भगवद्गीता 2.34

Sankhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 2.34 — "और सब लोग तुम्हारी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कहते रहेंगे;  और सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर"
भगवद्गीता 2.34 — Sankhya Yoga
संस्कृत

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् | सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ||२-३४||

लिप्यंतरण

akīrtiṃ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te.avyayām . sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate ||2-34||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं कि यदि युद्ध में भाग जाओगे, तो सारे लोग तुम्हारी बदनामी करेंगे। इस बदनामी का प्रभाव हमेशा के लिए रहता है और सम्मानित व्यक्ति के लिए यह मरने से भी अधिक कठिन होता है। इस श्लोक में भय को दूर करके धर्म की ओर लौटने का संदेश दिया गया है कि अपकीर्ति (बदनामी) अमर हो जाती है जबकि शरीर नष्ट हो सकता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्म योग' (Karma Yoga) और 'संख्या दर्शन' की उस धारा में आता है जो कार्य करने के फल से भले ही स्वतंत्र हो, लेकिन लोकपथिष्टा (सार्वजनिक प्रतिष्ठा) का महत्व समझती है। यह सिद्धांत स्थापित करता है कि एक साधक को 'अकीर्ति' या बदनामी से बचने के लिए कर्म करना चाहिए, क्योंकि आत्मा की शुद्धि और लोक में गौरव ही सच्चा जीवन का लक्ष्य हो सकता है। यह दर्शन बताता है कि शरीर नष्ट होने पर भी प्रतिष्ठा अमर रहती है जो मरण से अधिक भयानक होती है।

शब्दार्थ
अकीर्तिम् dishonour, च and, अपि also, भूतानि beings, कथयिष्यन्ति will tell, ते thy, अव्ययाम् everlasting, संभावितस्य of the honoured, च and, अकीर्तिः dishonour, मरणात् than death, अतिरिच्यते exceeds
पारंपरिक भाष्य
The world also will ever recount thy infamy which will survive thee for a long time. Death is really preferable to disgrace to one who has been honoured as a great hero and mighty warrior with noble alities.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर स्थित है, जहाँ पांडवों सेनानी भीमसेनी की ओर खड़े हैं और द्रोणाचार्य द्वारा निर्मित चक्रवाहु रथ को देखकर अर्जुन विकल हो गए हैं। इस प्रसंग में शंखनाद के बाद कृष्ण ने अर्जुन का हौसला बढ़ाने के लिए संख्या योग की व्याख्या शुरू की है, जिसमें उन्होंने मोह और भय का निरसन किया था। अब कृष्लम अर्जुन को याद दिला रहे हैं कि यदि वे धर्म युद्ध से भागेंगे तो यह उनके पारिवारिक प्रतिष्ठा के लिए सबसे बड़ा दुख होगा, जो मृत्यु से भी अधिक भयानक है।

आज के जीवन में

आज की आधुनिक दुनिया में एक प्रमुख कार्यकारी कर्मचारी को यदि किसी मुश्किल निर्णय (जैसे अनुचित नीति के खिलाफ बोलना) से डरकर पीछे हटना पड़े, तो उसे नौकरी खोने या भविष्य की सुरक्षा की चिंता हो सकती है। लेकिन कृष्ण का संदेश बताता है कि यदि आप सत्य और धर्म के रास्ते से विचलित होते हैं, तो आपके आस-पास के लोग (साथी कार्यकर्ता, परिवार) आपको हमेशा 'कमजोर' या 'अविश्वसनीय' कहेंगे। यह बदनामी किसी एक दिन की नहीं होती और वह व्यक्तिगत मानसिक शांति को मृत्यु से अधिक गहरा आघात पहुंचाती है, इसलिए डर के बावजूद सही कर्म करना आवश्यक है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो अगर तुम्हारे दोस्तों के सामने कोई बड़ा वीर योद्धा डरकर भाग जाता, तो सब लोग उसकी कितनी मजाक उड़ाते और उसे 'डरा हुआ' कहते। ऐसा करने से वह शरीर से ज्यादा दुख पाता क्योंकि लोग उसके नाम पर साल भर तक बातें करते रहेंगे। इसलिए कृष्ण जी कहते हैं कि अगर तुम सही काम करोगे तो लोगों का सम्मान मिलेगा, और बदनामी मरने जैसी बुरी लगती है।

दैनिक चिंतन

प्रिय पाठक, कभी-कभी हम दूसरों की राय या बदनामी से इतने डरावने होते हैं कि हमारा ध्यान अपने दharma (कर्तव्य) से भटक जाता है। यह सत्य स्वीकार करें कि एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति, मृत्यु को भी अधिक कष्टदायक क्यों होती है; क्योंकि वह उस आत्मिक विश्वास पर प्रहार करती है जो हमें बनाए रखता है। आज इस भय से मुक्त होकर अपने कार्य में लगे रहें, यह जानते हुए कि आपका वास्तविक मूल्य बाहरी शब्दों में नहीं, बल्कि आपके आंतरिक निष्ठाओं और कर्मों में निहित है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपनी चिंताओं को पीछे रखकर सोचें कि क्या आपका मूल्य केवल दूसरों की प्रशंसा पर निर्भर करता है। अपने भीतर स्थित अमर आत्मा (Atman) और कर्मयोग का स्वरूप याद करें, न कि बाहरी शब्दों से बनी 'अपकीर्ति' को। जब आप जान लेंगे कि सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण भी अधिक है, तो मन शांत हो जाएगा।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. अपकीर्ति की गंभीरता का बोध
    श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि एक महान व्यक्ति के लिए बदनामी या अपकीर्ति प्राप्त होना, मृत्यु से भी अधिक भयानक है। यह तथ्य दर्शाता है कि मानवीय गरिमा और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व का नुकसान शारीरिक अस्तित्वात्मक हानि से कहीं बड़ा होता है।
  2. सम्मान बनाम कर्तव्य
    यह उपदेश बताता है कि जब तक मनुष्य अपने धर्म (dharma) और न्याय का पालन करता है, तब तक उसे दूसरों की प्रशंसा या निंदा से समझौता नहीं करना चाहिए। कर्तव्यपरायण व्यक्ति के लिए बाहरी विवेक कमजोर हो सकता है, लेकिन आंतरिक मानसिक शांति बनी रहती है।
  3. अमरत्व और स्थायी सत्य
    'avyayam' (अव्यय) शब्द का उपयोग करके कृष्ण संकेत देते हैं कि अपकीर्ति भी एक स्थिर अवस्था है जो समय के साथ बनी रहती है, जबकि आत्मा अमर है। इसलिए, हमें ऐसे भ्रामक बाहरी पहलुओं पर नहीं डूबना चाहिए जो नश्वर और विपथकारी हैं।

विषय

धर्म और कर्तव्य (Dharma and Duty)बदनामी का भय (Fear of Dishonor)मृत्यु बनाम अपकीर्ति (Death vs Infamy)सम्मान और प्रतिष्ठा (Honor and Reputation)कर्म योग की प्रेरणा (Motivation for Karma Yoga)भीषण परिस्थिति में साहस (Courage in Crisis)

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  1. 2.47 — इस श्लोक के तुरंत बाद, यह अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि कर्म करने पर अधिकार है, फल की अपेक्षा नहीं; जो अर्जुन को क्रोध और भय से मुक्त करता है।
  2. 3.30 — अगला चरण ज्ञान प्राप्त करने के बाद कर्मों को ईश्वर में समर्पित कर दिया जाता है, जो इस श्लोक से जुड़ी 'निष्काम भावना' की पूर्णता देता है।
  3. 12.15 — भगवान कृष्ण भक्तों के गुण बताते हैं जो अपकीर्ति और प्रशंसा दोनों से समान रूप पर रहते हैं, यह श्लोक की भावना को आगे बढ़ाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह श्लोक सिर्फ राजाओं या योद्धाओं के लिए है?
नहीं, इसका सार सभी मनुष्यों पर लागू होता है। चाहे आप एक छात्र हों, कर्मचारी हों या गृहस्थ जीवन में रहें, जब कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य से भागता है तो समाज की नजरों में उसकी बदनामी होती है जो उसके अस्तित्व के लिए घातक हो सकती है।
'अव्ययाम्' शब्द का क्या तात्पर्य है?
'अव्ययाम्' का शाब्दिक अर्थ 'नष्ट न होने वाला' या 'स्थायी' होता है। कृष्ण जी बता रहे हैं कि बदनामी (कथित अपकीर्ति) शरीर की तरह क्षणभंगुर नहीं होती, बल्कि यह पीढ़ियों तक और हमेशा के लिए रहती है जो एक सम्मानित व्यक्ति को सताती रहती है।
क्या मृत्यु से बदनामी वास्तव में अधिक भयानक हो सकती है?
संस्कृति और आध्यात्मिक दृष्टि从这个角度看, यह सच माना जाता है क्योंकि मृत्यु केवल शरीर का अंत है जबकि अपकीर्ति व्यक्ति की प्रतिष्ठा और चारित्र को हमेशा के लिए नष्ट कर देती है। एक सम्मानित पुरुष के लिए अपने नाम पर बुरी बातें सुनना उसके आत्म-सम्मान (Self-respect) को मरने से ज्यादा कठोर पीड़ा देता है।
इस श्लोक का 'कर्म योग' में क्या महत्व है?
यह श्लोक कर्मयोग के लिए एक प्रेरणादायी आधार तैयार करता है कि यदि आप डर या फल की आशा से भागेंगे तो बदनामी मिलेगी, इसलिए बिना परिणाम की चिंता किए अपने कर्तव्य को करना ही सही रास्ता है। यह भय के कारण निष्क्रिय होने वाले मनुष्यों को सक्रिय और धर्मपूर्ण जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है।
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