भगवद्गीता 9.24

Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 9.24 — "क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे ग"
भगवद्गीता 9.24 — Raja Vidya Raja Guhya Yoga
संस्कृत

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च | न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ||९-२४||

लिप्यंतरण

ahaṃ hi sarvayajñānāṃ bhoktā ca prabhureva ca . na tu māmabhijānanti tattvenātaścyavanti te ||9-24||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सभी यज्ञों के भोक्ता और स्वामी एकमात्र ईश्वर हैं। जब कोई व्यक्ति इस तथ्य को समझने में विफल रहते हैं कि ईश्वर ही सर्वोपरि है, तो वे 'तत्त्व' नहीं जान पाते। यह अज्ञान कारण बनता है कि लोग संसार के चक्रव्यूह या कर्मों का फल भोगकर पुनः जन्म-मरण में गिर जाते हैं। इस श्लोक का सार यह है कि ईश्वर को तत्वतः जानने वाले ही मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं, न कि केवल कर्म करने वाले।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भगवद् गीتا के 'भक्ति योग' (Bhakti Yoga) और 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) के संयोग को दर्शाता है, जहाँ ईश्वर की पूर्ण पहचान ही मोक्ष का मार्ग बताया गया है। यह सिद्धांत कि ईश्वर सभी यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हैं, 'अद्वैत वेदांत' (Advaita Vedanta) के दृष्टिकोण से सत्य की पहचान पर जोर देते हैं जहाँ आत्मा और ब्रह्मान में अंतर नहीं है। यह पाठक को कर्मों के फल में न लगकर, ईश्वर-समर्पित भाव (ईश्वर को प्रभु मानना) की ओर ले जाता है जो च्यवन या गिरने से बचाता है।

शब्दार्थ
अहम् I, हि verily, सर्वयज्ञानाम् of all sacrifices, भोक्ता enjoyer, च and, प्रभुः Lord, एव alone, च and, न not, तु but, माम् Me, अभिजानन्ति know, तत्त्वेन in essence (or in reality), अतः hence, च्यवन्ति fall, ते they
पारंपरिक भाष्य
They do not know that I, the Supreme Self, am the enjoyer of all sacrifices enjoined in the Vedas and the Smritis (the codes of right conduct) and the Lord of all sacrifices. As I am the inner Ruler of this world I am the Lord of all sacrifices (Vide chapter VIII. 4 -- Adhiyajnohamevatra I am the presiding deity of the sacrifice). I am at the beginning and at the end of every sacrifice and yet these people worship other gods. Therefore they worship in ignorance. As they worhsip other gods without recognising Me, and as they have not consecrated their actions to Me, they return to this mortal world after their merits are exhausted from the plane to which they had attained as the result of their sacrifices. Those who are devoted to other gods and who worship Me in ignorance (Avidhipurvakam) also get the fruit of sacrifice. How (Cf. V.29XV.9)

यह कहाँ घटित होता है

यह वचन महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है, जो पाँचवें अध्याय 'राज्ञी विद्या राज गुह्य योग' में आता है। इस समय तक कृष्ण ने अर्जुन को भक्ति और ज्ञान के गहरे रहस्यों की बात बताई हैं, लेकिन अर्जुन अब भी संदेहों से ग्रस्त था कि क्या वह युद्ध करना चाहिए या न करना चाहिए। यह श्लोक उस समय बोला गया जब कृष्ण ने समझाया कि ईश्वर ही सभी पूजाओं और त्याग का उद्देश्य है, जिससे अर्जुन को अपनी भूमिका (धर्म) की गहरी समझ मिलती है।

आज के जीवन में

आज के जीवन में जब हम किसी कठिन निर्णय लेने या काम करते समय सिर्फ परिणामों पर ध्यान देते हैं और ईश्वर या उच्च सत्ता को भूल जाते हैं, तो हम तनाव (anxiety) का शिकार हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक कर्मचारी प्रमोशन की चिंता में लगा रहता है लेकिन यह नहीं समझता कि उसका कार्य ईश्वर को अर्पित किया गया धर्म है, तो वह असफल होने का डरावना अनुभव कर सकता है। जीवन की इस स्थिति से बचने के लिए हमें अपने कर्मों को 'प्रभु' (ईश्वर) को समर्पित करना चाहिए और परिणामों की चिंता छोड़नी चाहिए, जिससे मन का शाति मिलती है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करें जैसे एक बड़ा त्योहार होता है और सभी लोग खाना पकाते हैं (यज्ञ), लेकिन असली मालिक वही हैं जो पूरे घर का इंतजाम करते हैं और खुश होते हैं जब सब खा लेते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि वे ही वह 'मालिक' हैं जिन्हें हमें पहचानना चाहिए, न कि सिर्फ खाना पकाने वाले काम को देखकर। अगर कोई बच्चा यह नहीं समझता कि असली मालिक कौन है और उसे भूल जाता है, तो शायद वह खेल में थोड़ा अड़ सकता है या गिर भी सकता है। हमें चाहिए कि हम ईश्वर का ध्यान करें ताकि हमेशा खुश रह सकें और सही राह पर चल सकें।

दैनिक चिंतन

प्यारे मित्र, क्या आप कभी सोचते हैं कि आपके हर शुभ कार्य का असली स्वामी और भोक्ता कौन है? भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि वे ही सब यज्ञों के अंत में उपस्थित होते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं। जब हम यह तथ्य गहराई से समझ लेंगे, तो न सिर्फ धर्म का पालन होगा बल्कि संसार की चिंताओं से भी मुक्ति मिलेगी।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपनी सभी क्रियाओं को भगवान कृष्ण के लिए समर्पित करके करें, यह सोचते हुए कि वे ही इस कार्य का अंतिम लाभकर्ता और स्वामी हैं। जब भी कोई काम पूरा हो जाए, मन में आत्मीय श्रद्धा से कहें कि हे प्रभु, आपने इसे स्वीकार किया है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. सभी यज्ञों में परम भोक्ता कृष्ण हैं
    यह श्लोक स्पष्ट करता है कि सभी पूजा-अर्चना और त्याग का अंतिम लाभकर्ता केवल स्वामी कृष्ण ही हैं, न कि कोई अन्य देवता। जब हम किसी को समर्पित करते हैं तो वह वास्तव में उस परमात्मा तक पहुंचती है जो सर्वोपरि है।
  2. तत्वज्ञान की कमी का परिणाम
    जब जीवात्मा प्रभु को उनके सत्य स्वरूप और अद्वितीय महक में नहीं पहचान पाता, तो वह 'असम्यक् ज्ञान' का शिकार हो जाता है। इस अनजानी के कारण व्यक्ति आध्यात्मिक पतन या संसार चक्र में फिर से फंसने की स्थिति में पहुंचता है।
  3. यज्ञ-स्वामी और भोक्ता का संबंध
    कृष्ण न केवल यज्ञों के स्वामी हैं बल्कि वे उनका एकमात्र वास्तविक उपभोक्ता भी हैं, जो इस बात से सिद्ध होता है कि उन्हें ही पूजा में ग्रहण किया जाना चाहिए। यह संबंध हमें बताता है कि धर्म का पालन और सेवा करना अंततः स्वामी की इच्छानुसार होना चाहिए।

विषय

ईश्वर की पहचान (Identity of God)यज्ञ और भक्ति (Sacrifice and Devotion)अज्ञान का प्रभाव (Effect of Ignorance)कर्म फल त्याग (Renunciation of Fruits of Action)मोक्ष की प्राप्ति (Attainment of Liberation)सर्वेश्वरत्व (Omnipresence and Sovereignty)

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आगे पढ़ें

  1. 9.26 — यदि आप इस श्लोक में कृष्ण की भोक्ता के रूप को समझ चुके हैं, तो यह अगला पाठ आपको बताएगा कि कैसे एक पत्ती या फल भी उनके लिए समर्पित कर सकते हैं।
  2. 9.27 — अंततः कृष्ण की भक्ति और सर्वेसुखदाता के रूप को जानने के बाद, यह श्लोक आपको सिखाएगा कि सभी क्रियाओं में उन्हें कैसे समर्पित करना है।
  3. 9.25 — इससे पहले की आप कृष्ण को भोक्ता के रूप में स्वीकार करें, यह श्लोक आपको बताएगा कि अन्य देवताओं और यज्ञों का क्या संबंध है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्लोक 'च्यवन्ति' (गिरने) का क्या संकेत देता है?
यहाँ 'च्यवन्ति' से तात्पर्य न केवल भौतिक रूप में गिरना बल्कि आध्यात्मिक पतन या पुनः जन्म-मरण (संसार) की चेक पर लपट जाने को दर्शाता है। जब कोई व्यक्ति ईश्वर को तत्वतः नहीं जान पाते, तो वे कर्मों के फल में बंधे रहते हैं और मोक्ष से दूर हो जाते हैं।
क्या इस श्लोक का अर्थ है कि अन्य देवताओं की पूजा गलत है?
नहीं, इसका तात्पर्य यह नहीं है कि दूसरे देवता या यज्ञ निरस्त हैं। बल्कि कृष्ण बता रहे हैं कि सभी उपासना और यज्ञों का अंतिम लक्ष्य वे ही (ईश्वर) हैं जो उन सब के स्वामी भी हैं। यदि ईश्वर को भूलकर दूसरे देवताओं की पूजा की जाए तो वह आंशिक ज्ञान है, पूर्ण नहीं।
'तत्त्व' (tattvena) का क्या अर्थ है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
'तत्त्व' से तात्पर्य सत्य की वास्तविकता या मूल तथ्य को समझना है। इस श्लोक में कृष्ण बता रहे हैं कि ईश्वर के रूप, गुण और सर्वोपरि होने का पूर्ण ज्ञान ही हमें संसार से बांधने वाली चेन तोड़ सकता है। बिना इस गहरी समझे हुए, केवल आराधना करने वाला भी अंततः संसार में वापस लौट जाता है।
क्या यह श्लोक भक्ति योग और ज्ञान योग को जोड़ता है?
हाँ, यह श्लोक दोनों का एक अनिवार्य संबंध स्थापित करता है क्योंकि कृष्ण कहते हैं कि वे 'भोक्ता' (जिसे भक्तों में प्रेम से पूजा जाता है) और 'प्रभु' (ज्ञान के द्वारा पहचाना जाने वाला सर्वशक्तिमान) दोनों हैं। भगवद् गीता सिखाती है कि सच्ची भक्ति तभी पूर्ण होती है जब ईश्वर को ज्ञान के साथ समझ लिया जाए, और वही मोक्ष का द्वार खोलता है।
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