भगवद्गीता 13.10
Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु | नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||१३-१०||
asaktiranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu . nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu ||13-10||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि आत्म-ज्ञान का एक प्रमुख लक्षण बाहरी वस्तुओं में लगाव न होना है। इस श्लोक के अनुसार, पुत्र, पत्नी और घर जैसे संबंधों से तादात्म्य (स्वयं उन्हें 'अपने' समझकर) नहीं रखना चाहिए। साथ ही, जीवन में जो सुख या दुःख मिले, उसे स्वीकार करते हुए मन को स्थिर और संतुलित बनाए रखना आवश्यक है। यह गीता का मूल सिद्धांत है कि हमें कर्म करने के लिए प्रेरित होना चाहिए, परिणामों में नहीं लिप्त रहना चाहिए।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक मुख्य रूप से 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) और 'सांख्य दर्शन' के सिद्धांतों पर आधारित है, जो आत्मा और मनोवृत्तियों में भेद करने की शिक्षा देता है। यह कर्मयोग का एक महत्वपूर्ण स्तर भी बताता है कि सही कर्म तभी हो सकता है जब व्यक्ति फलों (परिणाम) के प्रति निष्पक्ष और निर्लिप्त होता है। इसका उद्देश्य 'मोह' को तोड़ना है जो आत्मा को शरीर, संतान और वस्तुओं से बांधकर रखता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
भगवद्गीता का यह अध्याय कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में हुआ था, जहाँ अर्जुन ने अपने गुरों और स्वजन को मारने से इंकार कर दिया था क्योंकि वे उन्हें 'अपना' समझ रहे थे। भगवान कृष्ण अब उसे आत्म-तत्व (शरीर और आत्मा के अंतर) की व्याख्या दे रहे हैं, जो किक्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग का हिस्सा है। इस संदर्भ में, कृष्ण यह बता रहे हैं कि कैसे एक साधक को शारीरिक संबंधों से मनोवैज्ञानिक दूरी बनाते हुए भी अपने धर्म पर अडिग रहना चाहिए।
आज के जीवन में
आज के समय जब नौकरी का डर या परिवार की जिम्मेदारियों में तनाव हो, तो इस श्लोक का अनुसरण करना यह है कि आप अपनी पूरी मेहनत करें लेकिन परिणामों (बोनस, प्रमोशन) को लेकर चिंतित न हों। जब घर में कोई अनचाहा संवाद या बुरी खबर आती है, तो तत्काल क्रोध करने के बजाय एक पल रुककर मन को स्थिर रखना ही 'इष्टानिष्ट उपपत्तिषु समचित्तत्व' का अभ्यास है। यह दृष्टिकोण आपको अत्यधिक सफलता की लत या विफलता से हुए गहरे दुःख दोनों से मुक्त कराएगा और आपका मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखेगा।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे तुम एक पेंटिंग बना रहे हो और वह तेरी रचना है, लेकिन अगर कोई उसे गिरा दे या तोड़ दे, तो क्या तुम रोओगे? इस श्लोक का मतलब है कि हम अपने परिवार और घर से बहुत प्रेम करें, लेकिन यह न भूलें कि वे अलग-अलग इंसान हैं, 'हम' नहीं। जब कोई अच्छी चीज मिलती है या बुरी बात होती है, तो मन को चिढ़ने या डरने के बजाय शांत और संतुलित रहना चाहिए, जैसे एक पहाड़ हवा में भी स्थिर खड़ा होता है।
दैनिक चिंतन
आप अक्सर उन चीजों को अपने होने से जोड़ लेते हैं जिनका आपको पूर्ण नियंत्रण नहीं है, जैसे परिवार या घर। कृष्ण की इस उपदेश में यह स्पष्ट किया गया है कि वास्तविक शांति तभी मिलती है जब आप इन पदार्थों के प्रति 'तादात्म्य' (स्वयं को समझने) का त्याग करते हैं। चाहे जीवन आपको सुख दे या दुःख, यदि आपका मन समान बना रहेगा तो ही आप असीम शांति प्राप्त कर पाएंगे।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने मन को पुत्र, पत्नी और घर की ओर होने वाले अत्यधिक आसक्ति से मुक्त करने का अभ्यास करें। जब भी कोई इष्ट या अनिष्ट घटित हो, तो अपना हृदय स्थिर रखकर समान दृष्टि बनाए रखने का प्रयास करें कि आप केवल साक्षी हैं।
मुख्य शिक्षाएँ
- निरासक्ति का मार्ग (Path of Non-Attachment)
पुत्र, पत्नी और गृह आदि के प्रति अत्यधिक लगान या तादात्म्य न रखना ही 'अभिष्वङ्ग' का अभाव है। यह स्वीकार करना कि ये सभी कालिक हैं और हमारा वास्तविक स्वत्व नहीं, मन को स्थिरता प्रदान करता है। - समचित्तता या समभाव (Equanimity)
इष्ट (प्राप्त होने वाली खुशी) और अनिष्ट (दुःख या हानि) दोनों की प्राप्ति में मन को एक जैसा रखना 'समचित्त' होना है। यह भाव हमें दुनिया के द्वंद्वों से मुक्त करके आत्म-ज्ञान की ओर ले जाता है। - क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद (Distinction between Field and Knower)
यह शिक्षा हमें यह समझने में मदद करती है कि शरीर और परिवार 'क्षेत्र' हैं, जबकि आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' या साक्षी है। क्षेत्र के साथ अपनी पहचान न मिलाकर केवल ज्ञानी बने रहना ही मोक्ष का मार्ग है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — कर्म फल के आसक्त न होने और कर्तव्य पालन पर आधारित यह श्लोक इस अध्याय के विषय 'निष्काम कर्म' को गहराई से समझने में मदद करता है।
- 3.27 — इसमें बताया गया है कि प्रकृति ही सभी क्रियाओं का कारण है और हम केवल साक्षी हैं, जो 'अभिष्वङ्ग' (तादात्म्य) को तोड़ने में मदद करता है।
- 12.15 — यह श्लोक उस आदर्श भक्त का वर्णन करता है जो सभी जीवों के लिए समान भाव रखता है, जो 'समचित्त' होने की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।
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