का अज्ञान उन्हें इस तथ्य से वंचित रखता है कि आत्मा हमेशा मौजूद रहती है और न तो जन्म लेती है और न ही मरती है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक गीता की ज्ञान योग (Jnana Yoga) परंपरा का एक केंद्रीय सिद्धांत प्रस्तुत करता है, जो सांख्य दर्शन से जुड़ा हुआ है कि आत्मा गुणों के मिश्रण में भी स्वतंत्र और अविनाशी होती है। यह 'अवस्थान' (presence) की अवधारणा को विकसित करता है कि आत्म-साक्षात्कार करने वाला व्यक्ति शरीर, मन और बुद्धि की सभी गतिविधियों के बाहर रहकर उन्हें देखता है लेकिन उनमें लिप्त नहीं होता। यह दृष्टिकोण भक्ति योग (Bhakti Yoga) में भी आधारित है क्योंकि ज्ञान ही ईश्वर-प्रेम का मार्ग प्रशस्त करता है, और कर्म योग के लिए आवश्यक शर्तों को स्पष्ट करता है कि कार्यों को गुणों की दृष्टि से नहीं बल्कि आत्मिक सत्य के साथ करना चाहिए।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है, जो 'पुरुषोत्तम योग' (अध्याय 15) का हिस्सा है। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने शरीर के बंधनों और आत्मिक सत्य की गहरी चर्चा करके अर्जुन को समझाया था कि जीवनाश्रम (जीवनचक्र) एक पेड़ जैसा है जो गुणों से बना होता है। कृष्ण इस श्लोक में यह स्पष्ट करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि युद्ध की तनावपूर्ण स्थिति और अर्जुन का दुःख उनके भीतर 'विमूढ़ता' (अज्ञान) पैदा कर सकता था, जबकि सच्चाई जानना आवश्यक है।
आज के जीवन में
मान लीजिए आपका काम बहुत तनावपूर्ण हो गया है या आपको लगा कि आपकी नौकरी खत्म होने वाली है और आप पूरी तरह से निराश हैं; एक 'विमूढ़' दृष्टिकोण में यह मानेंगे कि आपका सारा अस्तित्व इस कार्यस्थल के साथ समाप्त हो जाएगा। लेकिन अगर आप ज्ञानचक्षु (ज्ञान की आँख) का उपयोग करते हुए देखते हैं, तो आपको पता चलेगा कि आपकी वास्तविक पहचान और शांति उस नौकरी या परिस्थिति से बाहर है, चाहे वह स्थिति आपके पास हो या नहीं। इस दृष्टि को अपनाकर, आप कठिन निर्णय लेने में समर्थ होंगे क्योंकि आपको पता होगा कि आपकी आत्मा किसी भी 'गुणात्मिक' बदलाव के प्रतिरूपित होती है और उसमें न तो कोई जीत है और न ही हार।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
मान लो आप एक जासूस हैं, लेकिन आपकी निगाहें बंद हैं या आपको धुंध दिख रही है; ऐसे में आप कोई चीज़ नहीं देख पाएंगे, भले वह आपके सामने हो। इसी तरह, जब हम 'मूर्ख' होते हैं, तो हम अपने असली स्वयं को (आत्मा) नहीं पहचानते चाहे वो शरीर छोड़ रहा हो या खेल-कूद कर रहा हो। लेकिन अगर आपकी आँखों में 'ज्ञान की रोशनी' होती है, जैसे सुबह का सूरज निकलता है और धुंध दूर करता है, तो आप देख सकते हैं कि आपका असली रूप हमेशा वही रहता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि अंदाज़े न लगाएं, बल्कि अपनी आत्मा को ज्ञान की रोशनी से पहचानें।
दैनिक चिंतन
क्या आप कभी-कभी महसूस करते हैं कि आपके शारीरिक बदलाव या दुखों ने आपको पूरी तरह परिभाषित कर दिया है? श्री कृष्ण का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि विमूढ़ लोग केवल बाहरी रूप और अनुभवों को देखते हैं, जबकि ज्ञानचक्षु वाले आत्मा की अविनाशी पहचान करते हैं। चाहे आप जीवन में कितने भी बदलाव से गुजर रहे हों या सुख-दुःख भोग रहे हों, वह चेतन स्रोत जो इन सब को अनुभव कर रहा है, वही वास्तविक 'आप' है। आज अपनी दृष्टि बाहरी रूपों से हटाकर उस अमर साक्षी में स्थिर करें जिसे न मृत्यु छू सकती है और न ही कोई सुख-दुःख।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के ध्यान में, अपने शरीर को एक अस्थायी वाहन मानें और उसमें रहने वाली आत्मा की पहचान करें। देखिए कि आप कभी भी इस वाहन का त्याग कर रहे हैं (मृत्यु), स्थित होकर काम करते हैं या सुख-दुःख भोगते हुए, लेकिन 'आप' वही अटूत चेतना बने रहें जो इन सबको देखती है। अपने आंतरिक दृष्टि को इस सत्य पर केंद्रित करें कि आप शरीर नहीं हैं।
मुख्य शिक्षाएँ
- आत्मा का सतत स्वरूप (Continuity of the Soul)
यह श्लोक बताता है कि आत्मा जन्म, मृत्यु या जीवन के विभिन्न चरणों में स्थिर रहती है; वह न तो कभी उत्पन्न होती है और न ही लोपात हो जाती। चाहे शरीर का त्याग (मृत्यु) हो रहा हो या भोग-विषयों में निमग्न होना, आत्मा की प्रकृति अप्रभावित बनी रहती है। - ज्ञान और अज्ञान का अंतर (The Distinction of Knowledge vs. Ignorance)
विमूढ़ लोग केवल गुणों से समन्वित शरीर या बाहरी व्यवहार को देखते हैं, जबकि ज्ञानी पुरुष 'ज्ञानचक्षु' द्वारा आत्मा की सच्ची पहचान करते हैं। अज्ञानता में हम अनुभवों की गहराई में खो जाते हैं, लेकिन ज्ञान का प्रकाश हमें उस द्रष्टा के रूप में स्थापित करता है जो सभी घटनाओं से पार है। - तत्व-दर्शन और साक्षी भाव (Witness Consciousness)
यह श्लोक हमें 'साक्षी' के रूप में रहने का मार्ग दिखाता है, जहाँ हम जीवन की सभी स्थितियों—उत्कर्मण या भोगन—को देखते हैं पर उनमें लिप्त नहीं होते। यह दृष्टिकोण विमूढ़ों से अलग है जो शरीर और मन के साथ अपना पूर्ण स्वरूप पहचान लेते हैं, जबकि ज्ञानी व्यक्ति उस चेतना को जानता है जो इन सबका साक्षी है।
विषय
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आगे पढ़ें
- 2.13 — यह श्लोक देहादि-संयोग का वर्णन करता है और आत्मा के अविरल स्वरूप की मूल परिभाषा प्रदान करता है।
- 2.15 — यह सत्य को देखने वाले पुरुष (स्थितप्रज्ञ) का वर्णन करता है जो सुख-दुःख के चरणों में समान रहता है।
- 13.29 — यह श्लोक प्रकृति और पुरुष (आत्मा) के भेद को स्पष्ट करता है, जो इस अध्याय 15 की चर्चा का आधार है।
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