भगवद्गीता 13.14
Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga · हिन्दी अनुवाद
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् | सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||१३-१४||
sarvataḥ pāṇipādaṃ tatsarvato.akṣiśiromukham . sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati ||13-14||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि परमात्मा (ब्रह्म) सर्वव्यापी है और उसका कोई निश्चित रूप नहीं है। वह सारे संसार में हाथ, पैर, आँखें, मुख और कान रखने वाला प्रतीत होता है क्योंकि वह हर जगह व्याप्त करके स्थित है। यह श्लोक सिखाता है कि ईश्वर सर्वव्यापी है जो सभी जीवों के भीतर और चारों ओर मौजूद हैं लेकिन कोई निश्चित आकार नहीं रखते।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह उपदेश वेदांत की दृष्टिगत सिद्धांतों, विशेष रूप से 'अद्वैत' (non-dualism) और सत्य के स्वरूप को विकसित करता है जो ज्ञान योग का हिस्सा है। यह दर्शाता है कि ईश्वर निराकार (Nirguna Brahman) हैं लेकिन साकार रूप में भी सर्वव्यापी प्रतीत होते हैं, जिससे जीवात्मा और परमात्मा के बीच की सीमा मिट जाती है।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर आया था जहाँ पांडवों की सेना को भीष्म पितामह द्वारा घेर लिया गया था। अर्जुन ने कृपण भाव और नैतिक संघर्ष में अपना धनुष फेंक दिया था, तब श्री कृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश देना शुरू किया था। इस समय तक भगवान ने 'क्षेत्र' (शरीर) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/ईश्वर) के अंतर की व्याख्या करना शुरू कर दिया है।
आज के जीवन में
जब आप ऑफिस में किसी बड़े निर्णय को लेकर घबराए हुए हों या पारिवारिक तनाव का सामना करें, तो यह श्लोक आपको याद दिलाता है कि ईश्वर की सहायता हर जगह उपलब्ध है। चूँकि वे सभी दिशाओं में हाथ-पैर और आँखों के रूप में विद्यमान हैं, इसलिए आप कहीं भी अकेले नहीं हैं और उन्हें प्रार्थना कर सकते हैं कि वह आपके निर्णय को देख रहा है। यह ज्ञान आपको नकारात्मकता से हटकर स्थिरचित्त बनने और भरोसे पर आधारित कार्य करने में मदद करता है।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
बेटा, कल्पना करो जैसे सूरज की रोशनी एक ही समय में हर कोने में होती है और हमें देखती रहती है, वैसे ही भगवान सबके भीतर हैं। उनकी कोई निश्चित शक्ल नहीं है बल्कि वे सभी जगह हाथ-पैर, आँखों और कान के रूप में महसूस किए जा सकते हैं। यह इस बात का संकेत है कि वह हमें हर समय देख रहा है और सब कुछ जानता है।
दैनिक चिंतन
आज जब भी आपको किसी काम को करने की इच्छा हो, याद रखें कि वही शक्ति आपके हाथों में कार्य कर रही है, न कि केवल आपका व्यक्तिगत 'मैं'। यह विचार बदल देगा कि आप जगत् से कैसे जुड़ते हैं; अब आप अकेला नहीं बल्कि उस सत्य का एक व्यंग्य बन जाएँगे जो सब कुछ व्याप्त किए हुए है। जब आप दूसरों को देखें, तो उन्हें अपनी ही छवि में पाएं क्योंकि वह सर्वव्यापी प्रभु वही सभी ओर स्थित है।
आज के लिए एक अभ्यास
अपनी आँखों को बंद करें और कल्पना करें कि ईश्वर का रूप आपके शरीर के हर अंग से, यथा हाथ-पाँव, नेत्र और कान, विस्तारित होकर संपूर्ण जगत् में फैला हुआ है। इस ध्यान में महसूस करें कि आप स्वयं नहीं बल्कि वह सर्वव्यापी चेतना हैं जो सभी ओर से देख रही है और सुन रही है।
मुख्य शिक्षाएँ
- सर्वव्यापकता का सत्य (Omnipresence)
ईश्वर न तो किसी एक स्थान पर सीमित हैं, बल्कि वे हर दिशा में हाथ-पाँव और नेत्रों के रूप में उपस्थित हैं। यह सिद्धांत बताता है कि भगवान का स्वरूप निर्दिष्ट अंगों से मुक्त होकर भी सब कुछ घेरे हुए स्थिर रहते हैं। - क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की एकता (Unity of Field and Knower)
यह श्लोक 'क्षेत्र' (शरीर/जगत्) के भीतर उस 'क्षेत्रज्ञ' को दर्शाता है जो सब कुछ देख रहा है लेकिन स्वयं किसी चीज़ में बंधा नहीं होता। यह समझना कि परमात्मा और सृष्टि अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि वे एक ही चेतना के दो पहलू हैं। - सर्वत्र उपस्थित श्रोता (The All-Hearing)
'sarvataḥ śrutimat' का अर्थ है कि ईश्वर हर ओर से सुन रहे हैं और उनकी दृष्टि संपूर्ण जगत् पर स्थिर है। यह भक्तों को आश्वासन देता है कि उनका प्रार्थना या संकल्प कहीं भी छुपा नहीं सकता क्योंकि वह सर्वत्र व्याप्त हैं।
विषय
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आगे पढ़ें
- 13.2 — इस श्लोक से पहले यह जानना आवश्यक है कि 'क्षेत्र' (शरीर/जगत्) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/ईश्वर) में क्या अंतर है।
- 13.7 — यह श्लोक बताता है कि कैसे ज्ञान के द्वारा हम इस सर्वव्यापक सत्य को पहचान सकते हैं और मोक्ष की ओर बढ़ते हैं।
- 9.4 — इसमें कृष्ण कहते हैं कि वे सभी भूतों में व्याप्त हैं, जो इस श्लोक के विस्तृत वर्णन का सारांश है।
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