भगवद्गीता 15.9
Purushottama Yoga · हिन्दी अनुवाद
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च | अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ||१५-९||
śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca . adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate ||15-9||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जीवात्मा (आत्मा) पांच ज्ञानेन्द्रियों और मन का आश्रय लेकर संसार के विषयों का अनुभव करती है। यह श्लोक बताता है कि सुनना, देखना, छूना, स्वाद लेना और सूंघना जैसे कार्य मूल रूप से इंद्रियों के माध्यम से होते हैं, लेकिन इनका नियंत्रण मन द्वारा किया जाता है। मुख्य शिक्षा यह है कि हमें अपनी आत्मा को न तो इंद्रियों की गुलामी समझना चाहिए और न ही विषयों में लिप्त होकर उन्हें ही अपना सब कुछ मान लेना चाहिए।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह शिक्षा वेदांत और सांख्य दर्शन के अंतर्गत आती है, जहाँ यह स्पष्ट किया जाता है कि जीवात्मा (जीव) स्वतंत्र है लेकिन इंद्रियों के माध्यम से संसार का अनुभव करता है। इसमें 'ज्ञान योग' की अवधारणा विकसित होती है जिसका उद्देश्य अहंकार को हटाकर यह समझना है कि विषयों का आनंद लेने वाला हमारा असली स्वरूप नहीं, बल्कि इंद्रियों और मन के नियंत्रण वाली शक्ति है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र में स्थित है जहाँ अर्जुन कांटे-से हताश होकर अपने भाई और गुरुओं को मारने से इनकार कर रहे थे। इस समय तक भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मज्ञान, कर्मयोग और निस्वार्थ भावना की शिक्षा दी है, लेकिन अभी भी उनके मन में संशय था कि वे शरीर के ध्वंस से डरे हुए हैं। इस संदर्भ में भगवान अब 'पुरुषोत्तम योग' (अध्याय 15) का प्रारंभ करते हुए जीव की वास्तविक पहचान और इंद्रियों के स्वामित्व को स्पष्ट कर रहे हैं ताकि अर्जुन अपनी स्थिति को समझ सके।
आज के जीवन में
आजकल कई लोग सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करते हुए समय बर्बाद कर देते हैं और जब फोन रखने की बात आती है तो उन्हें मानसिक खालीपन महसूस होता है। इस श्लोक का उपयोग यह समझने में किया जा सकता है कि आपकी 'आत्मा' (आंतरिक शांति) उन इंद्रियों या मन के माध्यम से नहीं चलनी चाहिए जो सिर्फ बाहरी विषयों की तलाश करती हैं। जब भी आपको लगे कि आप अपने फोन, खाने या बातचीत में इतने लिप्त हो गए हैं कि आपके मूल्य बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, तो यह श्लोक एक संकेत है कि 'आप' वही नहीं हैं जो सिर्फ इन इंद्रियों का आनंद ले रहे हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम्हारे पास एक जादुई कार है, जो खुद चलती नहीं है बल्कि तुम्हारी आँखें (चश्मा), कान और हाथ जैसे 'इंस्ट्रूमेंट्स' पर निर्भर करती हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि हमारा असली स्वयं (आत्मा) उस कार के ड्राइवर की तरह है, जो इन इंद्रियों को इतना ही संभालता है ताकि वह दुनिया में कुछ देख सके या सुन सके। जैसे एक अच्छा चालक गाड़ी का ध्यान रखकर सुरक्षित रास्ता चुनता है, वैसे ही हमें अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए विषयों से सही तरीका अपनाना चाहिए।
दैनिक चिंतन
जब भी आप किसी चीज़ को देखते, सुनते या छुआते हैं, तो क्षण भर रुककर यह समझें कि 'मैं' वह इंद्रियां नहीं हूँ बल्कि उनका प्रयोगकर्ता हूँ। अक्सर हम विषयों के पीछे भागते हुए अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाते हैं, लेकिन कृष्ण की यह शिक्षा आपको याद दिलाती है कि आप इन उपकरणों से परे हैं। आज इस चेतना के साथ जिएं कि विषय-सेवन करना एक खेल है जो 'मैं' नहीं करता, बल्कि इंद्रियों और मन का संयोग चलता रहता है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज की साधना में अपने इंद्रियों और मन को एक साथ केंद्रित करें। जब भी कोई विषय आपके पास आए, तो केवल उसकी अनुभूति न करके याद रखें कि इन सबका संचालन करने वाला आपका आत्मा-स्वरूप है जो इन्हों से भिन्न है।
मुख्य शिक्षाएँ
- इंद्रियों की प्रकृति और भूमिका
श्रोत्र, चक्षु आदि केवल बाह्य जगत से संपर्क करने वाले साधन हैं, जो स्वयं नहीं देखते या सुनते। वे मन का वाहन बनकर बाहर की ओर धकेले जाते हैं और विषयों को ग्रहण करते हैं। - मन: इंद्रियों के नियंत्रक
इंद्रियां बिना मन के दिशाहीन होती हैं; मन ही इन्हें आश्रित करके विषयों का सेवन कराता है। यह संयोग जीव को जगत में बंधा हुआ अनुभव करने की शक्ति प्रदान करता है। - अभिन्न स्वरूप का साक्षात्कार
जीव इंद्रियों के माध्यम से विषयों का आनंद लेता है, लेकिन यह जानना आवश्यक है कि वह स्वयं इन उपकरणों की नहीं बल्कि उनके प्रयोगकर्ता है। इस अंतर को समझने पर ही भौतिक संवेदनों में भी निरपेक्ष स्थिति प्राप्त होती है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — इसमें कर्मफल की आस से मुक्ति और इंद्रियों पर नियंत्रण का सिद्धांत दिया गया है, जो वर्तमान श्लोक के बाद अनुपालन के लिए महत्वपूर्ण है।
- 3.6 — यह श्लोक उन लोगों की बात करता है जिनके इंद्रियां विषयों से बंधी हैं लेकिन मन में विलास नहीं, जो इस अध्याय के संदर्भ को गहरा करेगा।
- 12.8 — इंद्रियों और मन का पूर्णतः कृष्ण पर समर्पण करने की बात करते हुए यह आगे की प्रगति के लिए एक उत्कृष्ट मार्गदर्शक है।
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