भगवद्गीता 13.26

Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 13.26 — "परन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, व"
भगवद्गीता 13.26 — Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
संस्कृत

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते | तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ||१३-२६||

लिप्यंतरण

anye tvevamajānantaḥ śrutvānyebhya upāsate . te.api cātitarantyeva mṛtyuṃ śrutiparāyaṇāḥ ||13-26||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो लोग स्वयं आत्म-ज्ञान नहीं प्राप्त कर पाते, लेकिन दूसरों के बताए हुए मार्ग पर चलकर भक्ति या उपासना करते हैं, वे भी मृत्यु को पार करने में सफल होते हैं। यह श्लोक इस बात की पुष्टि करता है कि निष्काम कर्म और गुरुओं से प्राप्त ज्ञान का आचरण करना ही मोक्ष के लिए पर्याप्त है। भगवान ने स्पष्ट किया है कि स्वयं सीधे दार्शनिक सत्य को जानना अनिवार्य नहीं, बल्कि श्रुतियों (पवित्र ग्रंथों) और आचार्यों के मार्ग का पालन करना भी अंत तक पहुँचा सकता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ज्ञान योग और भक्ति योग के संगम पर स्थित है, जो स्पष्ट करता है कि आत्म-साक्षात्कार (direct realization) न होने पर भी, श्रुतियों और गुरुओं की अनुज्ञा से किये जाने वाले उपासना का मार्ग मोक्ष में ले जाता है। यह 'श्रीमद्भगवद्गीता' के दार्शनिक तत्व को समझने में मदद करता है कि भक्ति और श्रद्धा भी ज्ञान की पूर्ण अवस्था तक पहुँचने वाले एक वैध साधन हैं, न कि केवल दूसरे स्तर का उपाय।

शब्दार्थ
अन्ये others, तु indeed, एवम् thus, अजानन्तः not knowing, श्रुत्वा having heard, अन्येभ्यः from others, उपासते worship, ते they, अपि also, च and, अतितरन्ति cross beyond, एव even, मृत्युम् death, श्रुतिपरायणाः regarding what they have heard as the Supreme refuge
पारंपरिक भाष्य
The three paths, viz., the Yoga of meditation, the Yoga of knowledge, and the Yoga of action to attain the knowledge of the Self were described in the previous verse. In this verse the Yoga of worship is described. Some who are ignorant of the methods described in the previous verse listen to the teachings of the spiritual preceptors regarding this great Truth or the Self with intense and unshakable faith, solely depending upon the authority of others instructions, and through constant remembrance and contemplation of them attain immortality. They are devoted to their preceptor. Some study the books written by realised seers, stick with great faith to the teachings contained therein and live according to them. They also overcome death. Whichever path one follows, one eventually attains the knowledge of the Self and final liberation from birth and death? -- salvation (Moksha). There are several paths to suit aspirants of different temperaments and eipments. Freeing oneself from ignorance with its effects through the knowledge of the Self, is crossing the Samsara or attaining immortality or overcoming death or obtaining release or salvation.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश भाग है, जो 'क्षेत्र-क्षेत्ज्ञान विभाग योग' (अध्याय 13) का हिस्सा है। इस समय तक कृष्ण ने आत्म और शरीर के अंतर, तथा ज्ञान की आवश्यकता पर चर्चा कर दी थी, जिससे अर्जुन को भ्रम दूर करने में मदद मिली थी लेकिन फिर भी उनमें संशय था कि क्या दूसरे लोग बिना सीधे अनुभव किये मुक्ति पा सकते हैं। इस श्लोक के माध्यम से कृष्ण अर्जुन और युद्धक्षेत्र पर मौजूद सभी सैनिकों को यह सुनिश्चित करते हैं कि भगवद्भक्त या गुरु-परायण लोग भी मोक्ष की प्राप्ति में विफल नहीं होंगे।

आज के जीवन में

आज के समय में एक व्यक्ति कई बार नौकरी का बदलाव या घर की जिम्मेदारी जैसे बड़े फैसले लेने से डरता है क्योंकि उसे लगता है कि वह सभी नियम और सटीक ज्ञान नहीं जानता। ऐसे में, यदि वह अपने अनुभवी मार्गदर्शक (mentor), गुरु, या विश्वसनीय पुस्तकों की सिफारिशों पर भरोसा करके कर्म करता है, तो भी वह जीवन के संघर्ष और डर को पार करने में सक्षम हो जाता है। यह श्लोक हमें बताता है कि पूर्ण ज्ञान का इंतजार किए बिना, किसी अच्छे मार्गदर्शक से सीखकर चलने वाला व्यक्ति भी अपने लक्ष्य (जैसे करियर की सफलता या मानसिक शांति) को प्राप्त कर सकता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम एक नए गेम की खेलने वाले हो, लेकिन नियम नहीं जानते। अगर तुम किसी अनुभवी खिलाड़ी (जैसे तुम्हारे माता-पिता या टीचर) से पूछो और वही बताएं कि कैसे खेला जाए, तो क्या तुम जीत सकते हो? हाँ! यहाँ भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि अगर हम स्वयं नहीं जान पाते भी, लेकिन किसी समझदार गुरु या पुरानी किताबों (श्रुति) से सही रास्ता सीखकर चलें, तो हम जीवन की सबसे बड़ी चुनौती 'मृत्यु' को आसानी से पार कर सकते हैं।

दैनिक चिंतन

क्या हमारा धर्म अक्सर सिर्फ शब्दों तक सीमित रह जाता है? जब आप किसी गुरु या पवित्र ग्रंथ से सुनकर उपासना करते हैं, तो यह एक महान आशीर्वाद है जो आपको मृत्यु के भय से बाहर निकाल सकता है। लेकिन सच्चा ज्ञान तभी प्राप्त होता है जब श्रवण को अपने अंदर की वास्तविकता में परिवर्तित किया जाता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने भीतर श्रवण और अनुभव के बीच का अंतर समझने की प्रार्थना करें। जो ज्ञान आप दूसरों से सुनकर ग्रहण करते हैं, उसे हृदय में उतारें ताकि वह केवल सूचना न रह जाए बल्कि आत्म-साक्षात्कार बन जाए।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. श्रुति का महत्व और सीमाएँ
    यह श्लोक बताता है कि दूसरों से सुनकर (परंपरा के माध्यम से) उपासना करना भी मृत्यु को पार करने में सहायक होता है। हालांकि, यह तब तक अपूर्ण रह जाता है जब व्यक्ति स्वयं उस तत्व का अनुभव नहीं करता।
  2. अनज्ञान और ज्ञान की स्थिति
    'एवेम' (इस प्रकार) शब्द संकेत देता है कि वे जो व्यक्ति स्वयं कर्क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ तत्व को नहीं जानते, केवल दूसरों पर निर्भर हैं। इस अनजानावस्था में भी आस्था और अनुसरण का मार्ग मृत्यु से मुक्ति दिला सकता है।
  3. श्रृतिपरायणता की शक्ति
    'श्रुतिपरायणाः' होने वाले वे लोग हैं जो गुरु और शास्त्र के वचनों को सर्वोच्च साधन मानते हैं। उनके लिए ज्ञान का स्रोत बाहरी नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाला एक विश्वसनीय मार्ग है जिससे वे मृत्यु को पार कर जाते हैं।

विषय

मोक्ष प्राप्ति के साधनश्रुतियों का महत्वगुरु-शिष्य परंपराभक्ति और ज्ञान का संगमअज्ञानी लोगों की उपासनामृत्यु से पार पाकर

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आगे पढ़ें

  1. 13.24 — इससे पहले के संदर्भ में श्री कृष्ण यह समझाते हैं कि आत्मा और परमात्मा का संबंध क्या है, जो 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' की चर्चा को पूरा करता है।
  2. 13.27 — इस श्लोक में भगवान यह बताते हैं कि सर्वत्र स्थित आत्मा को देखकर मनुष्य पारमार्थिक ज्ञान प्राप्त करता है, जो अनुभव के महत्व पर बल देता है।
  3. 18.59 — अंतिम अध्याय में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यदि वे श्रवण और अनुभव के द्वारा मृत्यु को पार करते हैं, तो उन्हें क्या करना चाहिए।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या स्वयं ज्ञान के बिना सिर्फ दूसरों से सुनकर मोक्ष संभव है?
हाँ, भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो लोग स्वयं आत्म-ज्ञान नहीं प्राप्त कर पाते लेकिन गुरुओं या श्रुतियों (पवित्र ग्रंथों) के मार्ग पर चलकर उपासना करते हैं, वे भी मृत्यु को पार करने में सफल होते हैं। यह दर्शाता है कि अनुभवजन्य ज्ञान अनिवार्य नहीं है, बल्कि श्रद्धा और आचरण काफी हैं।
'श्रुतिपरायण' का अर्थ क्या है?
'श्रुतिपरायण' उन लोगों को कहा जाता है जिनका समर्पण श्रवण (सुनने) और पवित्र ग्रंथों की शिक्षाओं पर आधारित होता है। वे जो कुछ भी सुनते हैं, उसे अपने लिए सर्वोच्च मार्ग मानकर उसकी अनुपालना करते हैं। यह भक्ति और आचरण का एक उच्च स्तर दर्शाता है।
यह श्लोक किस संदर्भ में बोला गया था?
यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है, जो 'क्षेत्र-क्षेत्ज्ञान विभाग योग' (अध्याय 13) का हिस्सा है। इसमें कृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ज्ञान या भक्ति के किसी भी मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करने में सफल हो सकता है, चाहे वह स्वयं सीधा अनुभव न करता हो।
क्या इस श्लोक का अर्थ यह है कि ज्ञान की आवश्यकता नहीं है?
नहीं, इसका अर्थ यह नहीं है कि ज्ञान की कोई जरूरत नहीं है; बल्कि यह कहना है कि यदि स्वयं पूर्ण ज्ञान प्राप्त न हो सके तो भी श्रद्धा और गुरुओं के मार्ग का पालन करने वालों को मोक्ष मिलता है। अंत में, कृष्ण सभी साधकों को समझते हैं लेकिन 'श्रुतिपरायण' होने वाले लोगों की उपासना को भी पूर्ण रूप से स्वीकार करते हैं और उन्हें मृत्यु-परिहार का वादा देते हैं।
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