भगवद्गीता 13.7
Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ||१३-७||
icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṃghātaścetanā dhṛtiḥ . etatkṣetraṃ samāsena savikāramudāhṛtam ||13-7||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मानव शरीर और मन एक 'क्षेत्र' (फील्ड) है। इस क्षेत्र में इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, चेतना और धैर्य जैसे गुण विकारों के रूप में रहते हैं। कृष्ण इन सभी का संक्षिप्त विवरण देकर बता रहे हैं कि हमारी आत्मा से भिन्न यह शरीर-मन कैसे बदलता है और प्रभावित होता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'ज्ञान योग' और 'सांख्य दर्शन' की एक प्रमुख अवधारणा है जो आत्मा (क्षेत्रज्ञ) को शरीर-मन के गुणों से अलग करता है। यह बताता है कि सुख, दुःख या इच्छा जैसे विकार न तो हमारी वास्तविक पहचान हैं और न ही वे स्थायी होते हैं; ये केवल 'क्षेत्र' (शरीर-मन) की अवस्थाएं हैं जो बदलती रहती हैं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जब अर्जुन ने हथियार फेंककर क्रूरता से लड़ने से इनकार कर दिया था। इससे पहले कृष्ण ने 'क्षेत्र' (शरीर) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/पुरुष) के बीच का भेद स्पष्ट करना शुरू किया है, जो सांख्य दर्शन की नींव रखता है। अर्जुन अपनी संभ्रम स्थिति में थे, इसलिए कृष्ण ने शरीर और मन के प्रकृत स्वरूप को समझाकर उन्हें विवेक (ज्ञान) का मार्ग दिखाया ताकि वे अपने धर्म से हट सकें।
आज के जीवन में
आज की भागदौड़ भरे जीवन में, जब काम पर भारी तनाव हो या परिवार के साथ कोई गंभीर झगड़ा हुआ हो, तो हम अक्सर 'इच्छा' और 'द्वेष' में फंस जाते हैं। इस श्लोक का अनुप्रयोग यह है कि आप इन भावनाओं को अपने असली स्वभाव (आत्मा) से नहीं जोड़ें; बल्कि उन्हें मन के परिवर्तनशील गुणों के रूप में देखें जैसे बादलों की तरह आने-जाने वाले। जब हम दुख या सुख पर इतना प्रतिक्रिया न करें कि वह हमारे निर्णय (धृति) को बाहर ले जाए, तो हम स्थिर मानसिकता से कठिन फैसले ले पाते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम्हारा शरीर एक बड़ा खेत (field) है जिसमें अलग-अलग पौधे उगते हैं, जैसे सुख के हरे पत्तों या दुःख की कांटेदार झाड़ियाँ। कभी हमें कुछ बहुत अच्छा लगता है (इच्छा), तो कभी बुरा (द्वेष) और कभी हम थक जाते हैं पर रुके नहीं रहते (धृति/हिम्मत)। भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि यह सब खेत के अंदर होने वाले बदलाव हैं, न कि तुम स्वयं; इसलिए चिंतित मत होकर बस इन भावों को देखो और आगे बढ़ते रहो।
दैनिक चिंतन
प्रिय पाठक, क्या आपको कभी लगा है कि सुख और दुख आपके भीतर एक साथ रहते हैं? भगवान श्रीकृष्ण इस पद में बताते हैं कि ये सभी अनुभव—इच्छा से लेकर धृति तक—शरीर के क्षेत्र का हिस्सा हैं। जब आप इन भावों को 'मेरा' कहकर नहीं, बल्कि 'यह शरीर है' समझ कर देखेंगे, तो मन की भटकाव कम होगी और आपको अपनी सच्ची चेतना मिलेगी। आज के दिन किसी भी दुख या सुख में फंसने के बजाय, उसको एक साक्षी की तरह स्वीकार करें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन को शांत करके उस स्थूल शरीर (संघात) के भीतर होने वाले भावों—इच्छा और द्वेष, सुख और दुख—को एक गवाह की तरह देखें। इन विकारों का अनुभव करें लेकिन उन्हें 'मैं' कहकर पहचानने से बचें, क्योंकि वे क्षेत्र के गुण हैं, आपकी आत्मा नहीं।
मुख्य शिक्षाएँ
- शरीर और आत्मा का भेद (Kshetra vs Kshetrajna)
इस पद में 'इच्छा, द्वेष' जैसे सभी गुणों को क्षेत्र के लक्षण बताए गए हैं। इसका तात्पर्य यह है कि शरीर और उससे जुड़े मन-विकार बदलते रहते हैं, जबकि ज्ञानकर्ता आत्मा इनमें शामिल नहीं होती। - संघात: स्थूल देह का स्वरूप
'संघात' शब्द से तात्विक रूप से पंचमहाभूतों के संयोग को समझा गया है जो हमें एक भौतिक आवरण प्रदान करता है। यहReminder देता है कि हमारा शरीर अस्थायी और विनाशशील है, न कि हमारी सच्ची पहचान। - धृति: आत्मा की स्थिरता
अंत में 'धृति' (संयम/स्थैर्य) का उल्लेख यह दर्शाता है कि क्षेत्र के विकारों के बावजूद भी चेतना को संभालने वाली शक्ति हमारे पास होती है। जब तक अहंकार नहीं टूटता, धृति का सही उपयोग नहीं हो पाता और वह केवल दमन बनकर रह जाती है।
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