भगवद्गीता 16.22

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 16.22 — "हे कौन्तेय ! नरक के इन तीनों द्वारों से विमुक्त पुरुष अपने कल्याण के साधन का आचरण करता है और इस प्रक"
भगवद्गीता 16.22 — Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
संस्कृत

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः | आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ||१६-२२||

लिप्यंतरण

etairvimuktaḥ kaunteya tamodvāraistribhirnaraḥ . ācaratyātmanaḥ śreyastato yāti parāṃ gatim ||16-22||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि मनुष्य के तीन मुख्य बाधाएं या 'अंधकार के द्वार' है: काम (इच्छा), क्रोध और मोह। जब कोई व्यक्ति इन तीनों से मुक्त होकर अपने हित के मार्ग का पालन करता है, तो वह परम श्रेष्ठ गति को प्राप्त होता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि निंदा करने योग्य स्वभाव वालों की तरह न रहकर, शुद्ध चेतना वाले होने में ही सच्चा कल्याण है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) के सिद्धांतों को दर्शाता है, विशेष रूप से 'विवेक' या तार्किक स्पष्टता पर आधारित कर्मयोग का एक पहलू है। यह बताता है कि आत्म-ज्ञान की प्राप्ति और मोक्ष प्राप्त करने के लिए अहंकार और तीनों पापों (काम, क्रोध, मोह) को नष्ट करना आवश्यक है, जो 'अध्यात्मा' की शुद्धि का आधार है।

शब्दार्थ
एतैः from these, विमुक्तः liberated, कौन्तेय O Kaunteya, तमोद्वारैः gates to darkness, त्रिभिः (by) three, नरः the man, आचरति practises, आत्मनः for him, श्रेयः what is good, ततः and then, याति goes to, पराम् the Supreme, गतिम् Goal
पारंपरिक भाष्य
When these gates to hell are abandoned, the path to salvation is made clear for the aspirant. He gets the company of sages, which leads to liberation. He gets spiritual instructions and practises them. He hears the scriptures, reflects, meditates and attains Selfrealisation. Tamodvara Gate to darkness leading to hell which is full of pain and delusion.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में होता है, जहां भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को सान्त्वना और दिशा दे रहे हैं। इससे पहले उन्होंने अध्याय 16 की शुरुआत से ही 'दैवी' (देवताओं वाली) और 'असुरी' (राक्षसी) प्रकृतियों का विस्तार से वर्णन किया है, जिसमें अर्जुन को यह समझाया गया कि असुर स्वभाव वाले लोग इन तीन पापों के गुलाम बन जाते हैं। कृष्ण तब इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं जब वे अर्जुन की मनोदशा में आए संदेह और भ्रम को दूर करके उन्हें सकारात्मक दिशा देना चाहते थे कि इन बुराइयों से मुक्त होकर ही वह अपने धर्म का पालन कर सकता है।

आज के जीवन में

आज के समय में, जब किसी कठिन फैसले की स्थिति होती है—जैसे नौकरी बदलने या विवाद सुलझाने को लेकर—हम अक्सर काम (अनावश्यक इच्छा), क्रोध (गुस्से में तुरंत निर्णय लेना) और मोह (पुरानी आदतों से चिपके रहना) की वजह से गलत कदम उठाते हैं। इस श्लोक का उपयोग करते हुए, हमें पहले यह पहचानना होगा कि क्या कोई फैसला इन तीनों भावनाओं से प्रेरित है या नहीं। यदि आप किसी कार्य को बिना क्रोध के और लालच में किए बिना, सिर्फ अपने कल्याण और नैतिकता की ओर देखकर करते हैं, तो वह निर्णय आपको मानसिक शांति और दीर्घकालिक सफलता (परा गति) की ओर ले जाएगा।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे एक बड़ा जंगल जिसमें तीन रास्ते हैं जो अंधेरे और खतरनाक गुफाओं में ले जाते हैं: लालच का रास्ता, बहुत गुस्से वाला रास्ता, और बिना सोचे-समझे सब कुछ चाहने वाला रास्ता। अगर तुम इन तीनों से दूर रहकर सही काम करते हो, जैसे दूसरों की मदद करना या ईमानदारी दिखाना, तो तुम्हें एक बहुत खुशहाल और सुरक्षित जगह मिलती है। कृष्ण कहते हैं कि अगर हम इस तरह के खराब रास्तों से बच जाएं, तो हम सही रास्ते पर चलकर सबसे ऊपर की जीत पा सकते हैं।

दैनिक चिंतन

आप जीवन में कभी न किसी क्रोध, मोह या अज्ञान की बंदी बनने दें; ये तीनों ही आपको अपनी वास्तविक गंतव्य से दूर ले जाते हैं। जब आप इन तीन शत्रुओं को पहचानकर उन्हें हटा देते हैं, तो आपके भीतर एक नई ऊर्जा और स्पष्टता आती है जो आपको सच्चे सुख की ओर ले जाती है। याद रखें कि परमात्मा का मार्ग केवल तभी खुलता है जब आप अपने अंदर के इन घुटने वाले द्वारों को बंद कर देते हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के लिए स्वयं को तीन गहरी खोजें करें कि कौन सी वस्तु आपमें क्रोध, मोह या अज्ञान की जड़ बना रही है। इन तीनों द्वारों से मुक्त होकर अपने भीतर स्थित आत्म-कल्याण का मार्ग अपनाएं और शांति के साथ स्वयं पर विचार करें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. निरंतर स्व-परीक्षा और पहचान
    कल्याण की ओर जाने का प्रथम कदम इन तीन पातकियों (क्रोध, मोह, अज्ञान) को स्पष्ट रूप से पहचना है। यह पृथक्करण तब संभव होता है जब आप अपने मन के अवचेतन भागों में निगरानी रखते हैं और उन्हें स्वीकार करते हैं।
  2. कल्याण का आचरण
    केवल नकारात्मकता को छोड़ना पर्याप्त नहीं है; इसके विपरीत सकारात्मक धर्म और कर्तव्य (dharma) के अनुसार जीवन जीने की आवश्यकता होती है। जब आप इन तीन द्वारों से मुक्त होते हैं, तो स्वयं का सर्वोत्तम पक्ष अपने आप प्रकाशित होता है।
  3. परा गति (परमात्म-लब्धि)
    ये तीनों द्वारों से मुक्त होना ही मोक्ष या 'परा गति' की सीधा रास्ता है, जो आपको संसार के बंधन से अलग कर देता है। यह अवस्था तब आती है जब आप अपने कर्म को स्वार्थ-मुक्त और ईश्वर-समर्पित बना लेते हैं।

विषय

काम, क्रोध और मोह का नाशदैवी आणि असुरी प्रकृति (Divine and Demonic Natures)मोक्ष प्राप्ति के मार्गआत्म-नियंत्रण और श्रेय की चिंताधर्म और कर्म का योगअंधकार से मुक्ति

संबंधित श्लोक

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आगे पढ़ें

  1. 2.63 — यह श्लोक क्रोध और मोह की उत्पत्ति का कारण स्पष्ट करता है, जो इस अध्याय के मूल बिंदु को समझने में मदद करेगा।
  2. 16.24 — इस श्लोक में आचार-विधि और शास्त्र की महत्ता बताई गई है, जो 'आत्मनः श्रेयः' के मार्ग को पूरा करती है।
  3. 18.62 — अंतिम अध्याय का यह श्लोक परा गति (परमात्मा की प्राप्ति) और निरंतर आश्रित होने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमोद्वारास्त्रय क्या हैं और ये क्यों खतरनाक माने जाते हैं?
तमोद्वारास्त्रय का अर्थ है 'अंधकार के तीन द्वार', जो काम (लालच), क्रोध (गुस्सा) और मोह (विषाक्त आसक्ति) को दर्शाते हैं। ये खतरनाक इसलिए माने जाते हैं क्योंकि वे मनुष्य की बुद्धि को धूमिल कर देते हैं, जिससे वह सही-गलत का विवेक खोकर नरकीय गति (अधम जीवन या पश्चाताप) की ओर चला जाता है।
'परा गति' से क्या तात्पर्य है?
"परा गति" का अर्थ है 'सर्वोच्च स्थिति' या मोक्ष, जहाँ आत्मा सभी कर्मों और दुख-सुख के चक्र को पार करके पूर्ण शांति प्राप्त कर लेती है। यह वह लक्ष्य है जिसकी ओर संत और ऋषि मनुष्यों की दिशा करते हैं, जब वे तमोद्वारास्त्रय से मुक्त होकर अपने कल्याण का मार्ग अपनाते हैं।
क्या केवल गीता पढ़ने से हम इन तीनों दोषों से छूट सकते हैं?
केवल ज्ञान प्राप्त करने या श्लोक पढ़ने से यह नहीं होता, बल्कि 'आचरण' (प्रैक्टिस) आवश्यक है। कृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को स्वयं इन दोषों की पहचान करनी होगी और उनसे मुक्त होकर आत्म-शुद्धि के लिए सतत प्रयास करना होगा, जिसके बाद ही वह परम गति प्राप्त करता है।
आज के डिजिटल युग में काम, क्रोध और मोह कैसे बढ़ रहे हैं?
डिजिटल दुनिया में अत्यधिक उपभोग (काम), सोशल मीडिया पर झूठ या विवाद से गुस्सा (क्रोध) और वस्तुओं/संबंधों की अनंत इच्छाएं (मोह) बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। ये तीनों तत्व अक्सर हमें मानसिक शांति से दूर करके लघु-कालीन सुख में फंसाने का काम करते हैं, जो गीता के अनुसार 'तम' की ओर ले जाते हैं।
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