भगवद्गीता 3.28

Karma Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 3.28 — "परन्तु हे महाबाहो ! गुण और कर्म के विभाग के सत्य (तत्त्व)को जानने वाला ज्ञानी पुरुष यह जानकर कि "गुण"
भगवद्गीता 3.28 — Karma Yoga
संस्कृत

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः | गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ||३-२८||

लिप्यंतरण

tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ . guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate ||3-28||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि ज्ञानी पुरुष यह समझते हुए कि केवल गुण (प्रकृति की शक्तियां) ही एक-दूसरे में बस कर कार्य करते हैं, किसी भी कर्म से आसक्त नहीं होते। वे जानते हैं कि 'करने वाला' स्वयं अहंकार है और वास्तविक क्रियामें केवल गुणों का आपसी खेल चल रहा है। इसलिए, यह समझना ही मुक्ति की कुंजी है जो मनुष्य को कर्मफल की चिंता से आज़ाद करती है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग की शिक्षाओं का एक अभिन्न अंग है जो ज्ञान (ज्ञान) और कार्य (कर्म) के संबंध को स्पष्ट करता है। यह संख्या दर्शन (Sankhya) के सिद्धांत पर आधारित है कि प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) का अंतर करना ही वास्तविक ज्ञान है और इसी से कर्म में आसक्ति समाप्त होती है। यह दार्शनिक विचार 'कर्तापन' की भ्रामक धारणा को तोड़कर मुक्ति (moksha) के मार्ग पर ले जाता है।

शब्दार्थ
तत्त्ववित् the knower of the Truth, तु but, महाबाहो O mightyarmed, गुणकर्मविभागयोः of the divisions of alities and functions, गुणाः the alities (in the shape of senses), गुणेषु amidst the alities (in the shape of objects), वर्तन्ते remain, इति thus, मत्वा knowing, न not, सज्जते is attached
पारंपरिक भाष्य
He who knows the truth that the Self is entirely distinct from the three Gunas and actions does not become attached to the actions. He who knows the truth about the classification of the Gunas and their respective functions understands that the alities as senseorgans move amidst the alities as senseobjects. Therefore he is not attached to the actions. He knows? I am Akarta -- I am not the doer. (Cf. XIV.23).

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत की युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र पर स्थित है, जहाँ पांडवों सेनानी अर्जुन ने भीष्म पितामह के सामने अपने गुरुजन और स्वजन को मारने का विरोध कर दिया था। कृष्ण जी इस संकट की घड़ी में अर्जुन के हृदयस्थित मोह को दूर करने हेतु 'कर्मा योग' की शिक्षा दे रहे हैं, जो अब तक चल रही बोलचाल का एक उच्च बिंदु है। अर्जुन अभी भी कर्म से भागने या त्याग करने में भ्रमित थे, जबकि कृष्ण उन्हें यह सिखा रहे हैं कि कैसे ज्ञान के साथ कार्य करना चाहिए ताकि वह पाप न बन जाए।

आज के जीवन में

मान लीजिए एक प्रोजेक्ट मैनेजर किसी बड़े काम में विफलता का सामना कर रहा है और उसे लगता है कि 'मैं' ही असफल हुआ हूँ, जिससे गहरा चिंता और निराशा होती है। कर्मयोग के अनुसार, वह व्यक्ति यह समझ सकता है कि उसके हाथों से जो काम हो रहा था वह उसकी बुद्धि (ज्ञान), इच्छाशक्ति (इंद्रियां) और बाहरी परिस्थितियों (समय, टीम, संसाधन) के गुणों का परस्पर खेल था। यदि उसे यह दृष्टिकोण मिल जाए कि 'गुण ही गुणों में बर्तते हैं', तो वह अपने अहंकार को बाहर रखकर परिस्थितियों से सीखेगा और नई तैयारी के साथ काम करेगा, बिना निराश हुए।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

क्या आपको लगता है कि आप अपने हाथों से कुछ भी अकेले करते हैं? सोचिए जैसे एक बच्चा रंग भरने वाला पेंसिल कागज पर चला रहा होता है, लेकिन असल में वह पेंसिल की नोक और कागज़ के बीच घर्षण (rubbing) चलता है। ठीक उसी तरह, हमारे शरीर और मन 'प्रकृति' के तीन गुणों से काम करते हैं, जबकि हमारा अहंकार सोचता है कि सब मैंने किया। कृष्ण जी कहते हैं कि अगर आप समझ जाएंगे कि असल में ये गुण ही एक-दूसरे को छूकर चल रहे हैं, तो आपको दुख या खुशी के लिए चिंतित नहीं होना पड़ेगा और आप खेल जैसे कर्म कर सकते हैं।

दैनिक चिंतन

प्रिय पाठक, क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम कुछ करते हैं तो असल में 'गुण' ही दूसरे 'गुणों' से संवाद कर रहे होते हैं? अक्सर हम परिणामों की चिंता या अपने किए हुए काम के घमंड में फंस जाते हैं, लेकिन सच्चा ज्ञानी यह समझ जाता है कि कर्म स्वयं गतिशील गुणों का खेल है। जब आप इस तथ्य को अंदर से महसूस करते हैं, तो आपके हृदय से भारी बोझ और आसक्ति अपने-आप झुक जाती है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के समय में शांति से बैठें और यह सोचिए कि आपका शरीर, मन और बुद्धि स्वयं अपनी गतियों (गुणों) को संचालित कर रहे हैं। इस अनुभव को स्वीकार करते हुए, 'मैं कर्ता नहीं हूँ' का भाव धारण करें और अपने कार्यों में किसी विशेष परिणाम के लिए आसक्त न होने की शक्ति प्राप्त करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. गुणों का स्वतंत्र खेल (The Autonomous Play of Gunas)
    श्रीकृष्ण यह सिखाते हैं कि कर्म करने वाला वास्तविक 'मैं' नहीं, बल्कि प्रकृति के तीन गुण (सत्व, रज, तम) आपसी संवाद कर रहे होते हैं। जब हम यह सत्य जान लेते हैं कि सभी क्रियाएँ स्वाभाविक रूप से चल रही हैं, तो कर्तापन का भ्रम टूट जाता है।
  2. ज्ञानी की निष्काम स्थिति (The Dispassionate State of the Wise)
    तत्त्ववेत्ता पुरुष यह समझकर कि कर्म गुणों द्वारा किए जा रहे हैं, परिणामों में आसक्त नहीं होता। वह कार्यों को करता रहता है लेकिन उनमें फंसता या बाधाग्रस्त नहीं होता क्योंकि उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध है।
  3. कर्तृत्व का भ्रम मिटाएं (Dissolving the Illusion of Doership)
    यह श्लोक हमें सिखाता है कि जहाँ तक गुणों की क्रिया-प्रक्रिया से संबंध है, वहां 'मैं' या 'मेरा' का भाव पूर्णतः अर्थहीन हो जाता है। इस आध्यात्मिक दृष्टि को अपनाने से हम कर्मयोग के मार्ग पर निष्काम भावना के साथ चल सकते हैं।

विषय

कर्मा योग (Karma Yoga)गुणों की प्रकृति (Nature of Gunas)अहंकार का त्याग (Renunciation of Ego)ज्ञान और कर्म (Knowledge and Action)निष्काम कर्म (Action without attachment)आत्म-साक्षात्कार (Self-realization)

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  1. 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग का मूल सिद्धांत देता है कि आपको केवल अपना कर्तव्य करने में अधिकार है, परिणामों पर नहीं।
  2. 3.30 — इसमें भगवान ने अर्जुन को समझाया है कि सभी कार्यों का फल उन्हें सौंप दें और स्वयं निष्काम भाव से कर्म करें।
  3. 12.15 — गुरुजी इस श्लोक में बताते हैं कि जो व्यक्ति सभी प्राणियों को दुख नहीं पहुंचाता और उन्हें सुखा देना चाहता है, वही भक्त के समान प्रिय है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'गुणों' से क्या तात्पर्य है?
यहाँ 'गुणों' (Gunas) से प्रकृति की तीन मूल शक्तियों का संकेत मिलता है: सत्व (प्रकाश/ज्ञान), रज (उद्धम/क्रिया), और तम (अंधकार/आलस्य। ये गुण इंद्रियों, मन और बुद्धि के रूप में कार्य करते हैं जो वस्तुओं को आकर्षित या विकर्षित करते हैं।
यह श्लोक हमें चिंता से कैसे मुक्त कर सकता है?
जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि परिणाम उसके अकेले हाथ में नहीं हैं, बल्कि कई कारकों और गुणों के संयोग पर निर्भर करते हैं, तो उसका 'मैंने किया' वाला अहंकार कम होता है। इससे विफलता या सफलता की चिंता कमी होती है क्योंकि वह अपने कार्य को ईश्वरीय प्रक्रिया का हिस्सा मानकर समर्पित भाव से करता है।
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