भगवद्गीता 18.48
Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् | सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ||१८-४८||
sahajaṃ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet . sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnirivāvṛtāḥ ||18-48||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह उपदेश दे रहे हैं कि कोई भी कर्म, चाहे उसमें कुछ दोष क्यों न हो जाएँ, उसे त्यागना नहीं चाहिए। वे कहते हैं जैसे धूध से जलती हुई आग पूरी तरह साफ नहीं होती वैसे ही सभी कर्म किसी ना किसी रूप में दोषपूर्ण होते हैं। इसका सार यह है कि अपनी प्रकृति के अनुसार होने वाले (सहज) कर्तव्य को पूर्णता की राह पर छोड़ना गलत है, बल्कि उसे निष्ठा से करना चाहिए।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक 'कर्म योग' की मुख्य धारा को आगे बढ़ाता है जो यह सिखाता है कि कर्तव्य का पालन करना ही मोक्ष की राह है, न कि कर्मों से पूर्ण विरति। इसमें 'दोष-सहिष्णुता' (fault-tolerance) और 'निष्काम भाव' को जोड़कर यह सिद्ध किया जाता है कि परिपूर्णता का इंतजार करने के बजाय प्रयास करना ही आध्यात्मिक अनुशासन है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत की युद्धस्थल कुरुक्षेत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया एक निर्णायक उपदेश है, जो गीता के आठवें अध्याय और 'मोक्षासन योग' का समापन कर रहा है। इस समय तक अर्जुन ने सभी प्रकार की शंकाओं (संकटों) को दूर किया था और अब वे कर्म त्यागने या सशक्त संघर्ष में शामिल होने के बीच द्वंद्व में थे। श्री कृष्ण ने पिछले अध्यायों में ज्ञान, भक्ति और कर्म का विस्तृत वर्णन करने के बाद इस श्लोक के माध्यम से अंततः 'सहज कर्म' (प्रकृतिगत कार्य) को त्यागने की प्रवृत्ति पर रोक लगा दी है।
आज के जीवन में
मान लीजिए एक नौकर या व्यवसायी किसी मुश्किल परियोजना के दौरान गलतियों का सामना कर रहा है और उसे लगता है कि 'सब कुछ खराब हो गया', इसलिए वह काम छोड़ने की सोच रहा है। इस स्थिति में भगवद्गीता 18.48 का संदेश यह होगा: चूँकि हर नई शुरुआत या बड़े प्रयास में त्रुटियां स्वाभाविक हैं, इसलिए आपको उस कर्म को बीच में ही छोड़ना नहीं चाहिए। इसके बजाय आप धैर्य से काम करते रहें और अपने दायित्व का पालन करें, क्योंकि दोषों के बावजूद प्रयास जारी रखने पर ही सफलता मिलती है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
बेटे/बेटी, जैसे एक चूल्हे में आग जलाई जाती है तो उससे धुआं निकलता है और आस-पास की चीजें थोड़ी काली हो सकती हैं, लेकिन यह नहीं कहते कि हमने आग को ही बुझा दिया या उसे फेक दिया। ठीक वैसे ही हर काम में कुछ गड़बड़ियाँ या कमियों के साथ शुरू होती है। अगर तुम किसी अच्छे और जरूरी काम (जैसे पढ़ना) से बच जाओगे तो वह कभी पूरा नहीं होगा, इसलिए अपनी प्रकृति के अनुसार किए गए काम को बिना डरे करना चाहिए।
दैनिक चिंतन
क्या आप भी अपने कामों में पूर्णता की तलाश में उदास हो जाते हैं? भगवान श्री कृष्ण बताते हैं कि जैसे धुएं के कारण अग्नि का संपर्क नहीं टूट जाता, वैसे ही किसी कार्य की छोटी-छोटी कमियों से हमें अपने दायित्वों को त्यागने का अधिकार नहीं मिलता। जब आप देखेंगे कि हर कर्म में कुछ न कुछ दोष अवश्य होते हैं, तो आप स्वभाविक रूप से किया जाने वाला अपना काम पूरी श्रद्धा के साथ करने लग जाएंगे। यह मानना ही वास्तव में आपके मन को मोक्ष की ओर ले जाता है।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के कर्मों को पूर्णता की खोज में नहीं, बल्कि अपने स्वभाव (सहज धर्मा) का अभिव्यक्ति मानकर करें। जब भी कार्य करने में कोई त्रुटि या बाधा महसूस हो, तो उसे अग्नि पर जमी हुई धूल समझें और अपनी आत्म-प्रेक्षा को त्यागने के बजाय गहराई से निहारें कि वह कर्म आपके लिए क्यों आवश्यक है।
मुख्य शिक्षाएँ
- कर्म का त्याग नहीं, पूर्णता की आशा छोड़ें
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि हमें अपने सहज कर्तव्य को केवल इसलिए नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि वह दोषपूर्ण लग रहा हो। वास्तविक सफलता कार्य में निरपेक्ष भाव से किए जाने और परिणाम की चिंका न करने में निहित है, न कि आदर्श परिस्थितियों का इंतजार करने में। - दोषों को अग्नि के धुएं जैसा समझें
अग्नि कभी भी बिना धुएँ की नहीं होती, लेकिन वह अपनी शक्ति और प्रकाश का कार्य जारी रखती है। इसी तरह जीवन में होने वाले छोटे-छोटे दोषों को नजरअंदाज करके हमें अपने मूल उद्देश्य (धर्म) पर केंद्रित रहना चाहिए। - सहज धर्म का पालन
'सहजा' शब्द इस बात की ओर इशारा करता है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए कोई न कोई कर्तव्य उसकी स्वभाविकता (स्वधर्म) से जुड़ा होता है। इसे छोड़ना आत्म-विघटन का कारण बन सकता है, चाहे वह कितनी भी बाधाओं वाला क्यों न हो।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक आपको 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' (केवल कर्तव्य में अधिकार है) की मूल सिद्धांत और दोषों के बावजूद कार्य करने का दृढ़ संकल्प समझने में मदद करेगा।
- 3.30 — यह श्लोक आपको कर्म को ईश्वर अर्पण (ईश्वर के प्रति समर्पित) करने की विधि सिखाएगा, जो दोषों से मुक्त होकर कार्य करने का आधार है।
- 12.15 — यह श्लोक आपको 'सर्वभूतहितरता' (सभी प्राणियों के कल्याण में रमण) की भावना सिखाएगा, जो स्वधर्म और सहनशीलता का परिपक्व रूप है।
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