भगवद्गीता 10.27

Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 10.27 — "अश्वों में अमृत से उत्पन्न हुए उच्चैश्रवा नामक अश्व, हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा मुझे ही "
भगवद्गीता 10.27 — Vibhuti Yoga
संस्कृत

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् | ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ||१०-२७||

लिप्यंतरण

uccaiḥśravasamaśvānāṃ viddhi māmamṛtodbhavam . airāvataṃ gajendrāṇāṃ narāṇāṃ ca narādhipam ||10-27||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सभी प्राणियों में अपने सबसे उत्कृष्ट रूपों के स्रोत हैं। घोड़ों में वे 'उच्चैःश्रवस' नामक स्वयं अमृत से जन्मे शक्तिशाली घोड़े हैं, हाथियों में उनका राजा 'ऐरावत', और मनुष्यों में वे महानतम शासक के रूप में विद्यमान हैं। इस कथा का मुख्य उद्देश्य यह सिखाना है कि ईश्वर सृष्टि की हर वस्तु, विशेषकर सबसे श्रेष्ठ और प्राकृतिक चीजों में उनकी वास्तविक पहचान रखते हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'भक्ति योग' (Bhakti Yoga) और 'ज्ञान योग' के संगम को दर्शाता है, जहाँ ईश्वर की सर्वोच्च उपस्थिति का अनुभव किया जाता है। यह सिद्धांत विकसित करता है कि परमात्मा सृष्टि में निहित हैं लेकिन उनमें से किसी एक रूप या स्थान तक सीमित नहीं हैं; वे सबसे उत्कृष्ट रूपों के माध्यम से अपनी विभूति (glory) प्रदर्शित करते हैं।

शब्दार्थ
उच्चैःश्रवसम् Ucchaisravas, अश्वानम् among horses, विद्धि know, माम् Me, अमृतोद्भवम् born of nectar?,ऐरावतम् Airavata, गजेन्द्राणाम् among lordly elephants, नराणाम् among men, च and, नराधिपम् the king
पारंपरिक भाष्य
Nectar was obtained by the gods by churning the ocean of milk. Ucchaisravas is the name of the royal horse which was born in that ocean of milk when it was churned for the nectar. Airavatam The offspring of Iravati, the elephant of Indra born at the time when the ocean of milk was churned.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक भगवद गीता के दसवें अध्याय 'विभूति योग' में आता है, जो महाभारत कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में अर्जुन और श्री कृष्ण के बीच संवाद का हिस्सा है। इस समय तक भगवान ने अपनी महान शक्तियों की विभिन्न उदाहरणों (दिव्य रूप) बताकर अर्जुन को प्रभावित किया था, जो युद्ध से पहले गहरे दुख और संदेह में थे। कृष्ण अब यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे केवल एक भगवान नहीं हैं बल्कि संपूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक शक्तियों (जैसे अमर घोड़े, राजा हाथी) का मूल स्वरूप हैं।

आज के जीवन में

आप जब भी अपने कार्यक्षेत्र में किसी बहुत कुशल व्यक्ति या प्रोजेक्ट के सबसे सफल हिस्से को देखें, तो उसे ईश्वरीय गतिशीलता (divine energy) मानकर काम करें। यदि आप जीवन में कठिन निर्णय लेने की स्थिति में हैं और चारों ओर से सर्वोत्तम विकल्प चुन रहे हैं, तो समझें कि उस 'सर्वश्रेष्ठ' का पथचिह्न आपको ईश्वर द्वारा दिया जा रहा है। किसी भी क्षेत्र (राजनीति, कला, या व्यापार) में जो चीज़ सबसे अधिक आदर्श मानी जाती है, उसे अपनी ऊर्जा और ध्यान के लिए एक प्रेरणास्रोत बनाने की भावना रखें कि वहां परम सत्य का वास्तविक स्वरूप निहित है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

बच्चो, क्या आपने कभी सोचा है कि स्कूल या पार्क में जो चीज़ें सबसे अच्छी लगती हैं, वे ईश्वर का ही रूप होती हैं? जैसे जब हम सबसे तेज दौड़ने वाले घोड़े के बारे में सुनते हैं तो वह 'उच्चैःश्रवस' होता है जो स्वर्ग से आया था, या जब हम हाथियों की दुनिया में सबसे बड़ा और ताकतवर राजा ऐरावत को देखते हैं। कृष्ण भगवान कह रहे हैं कि मनुष्यों के बीच भी वे ही सर्वश्रेष्ठ नेता बनकर रहते हैं। यानी अगर आप कोई बहुत शक्तिशाली या महान चीज़ देखें, तो समझ लो कि वह ईश्वर की चमक है।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, आज के दिन आपको क्या-क्या दिख रहा है? चाहे वह उच्चैश्रवा जैसा तेजस्वी अश्व हो या ऐरावत जैसे शक्तिशाली हाथी, सबमें वही एक ईश्वर का रूप छिपा हुआ है। आप मनुष्य के रूप में इस संसार को देख रहे हैं और यह जानना कि 'नृप' (महान राजा) भी अंततः उसी एक स्रोत से आया है, आपको गहरा शांति प्रदान करेगा।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने भीतर उस दिव्य चेतना को साक्षात्कार करें जो सभी जीवन रूपों में निहित है। जब आप किसी विशिष्ट प्राणी की शक्ति या सुंदरता देखें, तो तुरंत कल्पना करें कि वह ईश्वर का ही एक अनूठा प्रकाश है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. दिव्य की व्याप्ति में सर्वत्र उपस्थिति
    श्री कृष्ण इस श्लोक द्वारा बताते हैं कि भगवान केवल एक रूप तक सीमित नहीं, बल्कि सभी उत्तम और महान वस्तुओं का मूल स्रोत है। यह सिखाता है कि प्रकृति में जो भी सर्वोत्तम है, वह ईश्वर की विभूतियों (divine glories) को दर्शाता है।
  2. उच्चैश्रवा और ऐरावत का आध्यात्मिक अर्थ
    अश्वों में उच्चैश्रवा और हाथियों में ऐरावत जितने महान हैं, उसी प्रकार ईश्वर सभी प्राणियों के बीच सबसे श्रेष्ठ रूप धारण करते हैं। यह समझना आवश्यक है कि भगवान की प्रतिभा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं बल्कि सृष्टि के हर स्तर पर विद्यमान है।
  3. मनुष्य में ईश्वर का राजत्व
    सभी मनुष्यों में 'नराधिप' (भगवान) को ही जानना चाहिए, जो न केवल बाहरी शासक बल्कि आंतरिक धर्म और चेतना के अधिष्ठाता हैं। यह शिक्षा देती है कि हमें सभी जीवों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि वे ईश्वर की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।

विषय

ईश्वर की विभूतियाँसर्वोत्कृष्ट रूपों में ईश्वरउच्चैःश्रवस और ऐरावत का महत्वनिरंतर भक्ति योगप्राकृतिक शक्तियों की पूजामनुष्यों में परमात्मा

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  1. 10.8 — यह श्लोक सीधे 'मैं सबका स्रोत हूँ' का आधार प्रदान करता है जो इस विभूति योग की मुख्य भावना को समझने में मदद करेगा।
  2. 10.42 — यह श्लोक बताता है कि ईश्वर केवल महान वस्तुओं तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व में अल्प-महात्व से भी विद्यमान हैं।
  3. 10.29 — इस श्लोक में भगवान अन्य प्राकृतिक तत्वों के महान रूपों का वर्णन करते हैं, जो इस अध्याय की विस्तारित व्याख्या को पूरा करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उच्चैःश्रवस घोड़ा कौन था और यह श्लोक में क्यों महत्वपूर्ण है?
उच्चैःश्रवस देवतुर्ग (स्वागत) से अमृत मंथन के दौरान उत्पन्न हुआ एक दिव्य, सफेद घोड़ा था जिसने स्वयं भूमि पर चलकर आकाश को छू लिया। यह श्लोक में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सिद्ध होता है कि ईश्वर प्राकृतिक दुनिया के सबसे उत्तम और अद्भुत रूपों (जैसे यह घोड़ा) का मूल स्वरूप हैं, न कि बस एक भगवान।
क्या इस श्लोक से हमें पता चलता है कि ईश्वर केवल देवताओं तक सीमित हैं?
नहीं, यह श्लोक स्पष्ट रूप से बताता है कि ईश्वर न तो केवल देवताओं में बल्कि हाथियों (ऐरावत), घोड़ों और मनुष्यों (नृप) जैसे सभी प्राणियों और वस्तुओं की सर्वोच्च श्रेणी में भी निहित हैं। यह सिखाता है कि ईश्वर संपूर्ण विश्व के सबसे उत्कृष्ट रूपों का आधारभूत स्वरूप हैं, जो हमें हर जगह उन्हें देखने और पहचानने को कहते हैं।
इस श्लोक में 'मनुष्यों में नराधिप' (नर-अधिप) का क्या अर्थ है?
'नराधिप' का अर्थ है मनुष्यों के बीच सर्वोत्तम शासक या नरेश। कृष्ण यह बता रहे हैं कि यदि कोई व्यक्ति सबसे अधिक धर्मशील, दयालु और नेतृत्व करने वाला होता है, तो वह स्वयं ईश्वरीय गुणों का वाहक माना जाता है।
आज के समय में इस श्लोक को कैसे लागू किया जा सकता है?
आप अपने कार्य या जीवन में जो भी चीज़ें सबसे बेहतरीन, सटीक और प्रभावी हैं (जैसे एक कुशल कर्मचारी या एक उत्तम योजना), उन्हें ईश्वर की शक्ति के रूप में देखकर उनकी ओर से सीख सकते हैं। इससे आपका दृष्टिकोण बदलता है और आपको हर स्थिति में सर्वोत्कृष्ट होने का प्रयास करने को प्रेरित करता है, क्योंकि वहां परम सत्य निहित होता है।
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