भगवद्गीता 17.17

Shraddhatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 17.17 — "फल की आकांक्षा न रखने वाले युक्त पुरुषों के द्वारा परम श्रद्धा से किये गये उस पूर्वोक्त त्रिविध तप क"
भगवद्गीता 17.17 — Shraddhatraya Vibhaga Yoga
संस्कृत

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः | अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ||१७-१७||

लिप्यंतरण

śraddhayā parayā taptaṃ tapastattrividhaṃ naraiḥ . aphalākāṅkṣibhiryuktaiḥ sāttvikaṃ paricakṣate ||17-17||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि श्रद्धा के तीन रूपों में से सबसे ऊँचा सात्विक तप है। यह उन पुरुषों द्वारा किया जाता है जो परम विश्वास और दृढ़ता रखते हैं, लेकिन किसी भी फल की आकांक्षा नहीं करते। जब कोई कठिन कार्य या अनुशासन बिना लालच के करता है, तो वह सात्विक तप कहलाता है। यह श्रद्धा का सबसे पवित्र रूप है जो मन को शुद्ध करता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक कर्म योग और सांख्य दर्शन के सिद्धांतों पर आधारित है जो बताते हैं कि शुद्ध कार्यों का फल तभी मिलता है जब कार्य स्वयं में पूर्ण हो, न कि परिणाम की इच्छा से। यह 'निष्काम कर्म' (फल की आकांक्षा रहित) के सिद्धान्त को विकसित करता है जो मोक्ष मार्ग का आधार है। यहाँ सात्विक गुण की प्रचुरता दिखाई देती है जो अज्ञान और राजसी तमोगुणों से ऊपर उठकर ज्ञान और शांति तक ले जाती है।

शब्दार्थ
श्रद्धया with faith, परया highest, तप्तम् practised, तपः austerity, तत् that, त्रिविधम् threefold, नरैः by men, अफलाकाङ्क्षिभिः desiring no fruit, युक्तैः steadfast, सात्त्विकम् Sattvic, परिचक्षते (they) declare
पारंपरिक भाष्य
Trividham Threefold -- physical, vocal and mental. Yuktaih Steadfast Balanced in mind, unaffected in success and failure. Sraddhaya With faith With belief in the existence of God, in the words of the preceptor, in the teachings of the scriptures and in ones own Self.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया एक महत्वपूर्ण संदेश है, जहाँ वे 'श्रद्दात्रय विभाग योग' (17वें अध्याय) का वर्णन कर रहे हैं। इससे ठीक पहले कृष्ण ने बताया कि कैसे श्रद्धा के तीन प्रकार होते हैं और उनका प्रभाव भोजन या बलिदान पर पड़ता है। अर्जुन, जो युद्ध से हतप्रभ होकर संशय में था, अब यह जान रहा है कि निःस्वार्थ भावना वाले कर्म ही वास्तविक सात्विक धर्म हैं।

आज के जीवन में

कल्पना करें एक नौकर या डॉक्टर जो बिना किसी प्रमोशन की उम्मीद के, दिन-रात मेहनत करता है क्योंकि उसे लगता है कि उसका काम समाज के लिए जरूरी है। यदि वह आज कठिन निर्णय ले रहा है कि क्या अपनी पुरानी आदतों को छोड़ना चाहिए या नहीं, तो सात्विक तप का अर्थ होगा बिना डर और लालच के उस सही रास्ते पर चलने की दृढ़ता। यह स्थिति तब होती है जब हमें लगता है कि परिणाम चाहे कुछ भी हो, लेकिन निष्ठा बनाए रखनी चाहिए।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम अपने कमरे की सफ़ाइ कर रहे हो या स्कूल के लिए एक मुश्किल प्रोजेक्ट बना रहे हो। अगर तुम यह काम तब करते हो जब तुम्हें लगता है कि 'मेरी माँ मुझे प्यार करेंगी' या 'मुझे कोई इनाम मिलेगा', तो वह ठीक नहीं चल रहा होता। लेकिन अगर तुम बिना किसी इनाम के, बस इसलिए करोगे क्योंकि यह सही काम है और तुम्हें इसमें विश्वास है, तो वही असली अच्छाई है। जैसे पेड़ फल देता है न कि पानी मांगने पर, वैसे ही सात्विक तप बिना कुछ माँगे किया जाता है।

दैनिक चिंतन

प्रिय पाठक, क्या आपने कभी देखा है कि जब हम किसी कार्य को बस 'करना' के लिए करते हैं, बिना इसकी चिंता किए कि परिणाम कैसा होगा, तो काम में एक अनोखी शक्ति और शांति आ जाती है? आज की यह घड़ी आपको उन पुरुषों या नारियों का स्मरण कराएगी जो 'परम श्रद्धा' से कार्य करते हैं लेकिन फल की इच्छा नहीं रखते। जब हमारा मन परिणाम के भय या लालच से मुक्त हो जाता है, तो तपस्या और कर्म एक सात्विक आनंद में परिवर्तित हो जाते हैं जो आपको अंतःकरण की गहराई तक शुद्ध करते हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के लिए स्वयं को प्रश्न करें कि क्या आप जो कर रहे हैं, उसका फल लेकर नहीं बल्कि निष्काम भाव से कर रहे हैं? अपने मन की गहराई में बैठकर देखें कि कहीं कोई अपेक्षा या लालच तो आपको कार्य करने में बाधा तो नहीं डाल रहा है। जब तक यह सात्विक तप का अनुभव होगा, आपका अहंकार धीरे-धीरे शांत होता जाएगा और प्रकृति की शुद्धता आपके भीतर उभरने लगेगी।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. परम श्रद्धा का आधार
    यह शिक्षण बताता है कि किसी भी तपस्या या कर्म को सात्विक बनाने की सबसे महत्वपूर्ण नींव 'श्रद्धा' है, जो केवल विश्वास नहीं बल्कि गहन आस्था और समर्पण का भाव है। बिना इस परम श्रद्धा के किया गया कोई भी कार्य पूर्ण रूप से शुद्ध या सफल नहीं माना जा सकता, चाहे वह कितनी ही कठिन क्यों न हो।
  2. निष्काम भाव का महत्व
    सात्त्विक तपस्या की पहचान 'अफलकांक्षी' होने में है, अर्थात कार्य के फल या परिणाम को लेकर चिंतित न होना। जब हमारा मानस स्थिर होता है और कर्म स्वयं करने का आनंद लेता है, तो वह तपस्या पावन बन जाती है जो मन की शुद्धि करती है।
  3. सात्विक योग में संयोग
    श्री भगवान कृष्ण बताते हैं कि वे पुरुष जो 'युक्त' अर्थात नियंत्रित और सम्यक ज्ञान से युक्त होते हुए तप करते हैं, वही सात्त्विक कहलाते हैं। यह केवल शारीरिक या मानसिक प्रयास नहीं है, बल्कि एक संतुलित अवस्था है जिसमें बुद्धि का प्रयोग करके कर्म किया जाता है।

विषय

सात्विक तप का महत्वनिष्काम कर्म की शिक्षाश्रद्धा के तीन रूपफल त्याग और समर्पणआत्म-शासन और अनुशासनयोग दर्शन में शुद्धि

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आगे पढ़ें

  1. 17.28 — इस श्लोक के बाद यह पढ़ें ताकि समझ सकें कि अशिष्ट या असत्य तपस्या का परिणाम क्या होता है और सात्त्विक तपस्या की तुलना कैसे करें।
  2. 2.47 — फल के प्रति निष्काम भाव को गहराई से समझने के लिए इस मूलभूत श्लोक का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है जो कर्मयोग की नींव रखता है।
  3. 17.5 — सात्विक, राजस और तामस गुरुओं के गुणों को जानने से आप अपने आत्म-शोधन में सहायक सिद्धांतों की व्यापक समझ प्राप्त कर पाएंगे।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या 'अफलकांक्षि' होने से काम करने में उत्साह कम हो जाता है?
नहीं, बल्कि इसके विपरीत होता है। जब हम किसी फल की उम्मीद नहीं करते तो मन का बोझ हट जाता है और कार्य को पूरी एकाग्रता के साथ किया जा सकता है। यह स्थिति व्यक्ति में अधिक ऊर्जा और सकारात्मक भावनाएं लाती हैं क्योंकि वह स्वयं कर्म पर ध्यान देता है, न कि परिणाम की चिंता पर।
सात्विक तप क्या होता है और इसे कैसे पहचानें?
सात्विक तप वह अनुशासन या कठिन कार्य है जो उच्च श्रद्धा (विश्वास) से किया जाता है, लेकिन किसी भी स्वार्थी लाभ की आकांक्षा के बिना। यह उस व्यक्ति द्वारा किया जाता है जिसके मन में लालच नहीं होता और वह परिणाम भगवान पर छोड़ देता है। इसकी पहचान इसमें होती है कि कार्य करने वाले को अपने कर्म से ही संतोष मिलता है, न कि बाहरी पुरस्कारों से।
क्या यह श्लोक केवल धार्मिक तप पर लागू होता है?
नहीं, इसका विस्तृत अर्थ जीवन के सभी क्षेत्रों में किया जाने वाले कर्मों पर लागू होता है। चाहे वह पढ़ाई हो, व्यावसायिक कार्य या परिवार की देखभाल, यदि इसे बिना किसी फल की इच्छा और पूर्ण विश्वास से किया जाए तो यह सात्विक तप ही माना जाएगा। भगवान कृष्ण ने यहाँ केवल पूजा-पाठ को नहीं, बल्कि जीवन में किए जाने वाले हर शुद्ध कार्य का वर्णन किया है।
कर्म योग और सात्विक तप के बीच क्या संबंध है?
सात्विक तप कर्म योग की एक प्रमुख अभिव्यक्ति है, जहाँ व्यक्ति निष्काम भाव से कार्य करता है। दोनों ही दर्शन 'फल त्याग' को महत्व देते हैं और मानते हैं कि शुद्ध मन के लिए यह आवश्यक है। जब कोई सात्विक तप करता है तो वह कर्म योग की प्राप्ति का मार्ग बन जाता है, जो अंततः आत्म-ज्ञान तक ले जाता है।
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