भगवद्गीता 16.21
Daivasura Sampad Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः | कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ||१६-२१||
trividhaṃ narakasyedaṃ dvāraṃ nāśanamātmanaḥ . kāmaḥ krodhastathā lobhastasmādetattrayaṃ tyajet ||16-21||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि आत्मनाश (आत्मा का विनाश) के तीन मुख्य रास्ते या द्वार हैं: काम, क्रोध और लोभ। ये तीनों गुण मनुष्य को पापों की ओर ले जाकर नरक में डाल देते हैं और बुद्धि को अंधा कर देते हैं। इसलिए कृष्ण सलाह देते हैं कि एक साधक के रूप में इन तीन बुराइयों का तत्काल त्याग करना चाहिए ताकि आत्मिक प्रगति संभव हो सके।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक गीता की 'कर्म योग' (Karma Yoga) और 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) की शिक्षाओं को जोड़ता है, जहाँ कर्तव्यपार में आने वाली बाधाओं के रूप में इन तीन गुणों का उल्लेख किया गया है। यह संख्या सिद्धांत या सांख्य दर्शन पर आधारित है कि ये तीनों बुराइयाँ (काम, क्रोध, लोभ) 'तमोगुण' से उत्पन्न होती हैं और मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाने वाले मार्ग में सबसे बड़ी बाधाएं हैं। यह शिक्षा देती है कि आत्म-संयम और बुद्धि के द्वारा इनका परित्याग ही 'आत्मा का उद्धार' (Atma-nash) से रक्षा करने वाला एकमात्र तरीका है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
भगवद गीता का पंद्रहावां अध्याय 'दैवासुर संपदा विभाग योग' समाप्त हो रहा है, जहाँ कृष्ण ने अर्जुन को देवी और असुर प्रकृतियों में से एक चुनने के लिए कहा था। इस श्लोक 16.21 पर कृष्ण अपनी बात का निष्कर्ष निकालते हुए बता रहे हैं कि 'असुर' (दैत्य) स्वभाव वाले लोग इन तीनों पापों के कारण विनाश की ओर चल पड़ते हैं। युद्धक्षेत्र में अर्जुन अपने संदेह और कृपाण उठाने से डर का सामना कर रहे थे, इसलिए यह श्लोक उन्हें आंतरिक बाधाओं को पहचानकर त्यागने के लिए प्रेरित करता है ताकि वे धर्मयुद्ध (धर्म की लड़ाई) में सफल हो सकें।
आज के जीवन में
मान लीजिए एक नौकरी पर आपका बॉस आपको अन्यायपूर्ण तरीके से डांट रहा है, और गुस्से के मारे आप तुरंत जवाब देने या उसे पदच्युत करने की योजना बना रहे हैं। यहाँ 'क्रोध' एक द्वार खोल सकता है जो आपके करियर को नष्ट कर देगा, जबकि अगर आप उस क्षण में विचार करेंगे तो 'काम' (अपने स्वार्थ के लिए गुस्सा करना) और 'लोभ' (उस पद या पैसा हासिल करने की लालच) भी दब जाएंगे। जीवन में किसी कठिन निर्णय लेते समय, यदि हम इन तीनों भावनाओं को पहचानकर उन्हें तुरंत त्याग देंगे, तो हमारा फैसला अधिक स्पष्ट और न्यायोचित होगा जिससे भविष्य के दुख से बचा जा सके।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जैसे किसी घर की चाबी खोने से या दरवाजे को खुला छोड़ देने से चोर अंदर घुसकर सब कुछ बर्बाद कर सकते हैं, वैसे ही 'काम' (लालच), 'क्रोध' (गुस्सा) और 'लोभ' (अति लोलूपता) हमारे दिल के दरवाजे खोलते हैं जो आत्मनाश लाते हैं। कृष्ण भैया कह रहे हैं कि अगर तुम चिड़चिड़े हो जाओ या बहुत ज्यादा कुछ चाहने लगो, तो यह तुम्हें गलत रास्ते पर ले जाता है। इसलिए हमें इन तीनों बुराइयों से दूर रहना चाहिए ताकि हमारा दिल साफ और खुश रहे।
दैनिक चिंतन
प्यारे मित्र, क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी सबसे बड़ी समस्याएं अक्सर बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपी तीन शक्तियों—काम, क्रोध और लोभ से आती हैं? जब ये तीनों हम पर हावी हो जाते हैं, तो वे हमें स्वयं के लिए ही नहीं, बल्कि हमारी साधना और शांति का मार्ग भ्रष्ट करने वाला त्रासदायी द्वार बन जाते हैं। आज की इस कठिन यात्रा में खुद को समझने का यह अवसर लें कि इन तीनों पापों से मुक्त होकर आप अपने सच्चे आत्म-स्वरूप और दिव्यता को कैसे पुनः प्राप्त कर सकते हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के समय में गहरी सांस लें और अपने मन से पूछें कि 'काम, क्रोध या लोभ' कौन सी तीन शक्तियाँ मुझे प्रभावित कर रही हैं। इन तीनों को आत्मनाश का द्वार मानते हुए, उन्हें पहचानकर उनका त्याग करने की दृढ़ संकल्पना करें और शांति के लिए भगवान Krishna से विनती करें।
मुख्य शिक्षाएँ
- त्रिविध नरक के द्वार का परिचय
भगवान Krishna ने स्पष्ट किया है कि काम (इच्छाओं की अत्यधिक लालसा), क्रोध (असंतुष्टि से उत्पन्न गुस्सा) और लोभ (बेहद आकांक्षा या स्वार्थ) मनुष्य के पाप का मुख्य स्रोत हैं। ये तीनों शक्तियाँ मिलकर हमारे आत्म-ज्ञान को ढक लेती हैं और व्यक्ति को अधर्म की ओर धकेलते हुए नैतिक पतन में डाल देती हैं। - त्याग ही मुक्ति का मार्ग है
इस श्लोक का मुख्य संदेश केवल इन बुराइयों को पहचानना नहीं, बल्कि उन्हें सक्रिय रूप से त्यागने की प्रेरणा देना है। ज्ञानी पुरुष यह समझते हैं कि ये तीन राक्षसी गुण अज्ञान और भव-संसार में फंसने का कारण बनते हैं, इसलिए उनका परित्याग ही आत्मोन्नति के लिए अनिवार्य है। - आत्मनाश से बचाव
ये तीनों शक्तियाँ मनुष्य का नैतिक और आध्यात्मिक नाश ('narakasyedaṃ dvāraṃ nāśanamātmanaḥ') करती हैं, जिससे व्यक्ति अपनी दिव्य प्रकृति को खो देता है। जब तक इनका त्याग नहीं किया जाता, तब तक आत्मा का उद्धार और भक्ति मार्ग पर अग्रसर होना असंभव माना गया है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 16.23 — इस श्लोक के बाद आने वाला यह अंश बताता है कि जो व्यक्ति शास्त्रों की उपेक्षा करके काम, क्रोध और लोभ का अनुसरण करता है, उसका कल्याण नहीं होता।
- 3.41 — यह श्लोक बताता है कि इंद्रियों के मध्यम से इन बुराइयों को कैसे नियंत्रित किया जाए और बुद्धि द्वारा इन्हें जीतने की विधि क्या है।
- 2.63 — इस श्लोक में क्रोध के उत्पन्न होने का प्रक्रियात्मक वर्णन दिया गया है, जो दिखाता है कि कैसे क्रोधात् संप्रजायते भोगा (गुस्से से अज्ञान और पतन) होता है।
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