भगवद्गीता 10.26

Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 10.26 — "मैं समस्त वृक्षों में अश्वत्थ (पीपल) हूँ और देवर्षियों में नारद हूँ; मैं गन्धर्वों में चित्ररथ और सि"
भगवद्गीता 10.26 — Vibhuti Yoga
संस्कृत

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः | गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ||१०-२६||

लिप्यंतरण

aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṃ devarṣīṇāṃ ca nāradaḥ . gandharvāṇāṃ citrarathaḥ siddhānāṃ kapilo muniḥ ||10-26||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे समस्त वृक्षों में पीपल (अश्वत्थ) के रूप में विराजमान हैं। इसी प्रकार, देवर्षियों में नारद मुनि और गन्धर्वों में चित्ररथ उनके अवतार या विशेष स्वरूप हैं। यह श्लोक सिखाता है कि ईश्वर सृष्टि की सभी महान वस्तुओं और व्यक्तित्वों के भीतर निवास करते हैं, जो उन्हें सबसे उत्कृष्ठ बनाते हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'विभूति योग' के अंतर्गत आता है जो ज्ञान योग और भक्ति योग की ओर एक सेतु बनाता है, यह सिद्धांत कि ईश्वर सर्वव्यापी (सबके भीतर) हैं। इसमें 'अद्वैत वेदांत' का भाव प्रकट होता है कि सृष्टि के उत्कृष्ठ रूप ही ईश्वर की पूर्ण शक्ति के संकेत हैं, जो भक्त को सभी प्राणी और वस्तुओं में परमात्मा को देखने की दृष्टि देता है।

शब्दार्थ
अश्वत्थः Asvattha, सर्ववृक्षाणाम् among all trees, देवर्षीणाम् among Divine Rishis, च and, नारदः Narada, गन्धर्वाणाम् among Gandharvas, चित्ररथः Chitraratha, सिद्धानाम् among the Siddhas or the perfected, कपिलः Kapila, मुनिः sage
पारंपरिक भाष्य
Devarshis are gods and at the same time Rishis or seers of Mantras. Siddhas are the perfected ones those who at their very birth attained without any effort Dharma (virtue)? Jnana (knowledge of the Self)? Vairagya (dispassion) and Aisvarya (lordship).Muni is one who does Manana or reflection one who meditates.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है, जो 'विभूति योग' (अध्याय 10) का हिस्सा है। इससे पहले कृष्ण ने अर्जुन के मन से संदेह मिटाया था और अब वे अपनी दिव्य शक्ति और महिमा को समझा रहे हैं ताकि अर्जुन युद्ध में लड़ने की प्रेरणा पा सके। अर्जुन उस समय हतबक्कल थे, लेकिन कृष्ण का यह उपदेश उन्हें विश्वास दिलाता है कि ईश्वर ही सबसे शक्तिशाली तत्व हैं जो सभी प्राणी और वस्तुओं में विद्यमान हैं।

आज के जीवन में

जब आप कार्यस्थल पर किसी ऐसे प्रोजेक्ट की अगुवाई कर रहे हों जहाँ सब कुछ सही नहीं चल रहा है, तो इस श्लोक को याद करें कि जैसे पीपल के पेड़ सभी वृक्षों में सबसे मजबूत और महत्वपूर्ण होता है, उसी तरह आपका कार्य भी ईश्वरीय प्राकृतिक नियमों का हिस्सा है। किसी कठिन निर्णय लेते समय या तनाव की स्थिति में यह समझें कि यदि आप अपने काम को निष्ठा से करेंगे (जैसे नारद मुनि अपनी भक्ति में), तो आपके कार्य में ईश्वर का आशीर्वाद स्वतः मिलेगा।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे एक बड़े घर में रोशनी का मुख्य लैंप सबसे ज्यादा चमकता है, या जैसे स्कूल की टीम में कप्तान सबसे महत्वपूर्ण होता है, वैसे ही भगवान कृष्ण सभी पौधों और देवताओं के बीच अपने सबसे प्रिय रूप चुनते हैं। वे कह रहे हैं कि जब आप पीपल का पेड़ देखेंगे तो याद रखना कि वह उनकी एक छोटी सी झलक है, ठीक वैसे ही जैसे नारद मुनि उनके बहुत अच्छे दोस्त और शिक्षक हैं।

दैनिक चिंतन

आज जब आप किसी पुराने पीपल के पेड़ को देखते या नारद मुनि की कथाओं का पाठ करते हैं, तो जान लें कि यह दूरस्थ देवता नहीं बल्कि वही शक्ति है जो आपके भीतर कार्य कर रही है। भगवान ने हमें सिखाया है कि वे सभी में सर्वश्रेष्ठ रूपों के माध्यम से प्रकट होते हैं ताकि हम उनकी महिमा को पहचान सकें। इसलिए, जब आप अपने जीवन में किसी विशेष गुण या शक्ति का अनुभव करते हैं, तो उसे स्वीकार करें क्योंकि वह भगवान की अपनी ही अभिव्यक्ति है जो आपको उनसे जोड़ती है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के ध्यान में, अपने आसपास प्रकृति की उस शक्ति को देखें जो हर वृक्ष और जीवित प्राणी में निहित है। कल्पना करें कि अश्वत्थ (पीपल) का पेड़ ही नहीं, बल्कि आपका अपना भीतर वाला चेतनता-स्वरूप 'भगवान' की अभिव्यक्ति है। इस भाव के साथ शांत बैठें और मान लें कि ईश्वर आपके अंदर वही श्रेष्ठ रूपांतर हैं जो संसार में सबसे उत्कृष्ट मानी जाती हैं।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. परम सत्ता में सर्वोच्च रूपों की उपस्थिति
    भगवान स्वयं कहते हैं कि वे सभी वस्तुओं और प्राणियों के बीच भी सबसे उत्कृष्ट या 'अश्वत्थ' (पीपल) जैसे प्रमुख रूपों के रूप में विद्यमान हैं। यह दर्शाता है कि ईश्वर न केवल दूर स्थित हैं, बल्कि वे अपने सृजन की सर्वोच्च संभावनाओं को भी आकार देते हैं और उनमें निवास करते हैं।
  2. देवर्षि और ऋषियों में ईश्वरीय चेतना
    नारद, कपिल मुनि जैसे महान संतों के माध्यम से भगवान का ज्ञान और करुणा प्रवाहित होती है। यह सिखाता है कि जब कोई व्यक्ति पूर्ण रूप में आत्म-संयमित होता है या परम सत्य को जान लेता है, तो वह ईश्वर का वाहक बन जाता है।
  3. प्रतीकात्मक पहचान के माध्यम से भक्ति
    भगवान ने विशिष्ट प्रतीकों (जैसे अश्वत्थ, नारद) का उल्लेख करके यह सिखाया है कि हमें अपने जीवन में 'सर्वोच्च' गुणों को पहचानना चाहिए। जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति के भीतर सर्वोच्चता देखते हैं, तो हमारा धर्म और भक्ति गहरा होता है क्योंकि हम ईश्वर की अनुपस्थिति नहीं बल्कि उनकी उपस्थिति में रहने लगते हैं।

विषय

ईश्वर की विभूतियाँसृष्टि में ईश्वर का निवासपवित्र वस्तुओं का महत्वदिव्य रचनाअर्जुन और कृष्ण का संवादभक्ति योग

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आगे पढ़ें

  1. 10.8 — इससे पहले कि आप 'विवर्त योग' के अन्य उदाहरणों को पढ़ें, यह श्लोक आपको बताता है कि भगवान स्वयं सभी सृजन की उत्पत्ति का कारण हैं।
  2. 10.29 — अब आप अश्वत्थ और नारद के बाद अन्य देवों, ऋषियों और प्राणियों में भगवान की उपस्थिति को विस्तार से देख सकते हैं।
  3. 10.42 — अंततः यह श्लोक आपको याद दिलाता है कि ये सभी विशिष्ट उदाहरण भगवान की अनन्त महिमा का केवल एक अंश मात्र हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या पीपल का पेड़ (अश्वत्थ) सभी वृक्षों से अधिक पवित्र क्यों माना जाता है?
भगवद गीता के अनुसार, अश्वत्थ या पीपल का पेड़ ईश्वर द्वारा 'समस्त वृक्षों' में सबसे उत्कृष्ठ रूप चुना गया है। इसे एक ऐसा वाहन (vehicle) माना जाता है जिसमें परमात्मा की उपस्थिति और शक्ति विशेष रूप से केंद्रित होती है, इसलिए यह अन्य पेड़ों से अधिक पवित्र समझा जाता है।
नारद मुनि अर्जुन को क्या सिखाते थे?
देवर्षि नारद ईश्वर की भक्ति और ज्ञान के प्रचारक माने जाते हैं। वे अर्जुन को यह समझाते कि कर्म करते हुए भी मन को परमात्मा में स्थिर रखना आवश्यक है, क्योंकि वे स्वयं ईश्वर का एक उत्तम रूप (विभूति) हैं जो भक्ति मार्ग की अनुशासकता और प्रेम को दर्शाते हैं।
सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि का क्या महत्व है?
सिद्ध पुरुष वे साधक होते हैं जो संसार के बंधनों से पूर्णतः मुक्त हो चुके हैं। गीता में भगवान कहते हैं कि सिद्ध पुरुषों (परफेक्ट लोगों) की श्रेणी में कपिल मुनि सबसे प्रमुख हैं, क्योंकि वे 'संख्य योग' के संस्थापक माने जाते थे और ज्ञान का सर्वोच्च स्तर प्राप्त कर चुके थे।
यह श्लोक हमें ईश्वर को कैसे खोजने में मदद करता है?
यह श्लोक सिखाता है कि भगवान केवल मंदिरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति की सर्वोच्च और महान वस्तुओं (जैसे पीपल का पेड़) या महान व्यक्तित्वों (जैसे नारद मुनि) में भी विराजमान हैं। जब हम किसी अत्यंत पवित्र या शक्तिशाली चीज़ को देखते हैं, तो यह हमें याद दिलाता है कि उस पीछे ईश्वर का रूप हो सकता है और हमारे कर्मों को पूरे समर्पण से करना चाहिए।
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