भगवद्गीता 13.11

Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 13.11 — "अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के "
भगवद्गीता 13.11 — Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
संस्कृत

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी | विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ||१३-११||

लिप्यंतरण

mayi cānanyayogena bhaktiravyabhicāriṇī . viviktadeśasevitvamaratirjanasaṃsadi ||13-11||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि ईश्वर में निस्संतान भक्ति का पालन करना सबसे महत्वपूर्ण साधना है। इसमें दो मुख्य पहलू हैं: एक तो यह है कि व्यक्ति को एकांत और शांति स्थलों में रहने की प्रवृत्ति होनी चाहिए, और दूसरा यह कि असंस्कृत या अधार्मिक लोगों के भीड़भाड़े से दूर रहना चाहिए। कृष्ण कहते हैं कि जब मन ईश्वर पर पूर्णतः केंद्रित होता है तो बाहरी दुनिया की व्यस्तता उसे प्रभावित नहीं कर पाती और वह अव्यभिचारी (अटल) भक्ति का अनुभव करता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह उपदेश 'भक्त योग' और 'ज्ञान योग' के संगम पर स्थित है, जो कृष्ण की सिद्धांतों में 'कर्मयोगी' बनने का आधार बनाता है। यह श्लोक 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग' (अध्याय 13) के भीतर आत्म-साक्षात्कार और ईश्वरीय भक्ति को जोड़ते हुए सिद्ध करता है कि बाह्य संसर्ग से मुक्तता ही आंतरिक एकाग्रता की कुंजी है। यह दर्शाता है कि असली योग कर्म करने में नहीं, बल्कि मन का पूर्णतः ईश्वर पर अडिग होना और भीड़-भाड़े के प्रभावों से दूर रहने में निहित है।

शब्दार्थ
मयि in Me, च and, अनन्ययोगेन by the Yoga of nonseparation, भक्तिः devotion, अव्यभिचारिणी unswerving, विविक्तदेशसेवित्वम् resort to solitary places, अरतिः distaste, जनसंसदि in the society of men
पारंपरिक भाष्य
The man of wisdom is firmly convinced that there is nothing higher than Me and that I am the sole refuge. He has unflinching devotion to Me through Yoga without any thought,for other objects. His mind has merged or entered into Me. Just as a river, when it merges itself in the ocean becomes completely one with it, even so he, being united with Me, worships only Me. This is Ananya Yoga or Aprithak Samadhi (Yoga of nonseparation or the superconscious state in which the devotee feels that he is nondistinct from God). Such devotion is a means of attaining knowledge. Such a devotee will never give up his devotion and worship even when he is under great trials and adversities. Viviktadesasevitvam He lives on the banks of sacred rivers, in caves, in the mountains, on the shores of seas or lakes and in beautiful solitary gardens where there is no fear of serpents, tigers or thieves. In solitary places the mind is ite calm. There are no disturbing elements that can distract ones attention. You can have uninterrupted meditation on the Self and can enter into Samadhi ickly. Society of men Distaste for the society of worldlyminded people, not of the wise, pure and holy. Satsanga or association with the wise is a means to the attainment of the knowledge of the Self.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया एक संदेश है, जब अर्जुन अपने ही कुटुंब वालों से लड़ने की स्थिति में उदास और विवश थे। इससे पहले कृष्ण ने ज्ञान योग (ज्ञान) और ब्रह्म का स्वरूप समझाया था कि आत्मा अविनाशी है, लेकिन अब वे प्रेम मार्ग या भक्ति के माध्यम से उस स्थिति में वापस लौटने की बात कर रहे हैं। अर्जुन को यह बताते हुए कृष्ण कह रहे हैं कि युद्ध का कर्तव्य निभाने के लिए मन को एकता और ध्यान की आवश्यकता है, न कि शोर-शराबे वाली भीड़ में रहने से।

आज के जीवन में

मान लीजिए आपकी कंपनी में बहुत सारे विवाद हैं और सभी लोग गossip या अनावश्यक चर्चाओं में लिप्त हैं जो आपके मानसिक शांति को नष्ट कर रही है। इस श्लोक के अनुसार, आपको कुछ समय के लिए उन व्यस्तताओं से दूर होकर किसी शांत स्थान पर जाना चाहिए जहाँ आप अपने काम और लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। यह अकेलापन नहीं बल्कि एक स्पष्ट मानसिक स्थिति है जो आपको निर्णय लेने की शक्ति देती है ताकि आप अपनी भूमिका (कर्तव्य) को बिना किसी बाधा के निभा सकें।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम अपने पसंदीदा खिलौने या किसी अच्छे दोस्त के साथ खेल रहे हो, लेकिन अजीबोगरीब और शोर मची भीड़ ने आकर सबको परेशान कर दिया। ऐसे में अगर तुम एक शांत कमरे में जाओ जहाँ कोई नाराज नहीं है, तो तुम्हें अपने खिलौने या दोस्त के साथ खेलना बहुत ज्यादा अच्छा लगेगा। श्री कृष्ण कहते हैं कि जब हम ईश्वर से प्यार करते हैं, तो हमें ऐसे शांत और अकेले स्थानों में रहना चाहिए जहाँ कोई शोर न हो ताकि हम अपने प्रेम को पूरी तरह दे सकें।

दैनिक चिंतन

आज आपने महसूस किया होगा कि जब हम भीड़-भाड़ और अनावश्यक वार्तालाप में खो जाते हैं, तो आंतरिक शांति और ईश्वर की याद धीमी हो जाती है। असली भक्ति का मार्ग 'अन्योन्यायोग' यानी केवल कृष्ण को ही लक्षित करके चलना है, न कि किसी अन्य वस्तु में मन लगाकर। जब आप अपने लिए एक शांत स्थान चुनेंगे और संसारी व्यक्तियों की अनावश्यक संगति से हटेंगे, तो आपको पाएंगे कि प्रेम का धारा कैसे शुद्ध हो रही है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन को उस एकान्त स्थल की ओर ले जाएं जहाँ बाहरी शोर नहीं है, और वहां भगवान श्री कृष्ण में अपनी समर्पणाभावना को केन्द्रित करें। इस अवस्था में स्वयं से पूछें कि क्या मैं किसी अन्य उद्देश्य या व्यर्थ संवादों से दूर होकर निष्काम भक्ति कर पा रहा हूँ?

मुख्य शिक्षाएँ

  1. अन्योन्यायोग में भक्ति (Uninterrupted Devotion)
    यह श्लोक बताता है कि सच्ची भक्ति वह है जो 'avyabhicāriṇī' हो, अर्थात बिना रुकावट या विचलन के निरंतर बनी रहे। इसमें ईश्वर को छोड़कर किसी और में आस्था नहीं रखी जाती, जिससे प्रेम एकपक्षीय और शुद्ध बन जाता है।
  2. एकांत स्थान की आवश्यकता (Seclusion for Growth)
    'viviktadeśa' या विलगित स्थल में रहना, मन को बाहरी व्यस्तताओं से मुक्त करके ईश्वर के चिंतन में गहराई लाने का एक साधक उपाय है। यह शारीरिक अलग होना नहीं, बल्कि मानसिक रूप से संसार की झंझटों से दूरी बनाने को कहता है।
  3. जन-संगति में अरुचि (Detachment from Worldly Company)
    'janasaṃsadi arati' का तात्पर्य उन लोगों की भीड़ से दूर रहने के लिए है जिनका चिंतन ईश्वर नहीं, बल्कि संसारिक वासनाओं पर केंद्रित होता है। यह अरुचि किसी को नफरत करने में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक प्रगति की गति से बाधा बनने वाले विषयों के प्रति स्वाभाविक असंवेदना है।

विषय

भक्ति योग (Bhakti Yoga)एकांत और वनवास (Solitude and Seclusion)संसार से वैराग्य (Detachment from Worldly Life)मन की एकाग्रता (Mental Focus)अव्यभिचारिणी भक्ति (Unswerving Devotion)क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान (Knowledge of Field and Knower)

संबंधित श्लोक

2.473.304.186.518.66

आगे पढ़ें

  1. 2.61 — इस श्लोक के बाद यह पढ़ना चाहिए क्योंकि इसमें इन्द्रियों को वश में करना और मन का संयम बताया गया है, जो एकान्त स्थल की तैयारी करता है।
  2. 3.6 — इससे जुड़ाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि केवल बाहरी वन में रहना पर्याप्त नहीं, बल्कि मन को भी संयम से चलाना आवश्यक है।
  3. 12.9 — इस श्लोक का चिंतन करने से 'अन्योन्यायोग' (केवल ईश्वर पर ध्यान) के सिद्धांत को और गहराई समझ में आएगी।

अनुशंसित पुस्तकें

GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.

इस श्लोक को साझा करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्लोक में 'अनन्ययोग' और 'अव्यभिचारिणी भक्ति' का क्या संबंध है?
'अनन्ययोग' का अर्थ है ईश्वर को छोड़कर किसी अन्य आकर्षण या उद्देश्य के लिए न रहना, यानी पूर्ण एकाग्रता। 'अव्यभिचारिणी भक्ति' उसी अवस्था में स्थिर और निस्संतान प्रेम की भावना है जो कभी भी नहीं बदलती। जब व्यक्ति अनन्य योग का पालन करता है, तो ही वह अव्यभिचारी (अटल) होकर ईश्वर से जुड़ पाता है।
क्या इसका मतलब यह है कि हमें समाज या परिवार से पूरी तरह कटाव लेना चाहिए?
नहीं, इसका अर्थ पूर्ण नकारात्मक विलगन नहीं बल्कि मन की एकाग्रता के लिए आवश्यक 'मानसिक दूरी' है। जब भीड़-भाड़े या शोर से भरे माहौल में ध्यान बिखर जाता है और हमारा कर्म या उद्देश्य विचलित हो रहा होता है, तो अकेलापन (विविक्त देश) मन को पुनः संतुलित करने के लिए एक उपकरण है। यह बाहर की दुनिया से हटने का आग्रह नहीं है, बल्कि भीड़ में खोए बिना अपने लक्ष्य पर टिके रहने की कला सिखाता है।
'जनसंसदि' (लोगों के समूह) से अरति का क्या तात्पर्य है?
यहाँ 'अरति' का मतलब लोगों को नफरत करना नहीं, बल्कि उन गड़बड़ी भरी या विचलित करने वाली स्थितियों में रहने की इच्छाशक्ति का अभाव होना है। जब व्यक्ति ईश्वर या आध्यात्मिक लक्ष्य पर केंद्रित होता है, तो वह ऐसे माहौलों से दूर भागता है जहाँ शोर, गपशप और असंस्कृत व्यवहार होते हैं जो मानसिक शांति को नष्ट करते हैं। यह एक स्वस्थ प्रवृत्ति है जो व्यक्ति को अपनी उच्च अवस्था में बनाए रखने में मदद करती है।
क्या आज के डिजिटल युग में इस श्लोक का अनुसरण करना संभव है?
हाँ, यह आधुनिक जीवन में और भी अधिक प्रासंगिक है क्योंकि डिजिटल दुनिया हमें निरंतर 'जनसंसदि' (सार्वजनिक चर्चाओं और सोशल मीडिया की भीड़) से जोड़े रखती है। इसका अनुसरण करने का अर्थ यह नहीं कि हम समाचार या दोस्तों को छोड़ दें, बल्कि नियमित रूप से डिजिटल शोर से दूर होकर एकांत स्थानों में ध्यान और प्रार्थना के लिए समय निकालें। ऐसा एक शांत मन बनाता है जो भीड़-भाड़े की गतिशीलता के बावजूद अपने कर्म और ईश्वर पर अडिग रह सकता है।
अन्य भाषाओं में: भगवद्गीता 13.11 →