भगवद्गीता 15.13
Purushottama Yoga · हिन्दी अनुवाद
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा | पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ||१५-१३||
gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā . puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ ||15-13||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि ईश्वर ही भूतमात्र के भीतर निवास करके उन्हें संचालित और धारण करते हैं। पृथ्वी में प्रवेश करके वह अपने ऊर्जा से सभी जीवों को जीवन देता है, जबकि चंद्रमा बनकर जल तत्व का रूप लेने से सभी वनस्पतियों और औषधियों को पोषण मिलता है। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि प्रकृति के हर कार्य में ईश्वर की निहित शक्ति ही काम कर रही होती है, न कि स्वयं जीव या पदार्थ।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह उपदेश वेदांत दर्शन, विशेष रूप से 'अद्वैत' (non-dualism) के सिद्धांत पर आधारित है जो ईश्वर को सर्वव्यापी बताता है। यह कर्म योग और ज्ञान योग का संगम है, जो स्पष्ट करता है कि प्रकृति में होने वाले सभी कार्यों का वास्तविक आधारी (supporter) केवल ब्रह्मान या परमात्मा हैं। इससे 'कर्तृत्व' की भावना कम होकर 'अंश-भाव' और भक्ति विकसित होती है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में होता है, जहाँ पांडवों का नेतृत्व करने वाले अर्जुन अपने वंशजों को मारने से डरकर हथियार गिरा चुके हैं। भगवान श्री कृष्ण उस समय धनुष की तान के साथ खड़े होकर, अर्जुन के मोह और निराशा को दूर करने के लिए ज्ञान का उपदेश दे रहे थे। इससे ठीक पहले उन्होंने 'द्वैत' (दोहरापन) और आत्मा-शरीर भेव की बात बताई थी, अब वे प्रकृति में ईश्वर की व्याप्ति दिखाकर अर्जुन को विश्वास दिला रहे हैं कि सब कुछ उनके नियंत्रण में है।
आज के जीवन में
आज के तनावपूर्ण कार्यक्षेत्र में जब आपको लगता है कि आप एकल संघर्ष कर रहे हैं, तो इस श्लोक का अनुसरण करें और समझें कि आपके भीतर की प्रेरणा (ओज) ईश्वर से ही आ रही है। यदि आप किसी कठिन निर्णय या परिवारिक समस्या में फंसे हुए हैं, तो यह ध्यान रखना चाहिए जैसे चंद्रमा बिना मेहनत किए पौधों को पोषित करता है, वैसे ही विश्वास के साथ प्रकृति के नियम पर भरोसा करें। इस दृष्टि से आप अपने कर्म में लगे रहेंगे और परिणाम की चिंता मुक्त होकर शांत मन का निर्माण होगा।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
बच्चों, क्या आपने कभी सोचा है कि पेड़-पौधे और हम सब कैसे रहते हैं? श्री कृष्ण कहते हैं जैसे सूरज की रोशनी बिना किसी के बताए ही पृथ्वी पर आती है और सभी चीज़ें जला देता है, वैसे ही ईश्वर भी धरती में छिपकर सबको हिला-डुलाला रखते हैं। वे चाँद बनकर रात में चमकते हैं ताकि सारे पौधों को पीने के लिए पानी मिले और वो बढ़ सकें। यानी, हमारी हर सांस लेना और खाना खाना ईश्वर की दया से ही संभव है।
दैनिक चिंतन
क्या कभी आपको ऐसा लगा है कि आपके भीतर कोई अदृश्य शक्ति कार्य कर रही है? आज इस सत्य को स्वीकार करें कि वही भगवान आपकी सांसों में और पानी की बूंदों में निवास करते हैं। जब आप प्रकृति के किसी छोटे से हिस्से, जैसे एक पेड़ या फूल को देखते हैं, तो समझें कि वह सब उनके ओज (जीवन शक्ति) का ही विस्तार है। इस दृष्टि से अपने अहंकार को कम करें और यह अनुभव करें कि आप उस सतत पोषण के साक्षी मात्र हैं।
आज के लिए एक अभ्यास
आँखें बंद करें और कल्पना करें कि आपका प्रत्येक कोशिका उसी अदृश्य ऊर्जा से जीवित है जो पृथ्वी के भीतर निवास करती है। स्वयं को सूर्य की गर्माहट, चंद्रमा का शीतलता और वनस्पति में फैले जीवन रस के रूप में महसूस करें कि आप उस परम आत्म-आराम से घिरे हुए हैं जो सभी प्राणियों को धारण करता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- विश्व में निवास करने वाला परम आत्म-सत्ता
भगवान शरीर या वस्तुओं से अलग नहीं, बल्कि प्रकृति के भीतर ही रहकर उसे संचालित करते हैं। यह समझना आवश्यक है कि ईश्वर बाहर नहीं, बल्कि हमारे और सभी भूतों की आंतरिक धारणा में विद्यमान हैं। - समस्त प्राणियों का पोषक
चंद्रमा बनकर 'रसात्मक' होना यह दर्शाता है कि ईश्वर सभी वनस्पतियों और जीवों को जीवन देने वाले रस के रूप में कार्य करते हैं। अर्थात्, प्रकृति का हर तत्व उनके द्वारा संचालित होता है और उनसे ही पोषण पाता है। - अहंकार त्याग कर परम शक्ति को पहचानना
जब हम देखते हैं कि सब कुछ भगवान के ओज से चल रहा है, तो व्यक्तिगत 'करने' का भाव (कर्म) कम हो जाता है। यह ज्ञान हमें ईश्वर की असीम शक्ति में समर्पण और शांति प्रदान करता है।
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