भगवद्गीता 2.35
Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः | येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ||२-३५||
bhayādraṇāduparataṃ maṃsyante tvāṃ mahārathāḥ . yeṣāṃ ca tvaṃ bahumato bhūtvā yāsyasi lāghavam ||2-35||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि वे भय के कारण युद्ध छोड़ देंगे, तो मैदान में मौजूद महान योद्धा उन्हें डरपोक समझेंगे। जो लोग पहले आपकी बहुत सम्मान करते थे और आपको बड़ा मानते थे, अब उनका विचार बदलकर आप पर तुच्छता का भाव आ जाएगा। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि धर्म के पथ से हटने या डर के कारण कार्य छोड़ देने की स्थिति में व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा खो देता है और अपमानित हो जाता है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह भगवद गीता के 'कर्म योग' की धारा का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो कर्तव्य (dharma) को निभाने में आने वाले विघ्नों और डर पर बल देता है। यह संख्या दृष्टि (Sankhya Yoga) द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की समझ से जुड़ा हुआ है कि भय या लोभ के कारण कर्तव्य छोड़ना 'अज्ञान' का परिणाम है और इससे आत्मा के उच्च स्तर पर विचार करने वाली शक्ति (महारथियों) को ध्यान में नहीं लाया जा सकता।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में घटित हुआ है, जहाँ अर्जुन ने अपने ही रक्तसंबंधियों (कौरेवों) को मारने से इनकार कर दिया था और हथियार नीचे रखकर बैठा। भगवान श्री कृष्ण, जो अर्जुन के सहायक हैं, उन्हें उत्साहित करते हुए तार्किक और नैतिक कारण दे रहे हैं कि डर का प्रदर्शन करना उनके लिए शर्मनाक होगा। इस समय अर्जुन में गहन विषाद (संताप) था क्योंकि वह धर्म के कठोर नियमों और भावनात्मक बंधनों के बीच फंस गया था, और कृष्ण उन्हें यह स्मरण दिला रहे हैं कि त्याग से मिलने वाली प्रतिष्ठा की हानि।
आज के जीवन में
आज के आधुनिक संदर्भ में, यदि कोई प्रबंधक किसी महत्वपूर्ण परियोजना को शुरू करने वाले बड़े मंच पर डर या अनिश्चितता के कारण पीछे हट जाता है और अपना इस्तीफा दे देता है। तो न केवल उसकी कंपनी की तरक्ी रुक सकती है, बल्कि उसके सहकर्मी भी जो पहले उसे एक नेतृत्व कौशल वाले व्यक्ति मानते थे, अब उस पर संदेह करना शुरू कर देंगे। इस स्थिति में यह श्लोक हमें सिखाता है कि चुनौतीपूर्ण समय में हिम्मत दिखाकर कार्य पूरा करने से ही आत्म-सम्मान और पेशेवर प्रतिष्ठा बनी रहती है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम एक बहुत बड़ा खेल मैदान पर हो और सब तुम्हें जीतने का मौका दे रहे हैं, लेकिन अचानक डर लग गया तो तुम भाग गए। अगर ऐसा होता, तो दोस्तों को शायद यह न पसंद आएगा और वे सोचेंगे कि 'अरे! ये तो बहादुर नहीं थे'। कृष्ण जी कह रहे हैं जैसे एक सच्चा योद्धा भय के डर से भागना नहीं चाहिए, वैसे ही हमें भी मुश्किल समय में हार मानने की आदत नहीं डालनी चाहिए ताकि सबका सम्मान बना रह सके।
दैनिक चिंतन
क्या आपको लगता है कि आपका डर आपको कमज़ोर बना रहा है या फिर आपके करियर और रिश्तों में मान-मर्दन का खतरा बढ़ा रहा है? कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यदि भय के कारण हम धर्म से हट जाते हैं, तो बड़े-बड़े महारथी भी हमारी तुच्छता करने लगेंगे। अपनी स्थिति में आत्मविश्वास और साहस का होना ही असली सम्मान है, न कि दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए डर को दबाकर चलना। आज से आप यह संकल्प लें कि भय या शर्म के कारण कभी अपने धर्म से पीछे नहीं हटेंगे।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने भीतर की उस एक छोटी सी आवाज़ को सुनें जो आपको डराती है और युद्ध से हटाने का कहती है। जब भय आपके अंदर घर कर ले, तो याद रखें कि धर्म के पथ पर कदम बढ़ाते समय 'लोक' क्या सोचेंगे इसकी चिंता नहीं करना ही वास्तविक साहस है।
मुख्य शिक्षाएँ
- भय और मान-मर्दन का संबंध
जब कोई व्यक्ति डर के मारे युद्ध या कर्तव्य छोड़ देता है, तो समाज उसका सम्मान नहीं करता बल्कि उसे कमज़ोर समझकर त्यागने लगता है। महारथी लोग जो आपको पहले बहुत मानते थे, वे अब भय की वजह से आपकी तुच्छता करेंगे। - सामाजिक प्रतिष्ठा बनाम आत्म-विश्वास
दूसरों द्वारा दी गई प्रशंसा (बहुमत) तभी तक बनी रहती है जब हम साहस के साथ अपने कर्तव्य को निभाते हैं। यदि आप भय से भागेंगे, तो वह प्रतिष्ठा भी खो जाएगी जो आपको मिली हुई थी। - कर्त्तव्य की पूर्ति में दृढ़ता
धर्म के पथ पर चलने वाले को दूसरों के विचारों या डर से नहीं, बल्कि आंतरिक साहस और कर्तव्यबोध द्वारा प्रेरित होना चाहिए। भय का त्याग ही वह मार्ग है जिससे हमारी महानता बना रहती है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — अर्जुन का डर और 'फलाशक्ति' (फल के लिए इच्छा न होकर) सिद्धांत सीधे इस भय से जुड़ा है।
- 3.30 — सभी कर्मों को ईश्वर में समर्पित करके डर और फल की चिंता कैसे छोटी जाती है, यह इसमें विस्तार से बताया गया है।
- 12.15 — भक्तों के लिए किस प्रकार का स्वभाव (दुःख न देना) और साहस की आवश्यकता होती है, यह इस श्लोक में वर्णित है।
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