भगवद्गीता 15.15
Purushottama Yoga · हिन्दी अनुवाद
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च | वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ||१५-१५||
sarvasya cāhaṃ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtirjñānamapohanañca . vedaiśca sarvairahameva vedyo vedāntakṛdvedavideva cāham ||15-15||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि वे ही सभी प्राणियों के हृदय में विराजे हुए हैं। यह श्लोक बताता है कि स्मृति (याद रखने की शक्ति), ज्ञान और भूलने की प्रवृत्ति भी कृष्ण से ही प्राप्त होती है। इसका मुख्य संदेश यह है कि वेदों द्वारा जानी जाने वाली सच्चाई स्वयं ईश्वर हैं, और वेदान्त के रचियेता और उनके ज्ञाता भी वही भगवान हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) और भक्ति योग (Bhakti Yoga) के मिलन का प्रतीक है, जो वेदांत दर्शन की 'अद्वैत' या ईश्वर-समानता पर आधारित है। यह कृष्ण को सर्वव्यापी चेतना और अंतर्यामी स्वरूप (Antaryami) के रूप में पेश करता है, जहाँ सभी साक्षात्कार का स्रोत स्वयं भगवान हैं।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह उपदेश महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया था, जब वे विषाद (उदासी) और संदिग्धता में थे। इस समय तक कृष्ण ने गीता के पहले 14 अध्यायों में आत्मा की अमरता, कर्मयोग और भक्ति का वर्णन किया है। अब कृष्ण 'पुरुषोत्तम योग' (अध्याय १५) में अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को समझा रहे हैं ताकि अर्जुन के संदेह दूर हों और वह युद्ध के लिए तैयार हो सके।
आज के जीवन में
मान लीजिए आपको एक बहुत मुश्किल फैसला लेना है, जैसे करियर बदलना या पुरानी आदत छोड़नी; इस समय अहंकार और भ्रम आपकी बुद्धि को बाधित करते हैं। जब आप कृष्ण में श्रद्धा रखते हुए अपनी हूंद (कर्म) पर ध्यान देते हैं, तो मन से 'अपोहन' या भूलने की प्रवृत्ति दूर हो जाती है और सही ज्ञान स्वतः जागृत होता है। यह विश्वास कि ईश्वर आपके भीतर ही आपकी स्मृति को ठीक कर रहा है, आपको घबराहट से बाहर निकालकर स्पष्ट निर्णय लेने में मदद करता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि तुम्हारे दिमाग में एक बड़ा कंप्यूटर चल रहा है जो तेरी सभी यादों को रखता है, नई चीजें सिखाता है और कभी-कभार कुछ भूल भी जाता है। उस पूरे कंप्यूटर का मालिक और चलाउने वाला ईश्वर (यानी भगवान) हैं, जो तुम्हारे दिल के अंदर बैठकर सब देख रहे हैं। जैसे एक स्किल में गेम खेले बिना नहीं चल सकता, वैसे ही हमारा दिमाग भी उनसे मिली शक्ति से काम करता है।
दैनिक चिंतन
आज आप जब भी किसी पुरानी याद पर मुस्कुराते हों या नया कुछ सीखने की तलाश में हों, तो यह समझें कि वह क्षमता आपको स्वयं नहीं मिली है बल्कि आपके भीतर बैठे उस दिव्य सत्ता से प्राप्त हुई है। जब आप किसी अज्ञान के कारण उलझे होते हैं या भूल जाते हैं, तो ध्यान रखें कि वह 'अपोहन' (भूलापन) भी वही एक नियम है जो आपको फिर से ज्ञान की ओर ले जाने का संकेत देता है। आपकी पूरा अस्तित्व इसी दिव्य उपस्थिति के चारों ओर घूम रहा है, इसलिए अपने भीतर शांति और स्पष्टता ढूंढने के लिए बाहर न जाएं, बल्कि अपनी आंतरिक अनुभूति को गहरा करें।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपनी आत्मा की गहराई में बैठकर यह कल्पना करें कि ईश्वर आपके हृदय के सबसे कोने-कोने में स्थित हैं। अपने विचारों, स्मृतियों और ज्ञान के प्रवाह को देखें और अनुभव करें कि ये सभी उनके ही संपर्क से उत्पन्न हो रहे हैं।
मुख्य शिक्षाएँ
- ईश्वर का हृदय में निवास
कृष्ण कहते हैं कि वे समस्त प्राणियों के भीतर, विशेष रूप से उनके हृदय केंद्र में स्थित हैं। यह दर्शाता है कि ईश्वर बाहर नहीं बल्कि हमारे सबसे आंतरिक अहं का स्रोत और गवाह हैं। - ज्ञान, स्मृति और भूलने की शक्ति
स्मरण (Smriti), ज्ञान (Jnana) और उसका अभाव या अपोहन (Apohana) का स्रोत केवल ईश्वर हैं। यह बताता है कि हमारी बुद्धि, स्मृतियां और भूलने की क्षमता भी परमात्मा की ही क्रियाएँ हैं जो हमें आगे बढ़ने में मदद करती हैं। - वेदों का अंतलक्ष्य
सभी वेद और उनके निष्कर्ष (Vedanta) केवल ईश्वर को जानने के लिए ही प्रकट किए गए हैं, क्योंकि वही एकमात्र सत्य है। कृष्ण स्वयं वेदान्त की रचना करने वाले और उस ज्ञान के पूर्ण गवाह हैं, जो सभी शास्त्रों का आधार हैं।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 2.47 — कर्मयोग के मूल सिद्धांत को समझने के लिए, जो इस अध्याय में ईश्वर की उपस्थिति के साथ जुड़ा हुआ है।
- 3.10 — सृष्टि की रचना और देवताओं से कर्म करने के संबंध को समझने के लिए, जो वेदों के उद्देश्य को स्पष्ट करता है।
- 12.8 — मन को ईश्वर पर स्थिर रखने की विधि जानने के लिए, जो हृदय में निवास करने वाले भगवान से सीधा संबंधित है।
अनुशंसित पुस्तकें
GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.