भगवद्गीता 13.17
Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ||१३-१७||
avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam . bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca ||13-17||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को ब्रह्म (परमात्मा) की प्रकृति समझा रहे हैं। वे बताते हैं कि वह एक है और सभी जीवों के भीतर समाया हुआ है, फिर भी उसे कोई विभाजन या बाधा नहीं लगती, जैसे सूर्य का जल में प्रतिबिंब अलग-अलग दिखाई देता है लेकिन सूर्य स्वयं टूटा नहीं होता। कृष्ण कहते हैं कि यह ब्रह्म ही सभी भूतों को पालने (भर्ता), नष्ट करने (ग्रसिष्णु) और उत्पन्न करने (प्रभविष्णु) वाला है, जिसे जानना आवश्यक है।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह उपदेश वेदांत दर्शन की 'अद्वैत' (Non-dualism) परंपरा का एक केंद्रबिंदु है जो सत्-चित्-आनंद स्वरूप ब्रह्म को समझाता है। यह श्लोक ज्ञान योग और सांख्य दर्शन के तत्वों को मिलाकर 'सगुण' (विशेष गुणों वाले) भगवान की व्याख्या करता है जो निरंतर सृष्टि, स्थिति और लय चक्र में कार्य कर रहे हैं। यह सिद्धांत बताता है कि परमात्मा न तो विभाजित होता है और न ही विकृत होता है, बल्कि वह सभी प्राणियों के भीतर एक समान रूप से वर्तमान रहते हुए उनके कर्मों का फलदाता बनकर कार्य करता है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जो भीषण संघर्ष की स्थिति में थे और अपने ही भाई-बन्धुओं से लड़ने का भारी मानसिक द्वंद्व महसूस कर रहे थे। कृष्ण ने पहले 'क्षेत्र' (शरीर) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/परमपुरुष) के भेद की व्याख्या शुरू की है, जहाँ वे अर्जुन को यह समझाते हैं कि आत्मिक सत्य शारीरिक विनाश से प्रभावित नहीं होता। इस संदर्भ में कृष्ण अर्जुन के मन से 'मैं' और 'मेरा' का भाव हटाकर उन्हें ब्रह्मांडीय नियंत्रक (प्रभव-ग्रसिष्णु) की अवस्था को समझा रहे हैं ताकि वे युद्ध में अपनी कर्तव्यस्थिति पर अडिग रह सकें।
आज के जीवन में
मान लो आप एक बड़ी कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर हैं और टीम में बहुत से लोग काम कर रहे हैं, जिससे आपको चयन करने या निर्णय लेने की जिम्मेदारी है; कभी-कभी यह महसूस होता है कि सब कुछ आपके हाथों पर टूट गया है। इस श्लोक का पाठ आपको सिखाता है कि आपका कार्य (कर्तव्य) निष्ठा के साथ करें, लेकिन परिणामों को लेकर घबराएं नहीं क्योंकि अंत में हर चीज़ एक बड़ी योजना (परमात्मा की इच्छा) का हिस्सा होती है। जब आप समझ लेते हैं कि आप सभी प्रक्रियाओं और लोगों के बीच एक साक्षी भावना रखने वाले शक्तिशाली स्रोत से जुड़े हैं, तो तनाव कम होता है और निर्णय स्पष्ट आते हैं।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो कि एक बड़ा सूरज आकाश में चमक रहा है और उसके प्रकाश के कितने भी टुकड़े पानी की लहरों या झरनों पर दिख रहे हैं, तो क्या वह सूरज टूट गया? नहीं न! उसी तरह भगवान सबके दिलों (जीवों) में रहते हैं लेकिन वे अलग-अलग भागों में बंटकर कमजोर नहीं होते। जैसे एक मम्मी कई बच्चों को प्यार करती है, खाना खिलाती है और खेलने के लिए तैयार रखती है, वैसे ही भगवान सबको पालते हैं (भर्ता), समय आने पर उनका काम पूरा होने पर उन्हें अपने पास बुला लेते हैं (ग्रसिष्णु) और नए जन्म देते हैं।
दैनिक चिंतन
क्या कभी आपको ऐसा लगा है कि दुनिया के भार और विभाजित होने की भावना ने आपके भीतर एक अखंड शांति को ढंक दिया है? आज इस श्लोक का स्मरण करें कि आपकी आत्मा न तो टूटती है, न ही किसी में फंसती है; वह सबके बीच स्थित हैं और फिर भी पूरी तरह स्वतंत्र रहते हुए सभी की रक्षा कर रही है। जब आप कर्म करते समय यह समझेंगे कि आप भर्ता (धारण करने वाले) नहीं बल्कि उस संहारकर्ता के साथ जुड़े हुए हैं, तो आपके मन का भार हल्का हो जाएगा और प्रेम में विस्तार होगा।
आज के लिए एक अभ्यास
आपकी आत्मा को उस एक अदृश्य प्रकाश में स्थिर करें जो सभी जीवों के भीतर समाहित है, परंतु उनसे कभी नहीं टूटता। अपनी दृष्टि से शरीर की सीमाओं को हटाकर अनुभव करें कि आप वह 'अविभक्त' चेतना हैं जो सब कुछ देख रही है लेकिन स्वयं किसी चीज़ में बंधी हुई नहीं है।
मुख्य शिक्षाएँ
- अविभक्त चेतना की स्थिति
ईश्वर या ब्रह्म सभी जीवों के भीतर हैं, लेकिन जैसे सूर्य का प्रकाश अनेक कंटकों में बिखरा होता है फिर भी एक रहता है। यह सिद्धांत बताता है कि आत्मा और परमात्मा की स्वभावतः कोई विभाजन नहीं है, भले ही हम शरीरों के माध्यम से उन्हें पृथक समझें। - संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता
यह ज्ञेय तत्व न केवल भूतों को पोषित करता है, बल्कि उनका सृजन (उत्पत्ति) भी वह ही करता है और समाप्ति (संहार/ग्रसन) का कार्यकर्ता भी वही है। यह दर्शाता है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक की पूरी प्रक्रिया उसी एक शक्ति के हाथ में संतुलित है। - ज्ञेय ब्रह्म का स्वरूप
इस भगवान को 'जिसे जानना चाहिए' (ज्ञेय) कहा गया है, क्योंकि उसे पहचानने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह ज्ञान न केवल बुद्धि द्वारा नहीं बल्कि अनुभव और श्रृंखला में गहराई से प्राप्त किया जाता है ताकि व्यक्ति अपनी वास्तविकता को समझ सके।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 13.24 — यह श्लोक सीधे इस विषय को आगे बढ़ाता है कि कैसे दृष्टिकोण बदलने से मृत्यु और जन्म की चिंता समाप्त हो जाती है।
- 13.32 — इसमें 'परमाणु' के रूप में स्थित होने का वर्णन है जो 13:17 की अवधारणा कि वह अविभक्त रहते हुए सबके भीतर कैसे काम करता है, को और स्पष्ट करता है।
- 2.47 — यह पूर्व अध्याय का एक प्रसिद्ध श्लोक है जो कर्मयोग के सिद्धांत से जुड़ता है कि परिणाम की चिंता किए बिना कार्य करना चाहिए, जबकि हमारा मूल स्वरूप अविभाज्य रहता है।
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