भगवद्गीता 14.15
Gunatraya Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते | तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ||१४-१५||
rajasi pralayaṃ gatvā karmasaṅgiṣu jāyate . tathā pralīnastamasi mūḍhayoniṣu jāyate ||14-15||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मृत्यु के समय किसी व्यक्ति का मन किस गुण (राजस या तमस) में प्रबल होता है, वही उसके आगे के जन्म की दिशा निर्धारित करता है। यदि कोई राजोगुण के अतिरेक से कर्मों में बंधा रहकर मरता है, तो उसे पुनः उसी प्रकार के संघर्ष वाले मानवीय लोक में जन्म मिलता है। वहीं, तमोगुण (अज्ञान और आलस्य) की अवस्था में मृत्यु होने पर व्यक्ति का जन्म अंधेरे योनि या निम्न स्तर की सृष्टि में होता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हर कर्म और विचार का भविष्य के पारदर्शी परिणाम होते हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक संख्यान दर्शन और कर्मयोग के सिद्धांतों पर आधारित है, जो बताते हैं कि 'कर्म' और उसकी प्रेरणा ही पुनर्जन्म का कारण बनती है। यह तत्वज्ञान की गहराई को समझाता है कि आत्मा (आत्म) अजर-अभक्ष्य होती है, लेकिन वह गुणों के बंधनों से मुक्त नहीं होने तक उसी प्रकृति में फंसी रहती है। इसमें 'मूढयोनि' की अवधारणा का उपयोग करके तमोगुण की अनुचित स्थिति को दर्शाया गया है जो ज्ञान और बुद्धि के बिना होती है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत की लड़ाई, कुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई उपदेशों का हिस्सा है, जो 'गुणत्रय विभाग योग' (अध्याय 14) के दौरान आता है। इससे पहले कृष्ण ने प्रलय की अवस्था में तीन गुणों—सत्व, रज और तम—के स्वभाव और उनके परिणामों का विस्तार से वर्णन किया था। अर्जुन वहां युद्ध के बोझ और भ्रम से उदासीन होकर खड़ा है, जबकि कृष्ण उसे यह समझा रहे हैं कि कैसे हमारी आंतरिक प्रकृति (गुण) हमारे भावी जन्मों को नियंत्रित करती है।
आज के जीवन में
आज के कार्यालय में, एक व्यक्ति जो सिर्फ अपने बोनस और पदोन्नति की चिंता (राजोगुण) में जी रहा होता है, उसकी मृत्यु या जीवन का अंत ऐसे विचारों से जुड़ सकता है कि उसे पुनः वही लालच भरी स्थिति मिलेगी। इसके विपरीत, एक व्यक्ति जो अपनी जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करके (तमोगुण) समय बिता रहा हो और कभी भी कुछ सीखने या बदलाव की कोशिश न करे, उसे अज्ञान में डूबना पड़ सकता है। आधुनिक जीवन में यह तथ्य हमें चेतावनी देता है कि यदि आप अपने काम के प्रति असंतुष्ट और लालची हैं, तो आपको अपनी सोच बदलने की आवश्यकता होगी ताकि अगला जन्म (या भविष्य) बेहतर हो।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
जब आप सोते हैं, तो आपके सपने बता देते हैं कि अगले दिन आपको क्या करना चाहिए; ठीक वैसे ही, जब हमारी मृत्यु होती है, तो हमारे मन में कौन सी भावना सबसे ज्यादा होती थी, वह तय करती है कि हमें कहाँ जन्म लेना होगा। अगर कोई व्यक्ति बहुत लालची या घबराया हुआ (जैसे भीग गया कुत्ता) होकर मरता है, तो उसे फिर से ऐसे ही संघर्ष भरे जीवन में पैदा किया जाता है ताकि वह सीख सके। लेकिन जो लोग अंधेरे कमरे में सोए रहते हैं और कुछ नहीं करना चाहते (तमोगुण), उन्हें नई शुरुआत करने के लिए थोड़ा कठिन या छोटा जन्म मिल सकता है।
दैनिक चिंतन
देखो, जब तुम्हारा दिन कर्मों के लिए व्यस्त और तनावपूर्ण होता है, तो वह रजोगुण का प्रभाव है जो तुम्हें पुनः जन्म लेने पर मजबूर करता है। यदि तुम मोह में फंसकर अज्ञान की ओर बढ़ते हो, तो यह तमोगुण है जो तुम्हारी आत्मा को गहराई में खींचता है। लेकिन याद रखो कि ये केवल गुण हैं, न कि तुम्हरी सच्ची पहचान; इनसे मुक्त होकर ही तुम निरंतर शांति पा सकते हो।
आज के लिए एक अभ्यास
आज अपने कर्मों के पीछे लगे आसक्ति और मोह को देखें। यदि आपका मन कार्य में ही बंधा हुआ है, तो जानिए कि यह राजोगुण का प्रभाव है; इसे छोड़कर शांत चित्त से ईश्वर की ओर ध्यान लगाएं।
मुख्य शिक्षाएँ
- कर्मसंगि की प्रवृत्ति
जब मनुष्य कर्मों में अत्यधिक आसक्त होता है, तो वह राजोगुण के अधीन हो जाता है और उसकी पुष्टि होती रहती है। यह अवस्था व्यक्ति को हमेशा कुछ न कुछ करने की लालसा से जकड़ लेती है। - मूढ़योनि का परिणाम
तमोगुण के प्रभाव में मरने वाले व्यक्तियों को अज्ञान और मोहपूर्ण योनियों (जन्मों) में पुनर्जन्म मिलता है। यह अवस्था बुद्धि की घटती हुई स्थिति का परिणाम होती है जो उन्हें सत्य से दूर ले जाती है। - गुणातीत होने का मार्ग
श्री कृष्ण बताते हैं कि गुरुओं के दोषों और तमोगुण के बंधनों को पार करना संभव नहीं है यदि हम इन गुणों से बाध्य हों। इससे स्पष्ट होता है कि साधक को इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर ईश्वर में लीन होना आवश्यक है।
विषय
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आगे पढ़ें
- 2.47 — यह वर्ग कर्मयोग के मूल सिद्धांत को समझता है और बताता है कि फल की चिंता किए बिना कैसे कार्य करना चाहिए।
- 3.28 — इस श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि गुणों केवल प्रकृति को ही गति देते हैं, न कि आत्मा को; यह समझना महत्वपूर्ण है।
- 14.26 — यह श्लोक बताता है कि गुणों के बाहर निकलकर भक्ति मार्ग पर चलने से कैसे निरंतर शांति और मोक्ष प्राप्त होता है।
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