भगवद्गीता 4.40

Jnana Karma Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 4.40 — "अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है,  (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक"
भगवद्गीता 4.40 — Jnana Karma Sanyasa Yoga
संस्कृत

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति | नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ||४-४०||

लिप्यंतरण

ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati . nāyaṃ loko.asti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ ||4-40||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को संदेह (द्वंद्व) और बिना श्रद्धा के रहने वाले व्यक्ति की स्थिति समझा रहे हैं। यह श्लोक कहता है कि जो व्यक्ति ज्ञानहीन, श्रद्धारहित और हमेशा संशय में रहते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि किसी भी निश्चित कर्म या ध्यान के लिए दृढ़ विश्वास आवश्यक है; यदि मन में लगातार संदेह रहेगा तो न इस जगत का सुख मिलेगा और न ही परलोक की प्राप्ति होगी।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ज्ञान योग और कर्म योग के सिद्धांतों पर आधारित है जो भक्ति (श्रद्धा) की अनुप्रेष्यता को उजागर करता है। यह दर्शाता है कि 'संदेह' (saṃśaya), जिसे अज्ञान का एक रूप माना गया है, मनुष्य के आत्म-साक्षात्कार और कर्म में स्थिरता की सबसे बड़ी बाधा है; जब तक संशय नहीं टूटता, तब तक न तो धार्मिक फल मिलते हैं न मोक्ष या सुख।

शब्दार्थ
अज्ञः the ignorant, च and, अश्रद्दधानः the faithless, च and, संशयात्मा the doubting self, विनश्यति goes to destruction, न not, अयम् this, लोकः world, अस्ति is, न not, परः the next, न not, सुखम् happiness, संशयात्मनः for the doubting self
पारंपरिक भाष्य
The ignorant one who has no knowledge of the Self. The man without faith one who has no faith in his own self, in the scriptures and the teachings of his Guru. A man of doubting mind is the most sinful of all. His condition is very deplorable. He is full of doubts as regards the next world. He does not rejoice in this world also, as he is very suspicious. He has no happiness.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया संदेश है, जहाँ वह 'ज्ञान कर्म सन्न्यास योग' (अध्याय 4) का हिस्सा है। इससे ठीक पहले, कृष्ण ने अर्जुन को ग्योत और आत्म-विद्या के महत्व की समझाई थी कि ज्ञानी पुरुष कैसे निरंतर अपने कर्म करते हुए भी बद्ध नहीं होते हैं। अर्जुन, जो अभी तक युद्ध करने से इनकार कर रहे थे और संदेह में डूबे हुए थे, उन्हें यह चेतावनी दी जा रही है कि यदि वे भगवान की शिक्षाओं को लेकर श्रद्धारहित रहेंगे या मन में लगातार द्वंद्व बनाए रखेंगे, तो उनके लिए दोनों ही जगतों का सुख समाप्त हो जाएगा।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप नौकरी बदलने के बारे में सोच रहे हैं और एक बड़ा निर्णय लेना चाहते हैं। यदि आप लगातार संदेह करते रहेंगे कि 'शायद यह गलत है', 'मेरा भविष्य खराब हो जाएगा' या बिना पूरी श्रद्धा (आत्म-विश्वास) के आधा-अधूरे कदम उठाएंगे, तो आप नई जगह पर खुशी नहीं पा पाएँगे और पुरानी स्थिति में भी तनाव बना रहेगा। यह अत्यंत स्पष्ट है कि बिना विश्वास और दृढ़ निश्चय के किया गया कोई भी कर्म या निर्णय मनुष्य को मानसिक शांति (sukha) प्रदान नहीं कर सकता, बल्कि उसे नकारात्मक परिस्थितियों में धकेल देता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम एक बहुत बड़ी पहेली हल करने की कोशिश कर रहे हो, लेकिन हर बार जब तुम्हें कोई उत्तर लगता है, तो तुम्हें शक होता है और तुम सोचते रहते हैं कि 'शायद यह गलत होगा'। अगर तुम इतने ज्यादा संदेह में रहोगे कि कभी भी निश्चित नहीं हो पाओगे, तो पहेली हल करना नामुमकिन हो जाएगा और तुम्हें खुशी भी नहीं मिलेगी। इस श्लोक का मतलब है कि जब हम किसी अच्छी बात (जैसे धर्म या सही काम) के बारे में पूरे दिल से विश्वास नहीं करते हैं, तो हमारी मेहनत बेकार चली जाती है और हम न दुनिया की खुशी पाते हैं न शांति।

दैनिक चिंतन

दोस्तों, अक्सर हम संदेह के जाल में फंसकर न तो वर्तमान का आनंद ले पाते हैं और न ही भविष्य की उम्मीद रख सकते हैं। जब आप अपने मन से 'शायद' शब्द को हटा देते हैं और पूर्ण श्रद्धा रखते हैं, तो यह जीवन आपके लिए सुखमय हो जाता है। इस संदेह के बिना रहकर ही आत्मा की शांति और परलोक का मार्ग खुलता है।

आज के लिए एक अभ्यास

इस क्षण अपने मन से 'क्या होगा' और 'शायद यह हो' जैसे संदेहों को हटाकर, पूर्ण विश्वास के साथ प्रेम की ओर मुड़ें। जो भी कार्य आप आज करेंगे, उसे ईश्वर में समर्पित करके निष्ठापूर्वक करें क्योंकि यही सच्चा सुख है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. संदेह: आत्म-विनಾश का कारण
    जब व्यक्ति अज्ञानी होता है या ईश्वर और धर्म पर श्रद्धा नहीं रखता, तो वह संदेह में जीने लगता है। यह निष्कर्षहीन संदिग्ध भाव पुरुष को नष्ट कर देता है क्योंकि यह उसके कर्तव्य के मार्ग से भटकाता है।
  2. श्रद्धा: सुख और मोक्ष की कुंजी
    संदेहयुक्त व्यक्ति न तो इस जगत में सच्चा सुख पा सकता है और न ही परलोक का लाभ। श्रद्धा (विश्वास) के बिना कर्म या ज्ञान की प्राप्ति असम्भव है, इसलिए ईश्वर पर भरोसा करना ही आत्म-सुधार की नींव है।
  3. ज्ञान और अर्जुन का संकट
    यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ज्ञान प्राप्त करने में यदि संदेह बना रहे तो वह उपयोग नहीं होता; यह नष्ट होने वाला मार्ग बन जाता है। इसलिए गुरु द्वारा दी गई शिक्षा को बिना किसी प्रश्न के स्वीकार करना ही अर्जुन की तरह सफलता का रास्ता है।

विषय

संशय का विनाश (Destruction of Doubt)विश्वास की महत्ता (Importance of Faith/Shraddha)ज्ञान और कर्म योग (Knowledge and Karma Yoga)मन के शासन पर नियंत्रण (Control over the Mind)दोनों लोकों से वंचित होना (Deprivation of Worlds)आत्म-विश्वास की आवश्यकता (Need for Self-Belief)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — इस अध्याय का मुख्य संदेश कि कर्म के फल की चिंता न करें, जो संदेह को दूर करता है।
  2. 3.30 — कामों को ईश्वर में समर्पित करने का विस्तृत मार्गदर्शन जो श्रद्धा और भक्ति से जुड़ा है।
  3. 12.15 — जो संतुष्ट हैं, निष्काम हैं और ईश्वर में स्थिर विश्वास रखते हैं, वही वास्तविक सुखी होते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवत गीता में 'संकल्प' और 'संदेश' में क्या अंतर है?
'संकल्प' (निश्चय) एक दृढ़ इरादा या ठानना है, जबकि संदेह (श्लोक 4.40 का विषय) मन की अनिश्चितता और शक करने की प्रवृत्ति है। गीता के अनुसार, संकल्प कर्म को सफल बनाता है, लेकिन लगातार बने रहने वाला संदेश मनुष्य को नष्ट कर देता है क्योंकि यह ध्यान और भक्ति में बाधा डालता है।
क्या यह श्लोक केवल ज्ञानियों या साधुओं पर लागू होता है?
नहीं, यह श्लोक सभी मनुष्यों पर लागू होता है जो जीवन में कोई भी महत्वपूर्ण कार्य करना चाहते हैं। चाहे वह नौकरी का निर्णय हो, पारिवारिक जिम्मेदारी या धार्मिक अनुष्ठान; यदि मन में 'श्रद्धारहित' संदेह बना रहेगा, तो परिणाम विनाश ही होगा और सुख की प्राप्ति नहीं होगी।
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