भगवद्गीता 12.18

Bhakti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 12.18 — "जो शत्रु और मित्र में तथा मान और अपमान में समान है; जो शीत-उष्ण और सुख-दुःख में समान है; जो आसक्ति स"
भगवद्गीता 12.18 — Bhakti Yoga
संस्कृत

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः | शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ||१२-१८||

लिप्यंतरण

samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāpamānayoḥ . śītoṣṇasukhaduḥkheṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ ||12-18||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि एक आदर्ष्ट भक्त कैसे व्यवहार करता है। इस श्लोक का मुख्य सिद्धांत यह है कि मनुष्य को दुश्मन और मित्र, मान-अपमान तथा सुख-दुःख में बिल्कुल समान भाव रखना चाहिए। इसके अलावा, उसे संसार के किसी वस्तु या व्यक्ति से असंलग्न (बिना लगाव वाले) रहकर शांत मन बनाए रखना होता है। यह आंतरिक स्थिरता ही भक्त की पहचान बनती है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भगavad गीता के 'भक्त योग' का एक अभिन्न अंग है जो 'स्थितिप्रज्ञता' की अवधारणा को विकसित करता है, जहाँ आत्मा (Brahman) और परमात्मा के बीच अनन्त प्रेम में निरंतरता होती है। यह कर्मयोग और ज्ञान योग का संयोजन भी कहला सकता है क्योंकि यह बाह्य परिस्थितियों से अलग होकर (विविजक), आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। यहाँ 'समत्व' (Samatva) ही भक्ति का सबसे उच्च स्तर माना गया है, जहाँ सभी द्वंद्वों को पार करके ईश्वरीय चेतना में विलीन हो जाना होता है।

शब्दार्थ
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यह कहाँ घटित होता है

यह संवाद महाभारत युद्ध के मैदान में कुरुक्षेत्र पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का एक हिस्सा है, जहाँ पांडव और कौरव अपने-अपने पक्ष के लिए तैयारी कर रहे हैं। इस समय तक अर्जुन ने धर्म युद्ध से इनकार किया था (वीर संशय), और अब भगवान उन्हें 'भक्त योग' का वर्णन दे रहे हैं कि आदर्ष्ट भजन किस प्रकार की होती है। कुरुक्षेत्र के उस उच्च तनावपूर्ण वातावरण में, जहाँ जीवन-मरण का सवाल खड़ा था, अर्जुन को यह शिक्षा दी जा रही थी कि कैसे मन को स्थिर रखा जाए ताकि वह अपने धर्म को निभाने से न घबराए।

आज के जीवन में

आधुनिक कार्यस्थल पर जब आपका सहकर्मी आपके काम की सराहना करता है और दूसरा उसे आलोचना, तो एक स्थिर व्यक्ति दोनों के प्रति समान प्रतिक्रिया देता है; न वह अहंकार में लोट-पोट होता है और न ही निराश होकर गिर जाता है। जब किसी घरेलू झगड़े या स्वास्थ्य समस्या (दुःख) का सामना करना पड़ता है, तो आप इस सिद्धांत के अनुसार चिंता किए बिना स्थिति को स्वीकार करके उसका समाधान खोजते हैं। यह दृष्टिकोण आपको मानसिक शांति देता है ताकि आप किसी भी परिस्थिति में निर्णय लेने की क्षमता बनाए रख सकें और दूसरों से अत्यधिक लगाव (attachment) के कारण व्यथित न हों।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो कि तुम एक बहुत पुरानी, मजबूत दीवार हो जो बारिश और धूप दोनों में बिल्कुल नहीं बदलती। जब कोई तुम्हें गाली देता है या तारीफ करता है, तो भी तुम वैसे ही खड़े रहते हो; न खुश होते हो, न गुस्से में आते हो। जैसे एक पत्थर का फूलना या सूख जाना नहीं होता, वैसे ही एक अच्छा इंसान दुश्मन और दोस्त के बीच बराबर व्यवहार करता है। यह ताकतवर बनने की सबसे असली शक्ति है।

दैनिक चिंतन

क्या आपने कभी सोचा है कि वास्तविक शांति बाहरी परिस्थितियों के बदलने पर नहीं, बल्कि आपके भीतर 'समता' (सात्विक समभाव) की अनुभूति में निहित है? जब कोई आपको अपमान करे या प्रशंसा दे, तो क्या आपका हृदय उसी तरह धड़कता रह सकता है जैसे गहरा जल बिना किसी लहर के बहता है। भगवान श्री कृष्ण ने हमें सिखाया है कि संन्यास और सन्निवेश (योग) तभी पूर्ण होता है जब आप 'सांग' या लगाव से मुक्त होकर प्रत्येक अनुभव को एक जैसी दृष्टि से देखते हैं। आज के दिन, यदि कोई आपको परेशान करे तो उसे अपने कर्म के फल के रूप में स्वीकार करें और अपनी आंतरिक शमता (शीतोष्ण) का अभ्यास जारी रखें।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के इस क्षण में अपनी श्वसं को गहरा और स्थिर करें, जब भी कोई प्रतिकूल परिस्थिति या सत्कार (प्रेम) आपको बाधित करता है। स्वयं से पूछें कि क्या मैं 'शत्रु' और 'मित्र', तथा सुख-दुःख के विषय में बराबर भाव रख सकता हूँ? इस स्थिरता को अपने मन की एक पहाड़ जैसी अडिग सतह बनने दें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. शत्रु-मित्र की समभाव बुद्धि
    यह उपदेश हमें सिखाता है कि सच्चा साधक न तो मित्र के प्रति अत्यधिक आसक्ति रखता है और न ही शत्रु के प्रति द्वेष। बाहरी संबंधों में बदलाव आए, लेकिन हृदय का संतुलन कभी नहीं टूटना चाहिए क्योंकि दैवी प्रेम सभी को समान रूप से देखता है।
  2. सुख-दुःख के प्रति उदासीनता
    प्राकृतिक दुनिया में सुख और दुःख दोनों अनिवार्य हैं, लेकिन एक साधक को इनका अनुभव करते हुए भी अपने आत्म-स्वरूप से जुड़ा रहना चाहिए। यह 'सम' भाव न तो निष्क्रियता है बल्कि उस गहरे ज्ञान का परिणाम है कि सुख और दुःख दोनों अस्थायी हैं, जबकि चेतना स्थिर है।
  3. संग-वरजित जीवन (बिना लगाव के)
    'सांग-वरजित' होने का अर्थ है कि व्यक्ति कर्म करता रहता है लेकिन किसी विशेष परिणाम या वस्तु से आत्म-परिवर्तन की अपेक्षा नहीं रखता। यह मुक्ति का मार्ग है जहाँ आप अपने हर कार्य को ईश्वर के लिए समर्पित कर देते हैं, जिससे मन कभी भी बंधनों में फंसता नहीं है।

विषय

समत्व (Equanimity)भक्ति योग (Bhakti Yoga)द्वंदवातीत (Beyond Dualities)असंलग्नता (Detachment)स्थिर बुद्धि (Steady Intellect)मान-अपमान का परित्याग

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आगे पढ़ें

  1. 2.14 — इस श्लोक में 'शीतोष्ण' (ठंड और गर्मी) की समभाव के लिए संदर्भ दिया गया है, जो इसे आगे पढ़ने का एकदम सही आधार बनाता है।
  2. 12.13 — यह श्लोक 'असूया' (ईर्ष्या) और सभी भुतों के प्रति दयाभाव की बात करता है, जो शत्रु-मित्र समता से सीधे जुड़ा हुआ है।
  3. 12.17 — यह आगे चलकर 'संयोग' (लगाव) और 'अनुराग' (प्रेम के बिना भी प्रेम) की अवधारणा को स्पष्ट करता है जो इस श्लोक के अंत में आए 'सांगवरजित' से मेल खाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'असंलग्न' (sanga-vivarjita) होने का क्या अर्थ है?
'असंलग्न' होने का मतलब यह नहीं कि आप दुनिया से कट जाएँ या किसी के प्रति अन्याय करें। इसका तात्पर्य है कि आप अपने मन को किसी वस्तु, व्यक्ति या परिणाम से इतना बांध न लें कि उसे खोने पर तूफ़ान मच जाये। एक स्वस्थ संलग्नता में रहते हुए भी आंतरिक स्तर पर आपको निर्लिप्त और स्वतंत्र होकर कार्य करना चाहिए।
क्या दुश्मन और मित्र के बीच बराबर व्यवहार करना असंभव है?
व्यक्तिगत रूप से यह कठिन लग सकता है, लेकिन गीता का उद्देश्य आपको मानसिक स्तर पर स्थिर रहने की प्रशिक्षण देना है। जब आप अपने आंतरिक 'आत्मा' को पहचान लेते हैं, तो बाहरी दुश्मन या मित्र के रूप भी अस्थायी और सतही लगते हैं। यह दृष्टि आपको नफरत और मोह दोनों से मुक्त करती है, जिससे आप सभी के प्रति उदासीन नहीं बल्कि प्रेमपूर्ण समानता दिखा पाते हैं।
यदि कोई हमें अपमानित (अपमान) करता है तो क्या इसे नजरअंदाज करना चाहिए?
इसका अर्थ यह नहीं कि आपको चुप्पी साध लें या अन्याय को स्वीकार कर लेना चाहिए। इसका तात्पर्य है कि आप अपमान के कारण अपने मन में गुस्सा, घृणा या कमतर महसूस करने की भावना न पालें। स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति तथ्यों पर प्रतिक्रिया देता है और अपनी शांति बनाए रखते हुए उचित कदम उठाता है बिना मन को भड़काये।
क्या यह श्लोक केवल आधुनिक दुनिया में नहीं, बल्कि प्राचीन युद्ध में भी लागू होता है?
हाँ, यद्यपि इसका संदर्भ कुरुक्षेत्र का युद्ध था, लेकिन मनुष्य की मनोदशा और द्वंद्व (सुख-दुःख) हमेशा से रहे हैं। भगवान ने यह सिद्धांत उस समय दिया ताकि अर्जुन जैसे योद्धा भी जीवन के उतार-चढ़ाव में अपनी धर्मशाला न खो सकें। आज की भागदौड़ वाली दुनिया, जहाँ सफलता और विफलता का डर लगा रहता है, यह शिक्षा उससे भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।
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