भगवद्गीता 18.15

Moksha Sanyasa Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 18.15 — "मनुष्य अपने शरीर, वाणी और मन से जो कोई न्याय्य (उचित) या विपरीत (अनुचित) कर्म करता है, उसके ये पाँच "
भगवद्गीता 18.15 — Moksha Sanyasa Yoga
संस्कृत

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः | न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ||१८-१५||

लिप्यंतरण

śarīravāṅmanobhiryatkarma prārabhate naraḥ . nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ ||18-15||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि कोई भी काम, चाहे वह सही हो या गलत, करने के लिए पाँच मुख्य कारण होते हैं। ये पाँच कारण शरीर की क्रियाएँ, वाणी का प्रयोग और मन की स्थिति सहित हमारे अहंकार (कर्तापन) को शामिल करते हैं। यह শ्लोक बताता है कि जब तक हम इन कारकों के साथ जुड़े रहते हैं, तब तक कर्मफल का अनुभव होता ही रहेगा।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह गीता की 'कर्म योग' (Karma Yoga) परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है जो यह स्पष्ट करता है कि कैसे आत्मा कर्ता नहीं, बल्कि केवल एक साक्षी होती है। इसमें 'अहंकार' को पाँच कारणों में विभाजित करके दिखाया गया है ताकि व्यक्ति यह समझ सके कि वह वास्तव में क्या कर रहा है और उसका फल किस पर आना चाहिए।

शब्दार्थ
शरीरवाङ्मनोभिः by (his) body, speech and mind, यत् whatever, कर्म action, प्रारभते performs, नरः man, न्याय्यम् right, वा or, विपरीतम् the reverse, वा or, पञ्च five, एते these, तस्य its, हेतवः causes
पारंपरिक भाष्य
Nyayyam Right Not opposed to Dharma conformable to the scriptures justifiable. Viparitam The opposite What is opposite to Dharma and opposed to the scriptures unjustifiable. Even those actions? -- acts like winking and the like which are necessary conditions of life, are indicated by the term the right and the reverse, as they are effects of past Dharma and Adharma. Tasya Hetavah Its Causes The causes of every action. An objector argues In the previous verse it is said that the body, actor, various organs, etc., are the necessary factors of every action. Why do you then make a distinction in actions by saying whatever action a man does by the body, speech and mindOur answer is In the performance of every action, one of the three -- body, speech or mind -- has a more prominent share than the others while seeing, hearing and other activities which accompany or go along with life are subordinate to that one. Therefore all actions are classified under three groups and are spoken of as done by the body or speech or mind. The fruit of an actions also is enjoyed through the body, speech and mind and one of the three takes a more prominent share than the rest. Therefore, it is proper to say Whatever action a man performs with his body, speech and mind৷৷.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जहाँ अर्जुन अपने ही बंधुओं और गुरुओं का वध करने से इनकार कर रहा था। अध्याय 18 की शुरुआत कृष्ण 'संन्यास' (त्याग) और 'मुक्ति' के बारे में बता रहे होते हैं, जहाँ अर्जुन यह जानना चाहता है कि सच्चा त्याग क्या है। इस संदर्भ में, कृष्ण ने पहले बताया था कि हर काम के लिए कारणों का समूह होता है, जिससे अर्जुन को यह स्पष्ट हो कि वह युद्ध क्यों कर रहा है और उसके पीछे क्या कारक कार्यरत हैं।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की रिपोर्ट तैयार करते समय किसी गलती का सामना करते हैं, तो यह श्लोक आपको याद दिलाएगा कि केवल 'मैंने ऐसा नहीं किया' कहने से काम नहीं चलेगा। आपके हाथों ने टाइपिंग की (शरीर), आपने अपने सहकर्मियों को समझाया (वाणी) और उस समय आपका मन कहीं और था या घबराहट में था (मन)। इसे पहचानना आपको यह बताएगा कि भविष्य में इसी तरह के तनाव से बचने के लिए अपने शरीर, वाणी और मन को एक साथ कैसे नियंत्रित करना है ताकि आपका कर्मफल सही दिशा दे।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे एक लड़का खाना पकाने के लिए हाथों से सब्जी चालू करता है, आवाज़ में बातें करता है और दिमाग़ से सोचता है कि क्या बनना चाहिए, वैसे ही हम हर काम करते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि जब तुम कोई भी अच्छा या बुरा काम करते हो, तो उसके लिए तुम्हारे हाथ, मुंह और मन की मदद लेनी पड़ती है। यह सिखाता है कि अलविदा करने से पहले हमें ये सभी 5 चीज़ें समझनी चाहिए जो काम को पूरा करवाते हैं।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, जब हम सुबह उठते हैं या दिन भर में कोई कार्य करते हैं, तो क्या हमने कभी सोचा है कि 'मैं' किस प्रकार उस क्रिया का कारण बन रहा हूँ? इस भगवद् गीता के श्लोक 18.15 को समझना हमें यह स्वीकार करने की ताकत देता है कि चाहे कार्य उचित हो या अनुचित, उसके पीछे आपके पाँच मुख्य साधन (शरीर, वाणी और मन) ही हैं। इसे जानकर आप न केवल अपनी त्रुटियों को पहचानेंगे बल्कि अपने कर्मों पर अधिक जागरूक भी होंगे।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के आराम बैठते समय, अपने शरीर की क्रियाओं, बोलने की प्रवृत्ति और मन के विचारों को एक-एक करके देखें। यह सोचें कि आप जो भी कार्य (न्याय्य या विपरीत) करते हैं, उसके पीछे ये पाँच कारण कैसे काम कर रहे हैं। इस अहसास के साथ कर्म का अनुभव करें कि यह सभी आपके द्वारा किया गया है और इसके लिए आप स्वयं उत्तरदायी हैं।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. पाँच कारण: कर्म का आधारभूत ढांचा
    श्लोक स्पष्ट करता है कि किसी भी कार्य के सफल होने या फल प्राप्त करने के लिए पाँच विशिष्ट कारण (हेतु) आवश्यक होते हैं। ये कारण शरीर, वाणी और मन की क्रियाओं को मिलाकर वह समग्र प्रक्रिया बनाते हैं जिसके द्वारा न्याय्य या विपरीत कर्म संपन्न होता है।
  2. न्याय्यता का निर्णय स्वयं में निहित
    कर्म की शुद्धि (न्याय्य) या असुविधा (विपरीत) तभी होती है जब ये पाँच कारण सही दिशा में कार्य करते हैं। यह सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियों के अलावा, हमारे अपने संसाधनों का प्रयोग कैसे निर्णायक भूमिका निभाता है।
  3. कर्त्तृत्व की पूर्ण जिम्मेदारी
    यह श्लोक कर्म के फल के लिए किसी बाहरी देवता या भाग्य को दोष देने का अवसर नहीं छोड़ता। यह आध्यात्मिक दृष्टि से स्पष्ट करता है कि अंततः सभी कार्य हमारे अपने पाँच कारणों की प्रक्रिया हैं, इसलिए फल भी उसी के अनुसार प्राप्त होगा।

विषय

कर्म के पाँच कारण (Five Causes of Action)कर्तापन का त्याग (Renunciation of Egoism)शरीर, वाणी और मन की भूमिकादharma या अन्याय्य कर्ममुक्ति का मार्गसंन्यास योग

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — इस श्लोक में 'कर्म करो' का मूल सिद्धांत और फल की आकांक्षा न करने के महत्व को समझें, जो पाँच कारणों पर आधारित कर्म से जुड़ता है।
  2. 3.30 — कर्म का अर्पण (समर्पण) कैसे किया जाए और ईश्वर को समर्पित करके पाँच कारणों के साथ कर्म करने की विधि इस श्लोक में बताई गई है।
  3. 12.15 — जो व्यक्ति न्याय्य और विपरीत दोनों पर समान रहता है, वही वास्तविक ज्ञानी बन सकता है; यह श्लोक इस स्थिति को परिभाषित करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'शरीरवाङ्मनोभिः' (shariravanmanobhih) क्या दर्शाता है?
यह पद संक्षेप में तीन उपकरणों को दर्शाता है जिनके द्वारा कर्म संपन्न होता है: शरीर (क्या करना), वाणी (क्या कहना या आदेश देना) और मन (सोचना और निर्णय लेना)। इन तीनों के बिना कोई भी पूर्ण कर्म नहीं हो सकता, इसलिए इन्हें जानबूझकर समझना आवश्यक है।
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