भगवद्गीता 9.23
Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ||९-२३||
ye.apyanyadevatābhaktā yajante śraddhayānvitāḥ . te.api māmeva kaunteya yajantyavidhipūrvakam ||9-23||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जो भक्त श्रद्धा और ईमानदारी के साथ किसी अन्य देवता की पूजा करते हैं, वे वास्तव में मुझे ही पूछते हैं। यह इसलिए है क्योंकि एक ही ब्रह्मांडीय तत्व (ईश्वर) सभी देवताओं का स्रोत है। हालाँकि, जो लोग विधि-विधान और सही ज्ञान के बिना दूसरे रास्तों को अपनाते हैं, वे पूर्ण फल प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि उनका तरीका अपूर्ण होता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भक्ति योग (Bhakti Yoga) और ज्ञान योग (Jnana Yoga) के संयोग को दर्शाता है, जो यह स्पष्ट करता है कि सभी देवता एक ही ब्रह्म का विभिन्न रूप हैं। इसमें 'अविधिपूर्वकम्' शब्द द्वारा कर्म की गुणवत्ता और सही ज्ञान के बिना किए गए अनुष्ठानों की सीमा को रेखांकित किया गया है कि वे अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँचाते।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत की कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में संवाद का हिस्सा है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को धर्म और जीवन के रहस्य समझा रहे हैं। इस समय तक, कृष्ण ने 'राजविद्या राज़गुह्या योग' की शुरुआत की है और यह बता चुके हैं कि वे सभी देवताओं का आदि स्रोत हैं। अर्जुन के मन में भक्ति मार्गों को लेकर विषमता थी, इसलिए कृष्ण स्पष्ट कर रहे हैं कि अन्य देवताओं की पूजा भी मूल रूप से उनकी ही है, लेकिन उसका तरीका महत्वपूर्ण है।
आज के जीवन में
कल्पना करें कि आप एक नौकरी पर बहुत तनाव में हैं और आपको लग रहा है कि सिर्फ किसी विशिष्ट उपाय या धार्मिक विधि से ही सुख मिलेगा, जबकि दूसरें अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं। इस श्लोक का उपयोग यह समझने के लिए किया जा सकता है कि चाहे आप किसी भी मार्ग (जैसे समाधान खोजने की प्रक्रिया या आत्मविश्वास) से गुजरें, अगर आपके मन में ईमानदारी और सही उद्देश्य नहीं है तो परिणाम अच्छे नहीं मिलते। आज के कामकाजी जीवन में यह सिखाता है कि हमें अपनी नौकरी या जिम्मेदारियों को 'श्रद्धा' से निभाना चाहिए, न कि बिना सोचे-समझे अनुष्ठानों की तरह करके भगदड़ मचानी।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
अर्जुन ने पूछा कि अगर कोई बच्चा अलग-अलग खिलौनों से खेलता है तो क्या वह उसे सही समझ सकता है? कृष्ण कहते हैं जैसे एक ही पानी में सभी नदियाँ मिल जाती हैं, उसी तरह हम जो भी देवताओं को पूजते हैं, असल में वही ईश्वर को पुकार रहे होते हैं। लेकिन अगर हम बिना सलाह के किसी गलत तरीके से खेलें या पूजा करें, तो वह मज़ा नहीं मिल पाएगा और उद्देश्य भी साफ़ नहीं होगा।
दैनिक चिंतन
प्रेमी कौन्टेय, क्या तुम्हारा मानना है कि अलग-अलग देवताओं को पूजने का मतलब भगवान से दूर जाना है? स्वामी शंकराचार्य की भाषा में कहें तो जो भी किसी रूप या नाम के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचने का प्रयास करता है, वह वास्तव में उस एक अदृश्य सत्य को ही साध रहा होता है। तुम्हारा भक्ति मार्ग कितना भी विशिष्ट क्यों न हो, यदि वह श्रद्धा और समर्पण से युक्त है, तो वही तुमसे जुड़ा हुआ परमात्मा स्वयं उस पूजा का ग्रहण करता है।
आज के लिए एक अभ्यास
अपने भीतर के उस एक चेतन सत्य को पहचानें जो सभी देवताओं और पूजा-पाठों में विद्यमान है। जब आप किसी अन्य रूप या आकार की ओर झुकते हैं, तो मन ही मन स्वीकार करें कि वही परम पुरुष उसी के माध्यम से आपको अनुग्रह कर रहा है।
मुख्य शिक्षाएँ
- श्रद्धा ही सच्ची पूजा की नींव है
भगवान यह बताते हैं कि बाहरी रूप या देवता कौन सा हो, यदि अर्पण करने वाले के मन में गहन श्रद्धा (विश्वास) नहीं है तो वह पूजा अधूरी रहती है। सच्चाई इस बात में नहीं कि आप किसका नाम लेते हैं, बल्कि यह है कि आपके भीतर का विश्वास कितना निष्कपट और पूर्ण है। - सबके पीछे एक ही स्रोत
जो भक्त अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, वे वास्तव में उसी परम ब्रह्म को पूज रहे होते हैं जो इन सभी रूपों का आधार है। अविधिपूर्वक (अनियमित या कम ज्ञान के साथ) किए गए कर्म भी भगवान द्वारा स्वीकार्य हो जाते हैं क्योंकि वे उन सत्य की ओर एक चरण मात्र हैं। - सभी मार्गों का अंत एकाग्रता में
यह श्लोक हमें सिखाता है कि सभी धार्मिक पंथ और उपासना विधियाँ अलग-अलग रास्तों पर चलते हुए एक ही गन्तव्य की ओर ले जाती हैं। कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि भक्त जो भी रूप में पूजा करता है, वह वास्तव में मुझमें ही आता है, क्योंकि वे सब मेरे ही अंश या शक्ति के प्रकाश हैं।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 7.21 — यह अंश स्पष्ट करता है कि कैसे मनुष्य के मन में जो भी देवता वह पूजना चाहते हैं, वही भगवान द्वारा ही स्थापित किया जाता है।
- 18.64 — यह पद 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' के रूप में अंतिम और स्पष्ट आदेश देता है कि सभी धर्मों को त्यागकर एकमात्र कृष्ण पर शरण लेना चाहिए।
- 6.32 — यह दृश्य बताता है कि जो स्वयं में सबको देखता है और सबमें स्वयं को, वही योगी परम सत्य का सबसे उच्चतम स्वरूप प्राप्त करता है।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.