भगवद्गीता 18.47

Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 18.47 — "सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म"
भगवद्गीता 18.47 — Moksha Sanyasa Yoga
संस्कृत

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||१८-४७||

लिप्यंतरण

śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt . svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||18-47||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि किसी दूसरे की धर्म या कर्तव्य को, भले ही वह पूरी कुशलता और शिष्टाचार के साथ किया गया हो, उससे बेहतर है कि मनुष्य अपने स्वभाव अनुसार किए गए कमजोर या अपूर्ण कर्तव्य (स्वधर्म) का पालन करे। यह उपदेश इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि अर्जुन युद्ध करने से इनकार कर रहे थे और सोच रहे थे कि दूसरा कोई कार्य करना बेहतर होगा। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि अपने स्वभाव के अनुसार किया गया कर्म, चाहे वह पूर्ण न भी हो, मनुष्य को पाप या क्लेश का कारण नहीं बनता बल्कि उसे आत्मिक शिष्टता की ओर ले जाता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग के सिद्धांतों को गहराई से परिभाषित करता है, जो यह स्पष्ट करता है कि क्रिया की शुद्धि उसके फल या बाहरी स्वरूप में नहीं, बल्कि उसकी 'स्वभाव' (प्रकृति) और आंतरिक निष्ठा में होती है। यह संख्या दर्शन (Sankhya) के तत्वों को भी छूता है जो प्रत्येक व्यक्ति की स्वयं की गुण-समष्टि (Guna-samasti) पर आधारित कर्म करने का महत्व बताते हैं, जब तक कि वह अपने लिए नियत न हो। इसमें यह दर्शाया गया है कि भले ही कार्य में बाहरी रूप से कमजोरी हो ('विरुण'), यदि वह स्वभाव के अनुरूप और समर्पण भाव से किया जाए तो वह पाप का कारण नहीं बनता।

शब्दार्थ
श्रेयान् better, स्वधर्मः ones own duty, विगुणः (though) destitute of merits, परधर्मात् that the duty of another, स्वनुष्ठितात् (than) well performed, स्वभावनियतम् ordained by his own nature, कर्म action, कुर्वन् doing, न not, आप्नोति (he) incurs, किल्बिषम् sin
पारंपरिक भाष्य
Just as a poisonous substance does not harm the worm born in that substance, so he who does his Svadharma (the duty ordained according to his own nature) does not incur any sin. What is poison to the whole world is sweet to a worm and yet sugarcane juice that is sweet causes its death. So a mans appointed duty which frees him from bondage must, therefore, be practised however difficult it may seem to be. If you try to do the duty of another it will bring,danger. He who has no knowledge of the Self cannot remain even for a moment without doing action. (Cf. III.35)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक भगवद् गीता के अंतर्गत चैप्टर 18 में आता है, जो 'मोक्ष संन्यास योग' नामक अध्याय है और महाभारत की कुरुक्षेत्र युद्ध भूमि पर घटित होता है। इस समय तक श्री कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान का दीप जला दिया था, फिर भी अर्जुन संशय में थे कि वे एक राजकुमार के रूप में दूसरे धर्मों (जैसे शिक्षक बनना या भिक्षुक होना) की तुलना में युद्ध करना क्यों करें। कृष्ण ने इस श्लोक के माध्यम से स्पष्ट किया है कि अर्जुन का स्वभाव 'क्षत्रिय' (योद्धा) है और उसी अनुसार अपने धर्म को निभाना ही उनकी मुक्ति का एकमात्र मार्ग है, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो।

आज के जीवन में

आज के समय में यह श्लोक उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो समाज की दबाव या 'लॉक-इन' (lock-in) के कारण ऐसे करियर चुन रहे हैं जहाँ वे अपने स्वभाव से मेल नहीं खाते। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रेम कहानी और रुचि में कविताएँ लिखने का शौकीन है लेकिन परिवार की दबाव या पैसों के लिए एक बड़े कॉर्पोरेट बैंक में accounting जॉब कर रहा है, तो उसे इसका एहसास होना चाहिए कि वह अनिवार्य रूप से अपने 'स्वधर्म' (अपनी प्रकृति) का पालन नहीं कर पा रहा। ऐसी स्थिति में, यदि वे धीरे-धीरे अपनी वास्तविक रुचि की ओर मुड़ते हैं या उस कार्य को करते हुए भी पूर्ण निष्ठा से काम लेते हैं, तो उन्हें मानसिक तनाव और 'किल्बिष' (पाप/अनुचितता) का अनुभव नहीं होगा।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम्हारे दोस्त ने पेंटिंग बहुत अच्छे से सीखी है, लेकिन उसमें वह खुश नहीं है। वहीं दूसरी तरफ, तुम गाना गाते हो और भले ही तुम्हारा गाना पूरी तरह सही न भी लगे, पर तुम उसे मज़े में करते हो। श्री कृष्ण कह रहे हैं कि ऐसा करना बेहतर है जो तुम्हारे दिल के करीब और तुम्हारी प्रकृति (स्वभाव) से मेल खाता हो, भले ही वह दूसरों की तरह महान न लगे। जब हम अपने असली स्वभाव के अनुसार कुछ करते हैं, तो हमें डर या पछतावा नहीं होता है, बल्कि अंदर शांति मिलती है।

दैनिक चिंतन

प्यारे दोस्त, क्या कभी आपको लगा है कि दूसरों की नकल करते हुए आप अपने असली स्वभाव से दूर होते जा रहे हैं? भगवान श्रीकृष्ण आज हमें याद दिलाते हैं कि 'स्वधर्म' का पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है, चाहे वह कितना भी साधारण क्यों न हो। जब आप अपने स्वाभाविक कर्तव्य को ईश्वर के समर्पण भाव से निभाते हैं, तो मन में कोई पाप या संदेह नहीं रहता और आपको आंतरिक शांति का अनुभव होता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने स्वभाव और वास्तविक क्षमताओं को पहचानें, न कि दूसरों की उम्मीदों या बाहरी परिभाषाओं में। जो कार्य आपकी प्रकृति के अनुरूप है, उसे बिना फल की चिंता किए पूर्ण एकाग्रता से करें और मन को शांत करने का अभ्यास करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. स्वधर्म की श्रेष्ठता (Superiority of One's Own Duty)
    अपूर्ण रूप से किया गया अपना कर्तव्य, दूसरों के पूरे किये गए धर्म से बेहतर है। यह सिद्धांत हमें बाहर की दुनिया में देखी जाने वाली सफलताओं पर नहीं, बल्कि आंतरिक अनुकूलन और स्वभाव पर ध्यान केंद्रित करने को प्रेरित करता है।
  2. पाप-रहित जीवन का मार्ग (Path to a Sinless Life)
    जब कोई व्यक्ति अपने 'स्वभवा' या स्वभाव से नियत कर्मों में लगता है, तो उसे किसी भी पाप या नैतिक बाधा का सामना नहीं करना पड़ता। यह तथ्य दर्शाता है कि सच्चाई और स्वयं की प्रकृति के साथ जीवन बिताना ही अशुद्धि से मुक्ति की कुंजी है।
  3. पारतंत्र्या का परित्याग (Renunciation of External Comparison)
    यह उपदेश हमें दूसरों के मार्ग को नकल करने और 'परधर्म' में फंसने से बचाने की चेतावनी देता है। वास्तविक आत्म-साक्षात्कार तभी संभव होता है जब व्यक्ति अपनी अनन्य प्रतिभाओं और कर्तव्यों पर ध्यान केन्द्रित करता है।

विषय

स्वधर्म और परधर्मकर्म योग का सिद्धांतआत्म-ज्ञान और स्वभावपाप से मुक्तिकर्तव्य की पालनामानसिक शांति

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह अंश कर्मयोग का आधार स्तम्भ है और बताता है कि फल की इच्छा के बिना कार्य करने का महत्व, जो स्वधर्म निष्ठा से सीधा जुड़ा हुआ है।
  2. 3.35 — यह श्लोक स्पष्ट करता है कि 'स्वधर्म' में मृत्यु क्यों बेहतर है, और यह वर्तमान प्रश्न के विस्तारित व्याख्यात्मक आधार के रूप में काम करेगा।
  3. 12.15 — यह अंश बताता है कि कर्मयोगी कैसे पाप-रहित और सभी जीवों को सुख देने वाला बन जाता है, जो स्वधर्म के पालन का परिणाम है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्वधर्म का अर्थ क्या है और यह परधर्म से कैसे भिन्न है?
स्वधर्म का अर्थ है 'अपने स्वभाव (प्रकृति) के अनुसार किया गया कर्तव्य', जबकि परधर्म किसी दूसरे की प्रकृति या समाज द्वारा निर्धारित अन्य कार्य को कहते हैं। गीता में स्पष्ट किया गया है कि भले ही आप दूसरों का काम बहुत अच्छे से करें, वह आपके लिए पाप का कारण बन सकता है यदि वह आपके अंतर्निहित स्वभाव के विरुद्ध हो।
क्या यह श्लोक कहता है कि हमें अपने धर्म को पूर्ण रूप से नहीं करना चाहिए?
नहीं, बिल्कुल भी; इसका अर्थ यह नहीं है कि आप कमजोर प्रयास करें। गीता बताती है कि 'विगुण' (कमजोर) स्वधर्म का पालन करने वाला व्यक्ति उससे अधिक पाप से मुक्त रहता है जो किसी दूसरे के धर्म को बड़े उत्साह और कुशलता ('स्वनुष्ठित') से करता है। इसका तात्पर्य यह है कि आप अपने वास्तविक स्वभाव की ओर झुकें, भले ही वह कठिन लगे या पूर्ण न हो, क्योंकि अंतर्निहित सत्य में ही श्रेय (मंगल) निहित है।
क्या इसका मतलब यह है कि हमें अपनी पसंद के अनुसार कोई भी काम करना चाहिए?
नहीं, 'स्वभाव' का अर्थ बस मनमानी या लालच नहीं है। यहाँ स्वभाव से तात्पर्य उस गुण-प्रकृति (गुणात्मक प्रकृति) से है जो आपको जन्म से मिली होती है और जिसके अनुसार आपका कर्म करना आपके लिए आत्मिक विकास का रास्ता है। यदि कोई व्यक्ति अपने सही धर्म के विपरीत काम करता है, तो वह मानसिक तनाव (किल्बिष) में फंस जाता है।
यह श्लोक आज की दुनिया में कैसे लागू होता है?
आज के समय में यह उन लोगों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है जो समाज या परिवार के दबाव पर ऐसे करियर चुन रहे हैं जहाँ वे खुद को सफल महसूस नहीं करते। यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रकृति और रुचि (स्वधर्म) के विपरीत काम करता है, तो उसे अक्सर मानसिक तनाव या निराशा होती है; इसलिए गीता कहती है कि अपने स्वभाव के अनुसार किया गया कर्म ही मनुष्य को पाप और दुख से बचाता है।
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