भगवद्गीता 10.18
Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन | भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ||१०-१८||
vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana . bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me.amṛtam ||10-18||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से विस्तारपूर्वक कहते हैं कि वे उनकी आत्म-शक्ति (योग) और विश्व की दिव्य उपस्थितियों (विभूतियों) को फिर से सुनना चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि 'जनार्दन' के अमृत जैसे वचनों को सुनने में उन्हें कभी भी पूर्ण संतोष या तृप्ति नहीं होती, बल्कि और अधिक जानने की इच्छा बढ़ती जाती है। यह श्लोक भक्ति भावना और ज्ञान की अनंत गहराई का प्रदर्शन करता है कि ईश्वर के गुणों को समझते हुए मन कभी थकता नहीं है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भगवद्गीता के 'भक्त योग' (Bhakti Yoga) और 'ज्ञान मार्ग' का अटूट संबंध दर्शाता है, जहाँ ईश्वर की विभूतियों को जानना ही सबसे बड़ी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है। यह सिखाता है कि भक्त के लिए ईश्वरीय स्वरूप और उसकी शक्तियाँ सीमित नहीं हैं, बल्कि वे 'अमृत' (อมৃত) जैसे अनंत स्रोत हैं जिनका सेवन कभी समाप्त नहीं होता। इसमें दार्शनिक रूप से यह स्पष्ट किया गया है कि आत्म-ज्ञान की प्रगति में तृप्ति का अभाव ही आगे बढ़ने और ईश्वर के निकट पहुँचने का मुख्य चालक है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह संवाद महाभारत युद्ध की पूर्व संध्या पर कुrukshetra के मैदान में हुआ है, जहाँ अर्जुन अपने भाइयों को मारने से इनकार करके विषाद (शोक) और भ्रम में हैं। कृष्ण ने अब तक अपना 'विभूति योग' प्रकरण शुरू किया है, जिसमें उन्होंने बताया कि वे सभी प्राणियों के बीच कैसे मौजूद हैं। इस श्लोक में अर्जुन अपनी गहरी संतुष्टि (तृप्ति) की कमी का कारण बताकर यह स्पष्ट करते हैं कि उन्हें अभी भी और अधिक जानने की तीव्र इच्छा है, जो उनकी आस्था और ज्ञान के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
आज के जीवन में
आजकल जब हम किसी नए कौशल या पेशेवर कार्य में लगते हैं (जैसे एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम करना), तो अक्सर शुरू करने के बाद ही थोड़ा संतुष्ट होकर रुक जाते हैं, लेकिन असली सफलता तब आती है जब हमें उस विषय की गहराई में उतरने का लालच रहता है। यदि आप एक कठिन निर्ण ले रहे हैं या किसी व्यक्तिगत समस्या को सुलझाने के लिए मार्गदर्शन चाहते हैं, तो इस श्लोक का संदेश यह है कि भक्ति और ज्ञान की प्रक्रिया में 'तृप्ति' नहीं बल्कि लगातार सीखने की भावना ही सच्ची खुशी देती है। इसलिए काम या जीवन के चुनौतीपूर्ण पहलुओं को समझते समय, हमें कभी भी पूर्ण संतोष का झूठा अहसास न करना चाहिए और निरंतर गहराई से जानने की प्रक्रिया को जारी रखना चाहिए।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
अर्जुन ने कहा, 'हे कृष्ण! तुमने मुझे अपने महान गुरलों और शक्तियों के बारे में बहुत अच्छी बातें बताई हैं, लेकिन मैं अभी भी सुनना चाहता हूँ।' ऐसा इसलिए क्योंकि जब आप किसी प्यारे दोस्त या माता-पिता से उनकी प्रेम भरी कहानियां सुनते हैं, तो आपको लगता है कि वे कभी खत्म नहीं होतीं और हर बार नई चीजें सीखने को मिलती हैं। ठीक वैसे ही जैसे एक बच्चा अपनी पसंद की रोचक शरबत (अमृत) पीकर भी थोड़ी-थोड़ी देर बाद फिर से मांगता है, अर्जुन को कृष्ण के वचनों का सुनना हमेशा नया और मीठा लगता था।
दैनिक चिंतन
आप जब कभी भगवद्गीता या किसी पवित्र ग्रंथ को ध्यानपूर्वक सुनते हैं, तो क्या आपका मन भी इतना परिपूर्ण हो जाता है कि उसे कुछ और नहीं चाहिए? अर्जुन की तरह, हमें भी यह समझने की आवश्यकता है कि ईश्वर के विभूति-ज्ञान में निहित शक्ति हमारे हृदय को कभी थकाया नहीं जा सकता। आज इस विश्वास पर चलते हुए देखें कि आपके लिए भगवान का स्वरूप अनंत और अमृत जैसा ही है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के समय में, इस बात को ध्यान दें कि भगवान कृष्ण की वाणी सुनते हुए आपको जो अनंत संतोष मिलता है, वह अमृत जैसा ही है। अपने भीतर उस गहरी तृप्ति का अनुभव करें जो बाहरी वस्तुओं से नहीं, बल्कि ईश्वर के संपूर्ण विवरण को सुनने और समझने में आती है।
मुख्य शिक्षाएँ
- अनंत संतोष की प्रकृति
जैसे सुंदर संगीत बार-बार सुना जा सकता है, वैसे ही भगवान के गुणों और विभूतियों का वर्णन कभी समाप्त नहीं होता। जब हम ईश्वरीय सत्य को समझते हैं, तो मन में एक गहरी तृप्ति पैदा होती है जो बाह्य सुख से प्राप्त होने वाली क्षणिक संतोष से भिन्न है। - विस्तार का महत्व
अर्जुन ने 'विस्तरेण' (व्यापक रूप में) कहने की प्रार्थना की, जो दर्शाता है कि ईश्वर के स्वरूप को सीमित नहीं किया जा सकता। विभूति-योग का उद्देश्य हमें यह समझाना है कि भगवान कृष्ण अपनी शक्ति से सभी सृष्टि में व्याप्त हैं और उनका वर्णन करने की कोई अंतिम सीमा नहीं है। - भक्त का अनुरोध
'जनार्दन' (जाना-कठोर) शब्द भगवान के प्रति श्रद्धा और प्रेम को दर्शाता है, जो एक गहरे संबंध की ओर इशारा करता है। जब भक्त ईश्वरीय विभूतियों का वर्णन सुनने में रम जाता है, तो उसे 'अमृत' जैसी अनुभूति होती है और वह बार-बार उसी को सुनना चाहता है।
विषय
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आगे पढ़ें
- 10.25 — इस अनुच्छेद के बाद, यह पढ़ना आवश्यक है कि भगवान किस प्रकार सृष्टि में विशिष्ट रूपों (जैसे चंद्रमा और अग्नि) में प्रकट होते हैं।
- 10.32 — अर्जुन की तृप्ति को आगे बढ़ाते हुए, यह पद हमें बताता है कि भगवान सभी वस्तुओं का मूल आधार हैं।
- 15.1 — विभूतियों के बाद, इस अध्याय में ब्रह्मलोक और आत्मा की प्रकृति पर चर्चा करके दार्शनिक गहराई बढ़ती है।
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