भगवद्गीता 14.27
Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च | शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ||१४-२७||
brahmaṇo hi pratiṣṭhāhamamṛtasyāvyayasya ca . śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca ||14-27||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे स्वयं ब्रह्म, शाश्वत धर्म और पारमार्थिक सुख की आधारशिला (प्रतिष्ठा) हैं। यह श्लोक समझाता है कि निरंतर और अव्यय आत्मा का स्रोत कृष्ण के स्वरूप में ही निहित है, जो अमृत जैसा शुद्ध और शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट धर्म की गारंटी देता है। इसका मुख्य शिक्षा यह है कि ईश्वर न तो सिर्फ एक रक्षक हैं बल्कि वे सत्य के सबसे मजबूत आधार भी हैं जिस पर हमारा आध्यात्मिक जीवन टिका है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक वेदांत के 'अद्वैत' और कृष्ण की 'ईश्वरत्व' (भगवत्स्वरूप) का संयोग करता है जो ज्ञान योग और भक्ति योग दोनों को एक साथ प्रस्तुत करता है। यह दर्शन बताता है कि ब्रह्म (परमात्मा) केवल एक निराकार तत्व नहीं, बल्कि सृष्टि की स्थापना का आधार भी हैं जिसमें 'अव्यय' और 'शाश्वत धर्म' निहित हैं। यह भगवान कृष्ण को ही अंतिम वास्तविकता (Brahman) के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ से सारा सुख प्रवाहित होता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में स्थित है, जहाँ पांडवों का सेनापति अर्जुन अपने ही रिश्तेदारों को मारने की मानसिक त्रासदी और दुविधा में था। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के पहले 13 अध्यायों में कर्म, ज्ञान और गुणों का विस्तृत विश्लेषण किया है और अब अर्जुन को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जा रहे हैं। इस समय अर्जुन अपनी भ्रम से मुक्त होकर ईश्वरीय स्वरूप के प्रति श्रद्धा प्राप्त कर रहा होता है, इसलिए कृष्ण उसे यह आश्वासन देते हैं कि वे ही सत्य का सर्वोच्च आधार हैं।
आज के जीवन में
जब आप किसी बड़े करियर निर्णय या पारिवारिक संकट के सामने होते हैं और डर लगता है, तो इस श्लोक को स्मरण करें कि आपकी स्थिति अस्थायी नहीं बल्कि आपके आत्म-साक्ष्य में एक ठोस आधार पर टिकी है। यह समझना कि 'धर्म' (नैतिक जीवन) का स्रोत ईश्वर हैं, आपको चिंता के बाजार से ऊपर उठाकर शांत और स्पष्ट विचार लेने की शक्ति देता है। इससे आप किसी भी परिणाम में संतोष पा सकते हैं क्योंकि आप जानते हैं कि असली सुरक्षा (सुख) ईश्वर पर भरोसा करने से मिलती है, न कि बाहरी परिस्थितियों से।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करें जैसे कोई विशाल पेड़ बहुत ऊंचा और ताकतवर हो, तो उसकी जड़ें मिट्टी में कितनी गहरी होती होंगी? भगवान कृष्ण कहते हैं कि वे उन 'जड़ों' की तरह हैं जो हमारे सुख और सच्चाई (धर्म) को स्थिर रखती हैं। जैसे पेड़ बिना जड़ के नहीं टिक सकता, वैसे ही आपका असली खुश रहने वाला आत्म-सुकून भी कृष्ण में ही है। जब आप उन्हें याद करते हैं, तो आपको लगता है कि आप किसी अटूठ आधार पर खड़े हैं जो न कभी गिरता है और न कभी बदलता है।
दैनिक चिंतन
प्यारे मित्र, क्या आप कभी सोचते हैं कि आपको सुख कहाँ मिल सकता है? अक्सर हम बाहरी वस्तुओं या परिस्थितियों में खोज लेते हैं, लेकिन भगवान की यह वाणी कहती है कि सच्चा आधार और शाश्वत आनंद का स्थान स्वयं ईश्वर हैं। जब आप अपने भीतर की उस अमृत शक्ति को पहचानेंगे जो ब्रह्म के समान अव्यय है, तो आपको निश्चित रूप से पारमार्थिक सुख मिलेगा।
आज के लिए एक अभ्यास
आज के लिए, इस बात को ध्यान में रखें कि आपका सत्य और शाश्वत सुख बाहर नहीं बल्कि आपके भीतर ही निहित है। जब भी दुःख या अस्थिरता महसूस हो, तो यह स्मरण करें कि ईश्वर स्वयं उस स्थिर आधार हैं जहाँ से यह अनंत आनंद उगलता है।
मुख्य शिक्षाएँ
- ईश्वर ही सर्वोच्च आधार हैं
इस श्लोक में स्पष्ट है कि ब्रह्म, अमृत और धर्म का प्रतिष्ठा (आधार) स्वयं भगवान श्री कृष्ण हैं। यह बताता है कि सत्य की स्थापना केवल ईश्वर में ही संभव है, न कि किसी अन्य पदार्थ या सिद्धांत में। - अमृत और अव्यय का अर्थ
ईश्वर 'अमृत' हैं क्योंकि वे मृत्यु से परे हैं, और 'अव्यय' हैं क्योंकि वे कभी क्षीण नहीं होते। यह गुण हमें बताते हैं कि आध्यात्मिक सत्य न तो बुरा होता है और न ही किसी समय समाप्त होता है। - पारमार्थिक सुख की प्राप्ति
'एकान्तिक' का अर्थ है वह सुख जो केवल ईश्वर में स्थिर हो और बाहरी परिवर्तनों से प्रभावित न हो। यह श्लोक हमें संकेत देता है कि सच्चा आनंद तभी मिलेगा जब हमारा ध्यान इस शाश्वत आधार पर केंद्रित होगा।
विषय
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आगे पढ़ें
- 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग और फल के त्याग की शिक्षा देता है, जो ईश्वर पर पूर्ण समर्पण से जुड़ा है।
- 3.30 — इसमें ईश्वर को कर्मों का फल अर्पित करने की विधि बताई गई है, जो 14वीं अध्याय के 'ब्रह्म' से सीधे संबंधित है।
- 12.15 — भक्ति योग का यह श्लोक ईश्वर की स्वरूप को समझने और उनके प्रति प्रेम व्यक्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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