भगवद्गीता 7.27
Jnana Vijnana Yoga · हिन्दी अनुवाद
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत | सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ||७-२७||
icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata . sarvabhūtāni sammohaṃ sarge yānti parantapa ||7-27||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को 'भारत' और 'परन्तप' के संबोधनों से पुकारते हुए बता रहे हैं कि सभी जीव जन्म लेने पर ही इच्छा (चाह) और द्वेष (अविद्या/नफरत) नामक दो भावों से उत्पन्न होने वाले भ्रामक मोह में फंस जाते हैं। यह 'द्वन्द्व' यानी सुख-दुःख, लाभ-क्षति जैसे विरोधाभासों का द्वंद्वमोह है जो जीव को अपनी वास्तविक प्रकृति से पराभूत कर देता है। कृष्ण यह समझा रहे हैं कि भ्रम या संमोह मनुष्य की जन्मांडु के साथ आया हुआ है, लेकिन इसे दूर करना भी उसी बुद्धि में निहित है जो वेदान्त और गीता सिखाती है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'ज्ञान योग' और 'संख्य दृष्टिकोण' की गहराई को स्पर्श करता है, जो बताता है कि भ्रम (अविद्या) जन्मजात नहीं बल्कि द्वंद्वों के प्रभाव से उत्पन्न होता है। यह वेदान्त के सिद्धांत 'द्वन्द्वोपेक्षित' की आधारशिला रखता है, जहाँ मुक्ति का मार्ग विरोधाभासों (इच्छा-द्वेष) को पार करने में निहित है। कृष्ण यही समझाते हैं कि जब तक हम द्वंद्व के चक्र से नहीं निकलेंगे, तब तक 'जन्म' और 'कर्म' का बंधन टूटेगा नहीं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश का हिस्सा है, जो गीता के सातवें अध्याय 'ज्ञान विज्ञान योग' में स्थित है। इस समय तक कृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया और उनके संदेहों को दूर किया था, लेकिन अब वे उन्हें आत्म-ज्ञान का गहरा रहस्य समझा रहे हैं कि दुनिया के जीव कैसे भ्रम में फंसते हैं। अर्जुन इस समय युद्ध की तैयारी करने वाले एक राजकुमार और योगी हैं जो अपनी भावात्मक उथल-पुथल (द्वंद्व) से गुजर रहे थे, इसलिए कृष्ण उन्हें यह समझा रहे हैं कि उनका संमोह जन्मजात है लेकिन इसे दूर किया जा सकता है।
आज के जीवन में
आज के आधुनिक जीवन में जब हम नौकरी या बिज़नेस में एक बड़ा फैसला लेने की स्थिति में होते हैं, तो अक्सर हम 'इच्छा' (अपने फायदे को लेकर) और 'द्वेष' (प्रतिस्पर्धी से डरकर) के बीच संघर्ष करते हुए भ्रमित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति नई पेशेवर चुनौती लेने में इच्छुक है लेकिन उससे जुड़े जोखिमों को लेकर द्वेष या भय भी रखता है, तो वह 'द्वंद्वमोह' का शिकार हो जाता है और सही निर्णय नहीं ले पाता। इस स्थिति में गीता की शिक्षा यह है कि हमें अपने अंतर से जुड़ना होगा, न कि केवल विपरीत भावों (लाभ/क्षति) के बीच दोलन करने पर।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम्हारे पास एक जादूई चश्मा है जिससे सब कुछ अच्छा दिखता है, लेकिन अगर तुम उस पर धूल जमी हुई देखो या उसे उल्टा पकड़ लो, तो तुम सिर्फ अंधेरा और भ्रमित दिखाई देते हो। जैसे इच्छा (कुछ चाहना) और द्वेष (कुछ से नफरत करना) एक-दूसरे के विपरीत हैं, वैसे ही ये दोनों मिलकर हमारे दिमाग पर पड़ी धूल की तरह काम करते हैं जिससे सच नहीं दिखाई देता। भगवान कृष्ण कहते हैं कि हर बच्चा जन्म लेते ही थोड़ा भ्रमित होकर आता है, लेकिन अगर तुम सीख जाओगे कि क्या करना है और क्या नहीं, तो वह धूल हट जाएगी और सब कुछ साफ़-साफ़ दिखेगा।
दैनिक चिंतन
प्रिय पाठक, क्या आपने कभी notice किया कि आपके दिन के अधिकांश दुख इच्छाओं (चाह) और द्वेष (नफरत) से उत्पन्न होते हैं? इस गीता की ओर देखते हुए समझें कि यही 'द्वंद्वमोह' आपको जन्म-जन्मान्तर के कर्मों में उलझाए रखता है। लेकिन यह संमोह अचूक नहीं है; आप अपने विवेक को जागृत करके इस चक्र से बाहर निकल सकते हैं और परतपा (अश्वत्थ) की तरह शत्रुओं, यानी अपनी ही प्रवृत्तियों के जीतते हुए आगे बढ़ सकते हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
आज की ध्यान प्रक्रिया में, अपने मन को उस 'इच्छा और द्वेष' के द्वंद्व पर ले जाएं जो आपके विचारों को घेरते हैं। जब भी कोई इरादा या नफरत उठे, गहराई से सोचें कि यह संमोह (अविवेक) है, जो आपको कर्मफल में बांधता है। इस भावना को स्वीकार करते हुए, उस परम तत्व की ओर ध्यान दें जिससे सभी भूतों का उद्भव होता है और मन को शांत करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- इच्छा-द्वेष का द्वंद्वमोह
संसार में सभी प्राणी 'इच्छा' (चाह) और 'द्वेष' (नफरत) के कारण उत्पन्न होने वाले भ्रम से ग्रस्त हैं। यह द्वंद्व मनुष्य को स्वभाविक रूप से अविवेक की स्थिति में डाल देता है, जिससे वह सत्य का मार्ग भूल जाता है। - सृजन काल में ही संमोह
भगवान कृष्ण बताते हैं कि यह अविवेक प्रारंभिक उत्पत्ति (sarga) के समय से ही सभी भूतों की सहज विशेषता है। इसका अर्थ है कि ज्ञान और विवेक का विकास एक निरंतर साधना है, न कि स्वभावगत धर्म। - परंतप को सत्य का मार्ग
'परन्तप' (शत्रुओं के नाश करने वाले) शब्द से कृष्ण अर्जुन को यह संकेत देते हैं कि वे इस द्वंद्वमोह पर विजय पा सकते हैं। ज्ञान और भक्ति योग द्वारा ही मनुष्य उस मोह से मुक्त हो सकता है जो उसे बंधनों में बांधे रखता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.69 — यह अनुच्छेद 'इच्छा और द्वेष' से मुक्ति पाने का वर्णन करता है, जो इस अध्याय के उद्देश्य को पूरा करती है।
- 14.5 — गुणों (सत्व, रजस्, तम) की चर्चा करने वाला यह श्लोक बताता है कि कैसे मोह हमें बंधन में डालता है।
- 18.59 — यह अंतिम उपदेश कृष्ण द्वारा दिया गया है जो द्वंद्वमोह से मुक्त होने के लिए और पूर्ण समर्पण की ओर ले जाता है।
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