भगवद्गीता 8.9

Akshara Brahma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 8.9 — "जो पुरुष सर्वज्ञ, प्राचीन (पुराण), सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, सब के धाता, अचिन्त्यरूप, स"
भगवद्गीता 8.9 — Akshara Brahma Yoga
संस्कृत

कविं पुराणमनुशासितार- मणोरणीयंसमनुस्मरेद्यः | सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ||८-९||

लिप्यंतरण

kaviṃ purāṇamanuśāsitāraṃ aṇoraṇīyaṃsamanusmaredyaḥ . sarvasya dhātāramacintyarūpaṃ ādityavarṇaṃ tamasaḥ parastāt ||8-9||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मृत्यु के समय या जीवन भर ज्ञान का अभ्यास कैसे किया जाए। इस श्लोक में बताया गया है कि वह परम सत्य जो सर्वज्ञ, प्राचीन और सबका धारक है, उसका स्वरूप अणु से भी सूक्ष्म और तामसी अंधकार से परे प्रकाशमान है। कृष्ण का मुख्य संदेश यह है कि यदि आप इस अपरिमेय सत्य को निरंतर अनुस्मरण (याद) करते हैं, तो आपको मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) और ध्यान योग (Dhyana Yoga) के सिद्धांतों को जोड़ता है, जहाँ भगवान का स्वरूप 'अचिन्त्य' (अविचारणीय) होने पर बल दिया गया है। यह अद्वैत वेदांत की वह शाखा है जिसमें आत्मा और परब्रह्म के बीच की दूरी को मिटाकर, भक्त या साधक को 'सर्वज्ञ' और 'अणोः अणीयान्' (परमाणु से भी सूक्ष्म) सत्य में एकीकरण करना सिखाया जाता है।

शब्दार्थ
कविम् Omniscient, पुराणम् Ancient, अनुशासितारम् the Ruler (of the whole world), अणोः than atom, अणीयांसम् minuter, अनुस्मरेत् remembers, यः who, सर्वस्य of all, धातारम् supporter, अचिन्त्यरूपम् one whose form is inconceivable, आदित्यवर्णम् effulgent like the sun, तमसः from the darkness (of ignorance), परस्तात् beyond
पारंपरिक भाष्य
Kavim The sage, seer or poet, the omniscient. The Lord dispenses the fruits of actions of the Jivas (individual souls). He is the Ruler of the world. It is very difficult to conceive the form of the Lord. He is selfluminous and He illumies everything like the sun.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया संदेश है, जो गीता के आठवें अध्याय 'अक्षर ब्रह्म योग' का हिस्सा है। इस समय तक अर्जुन ने युद्ध छोड़ने और अपने ही लोगों से लड़ने की विषाद भावना व्यक्त कर दी थी, जिस पर कृष्ण ने उसे आत्मा-ब्रह्म के ज्ञान से निराश होने से हटाया है। इस श्लोक में प्रवेश करने से पहले अर्जुन को यह समझने का अवसर मिला था कि युद्ध एक कर्म है, और अब कृष्ण उसे उस समय की तैयारी करवा रहे हैं जब वह अपने शरीर को त्यागता है।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप आज काम पर बहुत बड़ी और अनिश्चित चुनौती का सामना कर रहे हैं या किसी पारिवारिक संकट में फंसे हुए हैं, जहाँ भविष्य अंधकार से घिरा लगता है। इस स्थिति में 'अचिन्त्य रूप' (जिसका स्वरूप हमारी कल्पना से परे है) और 'तमसः परस्तात्' (अंधकार से परे प्रकाश) का ध्यान करें कि यह अस्थायी डर एक वास्तविकता नहीं, बल्कि एक क्षणिक अवस्था है। अपने मन को उस सत्य के चरणों में समर्पित करें जो सबका नियन्ता और सभी की रक्षा करने वाला है, जिससे आपका मानसिक संतुलन पुनः स्थापित होगा।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करें जैसे एक बहुत बड़ा और ताज़ा सूरज जो पूरी दुनिया में रोशनी फैलाता है, लेकिन उसका कोई सीमा या डर नहीं होता। कृष्ण कहते हैं कि भगवान भी वैसा ही हैं—वह सबसे छोटे अणु से भी सूक्ष्म हैं, और हमारी सभी समस्याओं (अंधकार) को दूर करने वाले प्रकाश हैं। जब आप किसी मुश्किल काम या डर के समय में उस 'सबसे बड़े रोशन' इंसान की कल्पना करते हैं जो सब जानता है और सबको संभालता है, तो आपको अंदर से बहुत शांति मिलती है।

दैनिक चिंतन

आज आपके मन में जो अज्ञानता या भ्रम है, उसे यह विचार प्रकाशित कर सकता है कि ईश्वर उससे कहीं परे और अधिक वास्तविक हैं। आप स्वयं को सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर सत्ता के साथ जोड़कर अपने अहंकार की सीमाओं को पार कर सकते हैं। याद रखें, जब तक आप उनका स्मरण करते हैं, वे आपके हृदय में एक अटूज प्रकाश बनकर रहते हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आँखें मूंदकर भगवान की चमकती आत्मा को सूर्य के समान तेजस्वी और अज्ञानता से परे कल्पना करें। अपने मन में यह स्वीकार करते हुए कि वे सभी सूक्ष्म हैं, आपकी उपस्थिति का अनुभव करें। इस शांत दृढ़ता के साथ श्वसन जारी रखें जब तक कि भीतर एक गहरी स्थिरता न आ जाए।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. सर्वव्यापी और सूक्ष्म सत्ता की पहचान
    ईश्वर न केवल विशाल, बल्कि अणु से भी छोटे (अणोरणीय) हैं जो हर जगह विद्यमान हैं। यह समझना कि वह सबके धाता और नियन्ता है, हमें ईश्वरीय शक्ति की गहराई में ले जाता है।
  2. अविद्या से परे प्रकाश का स्वरूप
    भगवान को 'सूर्य-वर्ण' और 'तमसाः परस्तात्' के रूप में देखना हमें अज्ञानता (तम) की घुटन भरी छाया से मुक्त करता है। यह दृष्टिकोण आत्म-स्मरण को ज्ञान का प्रकाश बनने देता है जो नकारात्मक भावों को जला देता है।
  3. अचिन्त्य रूप की उपासना
    ईश्वर का स्वरूप अचिंत्य (अविचारणीय) है, जो मानवीय बुद्धि से परे हैं। इसलिए केवल ज्ञान या तर्क नहीं, बल्कि श्रद्धा और अनुस्मरण (ध्यान) ही उन्हें प्राप्त करने की कुंजी है।

विषय

सर्वज्ञ भगवान का स्वरूपअंधकार से मुक्तिध्यान और अनुस्मरण की कलाकर्म फल त्याग के साथ ज्ञान योगआत्मा की अचिन्त्य प्रकृतिपरब्रह्म का प्रकाश

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  1. 8.5 — इस आया में यह बताया गया है कि मृत्यु के समय मन किस अवस्था का होना चाहिए, जो इस अध्याय की मुख्य थीम को पूरा करता है।
  2. 13.24 — यह श्लोक अणुरूप और महान रूप में ईश्वर के विस्तृत वर्णन से संबंधित है, जो इस आया की 'अणोरणीय' अवधारणा का गहराई से विश्लेषण करता है।
  3. 12.3 — इसमें भगवान के निराकार और साकार दोनों रूपों में उपासन करने वाले भक्त की तुलना की गई है, जो 'तमसाः परस्तात्' (अंधकार से परे) विचार को आगे बढ़ाती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रुत 'अणोः अणीयान्' (aṇor aṇīyān) शब्द का क्या तात्पर्य है?
इसका सीधा अनुवाद है कि भगवान या परब्रह्म के स्वरूप की गहराई और सूक्ष्मता किसी भी पारमाणु (atom) से भी अधिक है। यह दर्शाता है कि ईश्वर हमारी कल्पनाओं, मापदंडों और दृश्य सीमाओं से पूरी तरह परे हैं, जो न केवल अतिसूक्ष्म बल्कि सभी सूक्ष्म वस्तुओं का स्रोत भी है।
'अचिन्त्यरूप' (acintya-rūpam) शब्द से भगवान की प्रकृति क्या समझी जाती है?
यह पद इस बात को दर्शाता है कि ईश्वर का रूप मानव बुद्धि या तर्क द्वारा पूरी तरह समझा नहीं जा सकता। यह वह अद्भुत और अनंत सत्य है जो हमारे सीमित मन की कल्पना से परे है, इसलिए इसे 'अचिन्त्य' यानी विचारणीय के बाहर माना गया है।
क्या यह श्लोक कहता है कि भगवान का रूप सूर्य जैसा दिखता है?
यह श्लोक यह बताता है कि ईश्वर का स्वरूप सूर्य की चमक जैसा ही उज्ज्वल और पवित्र है, जो हमारे भीतर के अंधकार (अज्ञान) को मिटा देता है।
जीवन में इस श्लोक का व्यावहारिक उपयोग कैसे किया जाए?
जब आप जीवन की किसी कठिन स्थिति या डर से जूझ रहे हों, तो यह श्लोक आपको बताता है कि एक ऐसे सत्य को ध्यान में रखें जो सभी समस्याओं और अज्ञान (तमस) से परे है। इसका अभ्यास करने से आपकी चिंता कम होती है क्योंकि आप जान लेते हैं कि वह 'नियन्ता' (शासनकर्ता) सब कुछ संभाल रहा है, भले ही स्थिति कितनी भी जटिल क्यों न हो।
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