भगवद्गीता 11.2

Vishvarupa Darshana Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 11.2 — "हे कमलनयन ! मैंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय आपसे विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपका अव्यय माहात्म्य (प"
भगवद्गीता 11.2 — Vishvarupa Darshana Yoga
संस्कृत

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया | त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ||११-२||

लिप्यंतरण

bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā . tvattaḥ kamalapatrākṣa māhātmyamapi cāvyayam ||11-2||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण को सम्मानपूर्वक 'कमलपत्राक्ष' (कमलों जैसी आँखों वाले) कहकर संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वे अब तक भूतों की उत्पत्ति और प्रलय के विस्तृत वर्णन को आपसे सुन चुके हैं, जो उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। साथ ही, उन्होंने कृष्ण का यह भी स्वीकार किया है कि वह अव्यय (नाश न होने वाला) माहात्म्य या दिव्य प्रभाव भी उनसे विस्तार से संपर्कित हुआ है। इसमें अर्जुन की उस घटना के बाद की गहरी समझ और आश्चर्य व्यक्त होता है जो उन्होंने महा-विग्रह (Cosmic Form) को देखने के बाद अनुभव किया था।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक वेदान्त के 'अद्वैत' और भगवद्गीता की 'भक्त-ज्ञान योग' की गहराइयों को दर्शाता है, जहाँ जीवात्मा (आत्मा) का अस्तित्त्व परम ब्रह्म में निरंतर बना रहता है। यह कर्म के चक्र (सृष्टि और प्रलय) को समझने वाले 'ज्ञान' की अवस्था को प्रतिबिंबित करता है, जहाँ दार्शनिक सत्य यह है कि भूतों का उत्पत्ति-प्रलय द्वंद्व बाहरी दुनिया में चलता रहता है लेकिन आत्मा और ईश्वर (कृष्ण) का माहात्म्य अव्यय अर्थात नष्ट नहीं होता।

शब्दार्थ
भवाप्ययौ the origin and the dissolution, हि indeed, भूतानाम् of beings, श्रुतौ hav been heard, विस्तरशः in detail, मया by me, त्वत्तः from Thee, कमलपत्राक्ष O lotuseyed, माहात्म्यम् greatness, अपि also, च and, अव्ययम् inexhaustible
पारंपरिक भाष्य
Kamalapatraksha Lotuseyed or having eyes like lotuspetals. Kamalapatra also means knowledge of the Self. He who can be obtained by knowledge of the Self is Kamalapatraksha.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर तब बोला गया है जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण से अपने विग्रह (Cosmic Form) को देखने का अनुरोध किया था और वह रूप देखा। यह द्रौपदी-संवाद के बाद की घटना नहीं, बल्कि 'विश्वरूप दर्शन योग' अध्याय 11 में उस क्षण है जब अर्जुन अपने भय और आश्चर्य को शांत करके कृष्ण का धन्यवाद कर रहे हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में, जहाँ युद्ध की तैयारी थी, अर्जुन ने एक विशाल रूप देखा जो सृष्टि के सर्जन और पतन दोनों को समाहित करता था। इस स्थिति में अर्जुन पहले डरा हुआ था लेकिन अब वह कृष्ण की दिव्य शक्ति का अनुभव करके उन्हें 'कमलपत्राक्ष' कहकर सम्मानित कर रहा है।

आज के जीवन में

आज के आधुनिक जीवन में, जब कोई व्यक्ति नौकरी या व्यवसाय में बड़े उतार-चढ़ाव (बूम और bust) का सामना करता है, तो यह श्लोक एक मजबूत आधार प्रदान करता है। यदि आप किसी कठिन निर्णय के तहत हैं कि क्या छोटा प्रोजेक्ट शुरू करना चाहिए या उसमें से संसाधन हटाना चाहिए, तो समझें कि उत्पत्ति और विनाश (भवा-अप्यय) दोनों प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है। अपनी भावनाओं को शांत रखकर यह स्वीकार करें कि आपका मूल स्वभाव या कर्म (जैसे अर्जुन ने कहा, 'मैंने सुना है') अपरिवर्तनीय नहीं हैं; केवल परिणाम बदलते रहते हैं। इस दृष्टिकोण से आपको घबराहट की बजाय स्थिरता और आत्मविश्वास मिलेगा कि आपकी कर्मशक्ति (Karma) का प्रभाव हमेशा बना रहेगा।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम किसी बहुत बड़े जादूगर से मिले हो जिसके पास सारी दुनिया की कहानियाँ और शक्ति का राज़ है। अर्जुन भी वही महसूस कर रहे थे, जैसे कोई छोटा बच्चा जो अब तक सिर्फ अपनी उंगलियों के बारे में सोचता था, अचानक पूरी मंज़र देख ले। उन्होंने कहा कि 'हे कमलों जैसी आँखों वाले भगवान! आपने मुझे बताया है कि दुनिया कैसे शुरू होती है और फिर क्या होता है।' इससे उनकी समझ बहुत बढ़ गई क्योंकि वे जान गए हैं कि तुम्हारा माहात्म्य (शक्ति) कभी खत्म नहीं होती।

दैनिक चिंतन

प्रिय पाठक, आज आपने देखा कि अर्जुन ने भी ईश्वर से अपने माहात्म्य की विस्तृत व्याख्या सुनी थी और उसमें उन्होंने 'कमलपत्राक्ष' (अविनाशी चरण) के रूप में भगवान को संबोधित किया। आपके जीवन में जो उतार-चढ़ाव, उत्पत्ति और पतन आते हैं, वे सब अस्थायी प्रतीत होते हैं, लेकिन आपका मूल स्वरूप वही 'अव्यय' माहात्म्य है जिसकी ओर ईश्वर संकेत करते हैं। जब भी आपको डर या अनिश्चितता सताए, तो इस बात को याद रखें कि जो शक्ति आपके अंदर और बाहर कार्य कर रही है, वह कभी नष्ट नहीं होती और न ही आप उससे विमुख हो सकते हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आँखें बंद करके यह सोचिए कि आपका सारा अस्तित्व और संसार का प्रवाह उसी परम शक्ति में समाहित है जो आपको 'अव्यय' (नष्ट न होने वाली) पहचान देती है। इस विचार को ध्यान में रखते हुए, अपने मन से उत्पत्ति और लय की चिंताओं को छोड़कर केवल उस निरंतर प्रेम और शक्ति पर केंद्रित हों जो सभी भूतों का आधार हैं।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. सृजन और प्रलय का चक्र (Bhavāpyayau)
    यह श्लोक हमें बताता है कि सभी सत्त्वों की उत्पत्ति (भवा) और लय (अप्ययु) एक ही परम वास्तविकता के दो पहलू हैं, जिसे कृष्ण ने अर्जुन को विस्तार से समझाया था। यह हमें सीख देती है कि जीवन का प्रत्येक चरण ईश्वरीय योजना का अभिन्न हिस्सा है और इसमें कोई भी गतिविधि या सत्ता निरर्थक नहीं होती।
  2. अव्यय माहात्म्य (Avyayam Mahatmya)
    'अव्यय' का अर्थ है जो नष्ट नहीं होता; कृष्ण के इस रूप और उनके स्वरूप की महिमा सदा स्थिर रहती है, भले ही संसार में सब कुछ परिवर्तनशील हो। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि ईश्वर का प्रभाव (माहात्म्य) समय और परिस्थितियों से परे है और वह हरेक जीव के लिए सदैव उपलब्ध है।
  3. संपूर्ण ज्ञान की प्राप्ति
    अर्जुन का कहना है कि उन्होंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय दोनों को ईश्वर से विस्तारपूर्वक (विस्तराशो) सुना है, जो दर्शाता है कि आध्यात्मिक सत्य केवल अंशिक नहीं बल्कि पूर्ण ज्ञान का रूप हैं। यह हमें सिखाता है कि जब तक हम ईश्वर के स्वरूप को पूरी तरह से नहीं देख लेते और समझते, तब तक हमारे भय और द्वंद्व समाप्त नहीं होते।

विषय

सृष्टि और प्रलय का चक्र (Cycle of Creation and Dissolution)ईश्वर की अव्यय शक्ति (Inexhaustible Power of God)कर्मयोग में ज्ञान की भूमिकादिव्य रूप का दर्शन (Vision of Cosmic Form)भक्त-गुरु सम्बन्ध और आस्थाअनंतता और अमरत्व

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  1. 10.8 — इस श्लोक में कृष्ण स्वयं बताते हैं कि वे सभी सत्त्वों के उत्पत्ति और लय का मूल स्रोत (उद्भव) हैं, जो 11.2 की बात को गहराई से समझने में मदद करता है।
  2. 9.7 — यह श्लोक बताता है कि सभी भूत कृष्ण के स्वरूप में लीन हो जाते हैं और पुनः उत्पन्न होते हैं, जो 'भवा-अप्ययु' (उत्पत्ति और प्रलय) की अवधारणा को स्पष्ट करता है।
  3. 13.27 — इसमें यह समझाया गया है कि ईश्वर सभी सृष्टियों में उपस्थित हैं, जो 11.2 के 'अव्यय माहात्म्य' को और अधिक गहराई से देखने का मार्ग प्रदान करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कृष्ण को 'कमलपत्राक्ष' क्यों कहा जा रहा है और इसका महत्व क्या है?
'कमलपत्राक्ष' का अर्थ है कमलों जैसी आँखों वाला, जो कृष्ण की दिव्य सुंदरता, शांति और पवित्रता को दर्शाता है। यह नाम भक्त (अर्जुन) द्वारा ईश्वर के प्रति गहरे प्रेम और सम्मान का प्रतीक है, जो उन्हें उनकी असीम शक्ति और दयालु स्वभाव की याद दिलाता है।
'भवा-अप्यय' (उत्पत्ति और विनाश) क्या संकेत करता है?
यह पारिभाषिक शब्द सृष्टि के चक्र को दर्शाता है जहाँ सभी भूत (जीवित प्राणी, वस्तुएँ, या अवस्थाएं) कभी उत्पन्न होती हैं और कभी नष्ट हो जाती हैं। यह गीता का मुख्य सिद्धांत है कि बाहरी दुनिया में सब कुछ बदलाव की प्रकृति रखती है, लेकिन ईश्वर का माहात्म्य हमेशा स्थिर रहता है।
अर्जुन ने कृष्ण के विस्तृत वर्णन को सुना और फिर क्या महसूस किया?
अर्जुन ने विश्वरूप (Cosmic Form) का दर्शन करने के बाद भयभीत हो गए थे, लेकिन जब उन्होंने उसका विस्तार से वर्णन सुना तो उन्हें समझ आया कि यह ईश्वरीय योजना है। उन्होंने कृष्ण की अव्यय शक्ति को स्वीकार करते हुए अपने डर और संदेह को दूर किया और गहन ज्ञान प्राप्त किया।
क्या इस श्लोक का कोई संबंध 'अव्यय' (नष्ट न होने वाले) से है?
हाँ, यह सीधा तर्क देता है कि भूतों की उत्पत्ति और प्रलय के बावजूद ईश्वर या आत्म-स्वरूप का माहात्म्य 'अव्यय' अर्थात नष्ट नहीं होता। यह वेदान्तिक सिद्धांत को पुख्ती करता है कि सत्य, ज्ञान और दिव्य शक्ति कभी समाप्त नहीं होतीं बल्कि हमेशा वर्त्मान रहती हैं।
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