भगवद्गीता 12.13
Bhakti Yoga · हिन्दी अनुवाद
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च | निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ||१२-१३||
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca . nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ||12-13||
इस श्लोक का अर्थ क्या है?
भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि भक्ति योग में सबसे पसंदीसा भक्त कौन होता है। यह श्लोक उन गुणों का वर्णन करता है जो एक आदमी को ईश्वर प्रेमिक बनाते हैं: सभी प्राणियों से दुश्मनी न रखना, सबका मित्र बनना और करुणावान होना। साथ ही, इसमें 'स्वामित्व' (यह मेरा है) और 'अहंकार' (मेरे में बड़ापन) की पूर्ण कमी का आदेश दिया गया है। अंततः यह समझाया जाता है कि सुख-दु:ख दोनों को एक ही दृष्टि से देखने वाले और क्षमाशील व्यक्ति ही ईश्वर के निकट होते हैं।
इसके पीछे का सिद्धांत
यह श्लोक भगवान कृष्ण द्वारा प्रस्तुत 'भक्ति योग' (The Path of Devotion) का एक मौलिक पहलू है, जो ज्ञान और कर्म के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति को संभव बनाता है। इसमें 'निस्वार्थ भावना' (Nishkama Bhava) और 'सर्वभौतिक समभाव' (Samadrishti) जैसे विचार विकसित होते हैं, जो द्वादशीय भक्ति के लिए आवश्यक मूल्य निर्माण करते हैं कि ईश्वर की उपस्थिति सभी प्राणियों में देखी जानी चाहिए।
शब्दार्थ
पारंपरिक भाष्य
यह कहाँ घटित होता है
यह संवाद महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच चल रहा है, जहाँ पांडवों की सेना ने अपनी ओर देखने वाले द्रोणाचार्य को हराकर भी शिष्टाचार का उल्लंघन किया था। इससे पहले कृष्ण ने 'कर्मा योग' और 'ज्ञान योग' के बारे में विस्तार से बताया है, लेकिन अर्जुन अभी भी अपने परिवारों पर मरने की भयभीत स्थिति में हैं। यह श्लोक तब आता है जब अर्जुन ईश्वर को पसंद करने वाले 'भक्त' के गुण पूछते हैं, और कृष्ण उन्हें बताते हैं कि वैसा व्यक्ति होने से ही मानव प्रकृति का परम उद्देश्य सिद्ध होता है।
आज के जीवन में
मान लीजिए आपके ऑफिस में किसी सहयोगी ने आपका काम खराब कर दिया और बाकी टीम आपको दोष दे रही है; इस स्थिति में 'अद्वेष्टा' (निरिह) गुण का पालन करने के लिए आपको तुरंत क्रोध या प्रतिशोधी भावना को दबाकर उनकी गलती माफ़ करनी होगी। यदि आपके जीवन की आर्थिक स्थिति अचानक बिगड़ गई है और आपकी कंपनी बर्खास्त हो रही है, तो 'समदुःखसुख' (संतुलन) का सिद्धांत आपको यह याद दिलाएगा कि सुख-दु:ख दोनों समय की बात हैं, इसलिए घबराहट में निर्णय न लेने के बजाय शांति से समाधान ढूंढें। इस प्रकार, 'निर्मम' (स्वामित्व रहित) होकर आप अपने काम को निष्कपट रूप से करेंगे और परिणामों की चिंता छोड़ देंगे।
बच्चों के लिए सरल व्याख्या
कल्पना करो जैसे तुम स्कूल में सभी बच्चों का दोस्त हो, चाहे वे कितने भी अलग क्यों न हों; तुम किसी से गुस्सा नहीं करते और उनकी मदद करना पसंद करते हो। अगर कोई तुम्हारा खिलौना तोड़ दे या तुम परेशान करे, तो तुम जल्दी क्रोध में नहीं आते बल्कि मुस्कुराकर उसे माफ़ कर देते हो। भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो लोग ऐसा करते हैं—सबसे प्यार बांटना, अपनी चीजों पर मोह न रखना और हर हालत (खुशी या दु:ख) में शांत रहना—वे सचमुच सबसे अच्छे दोस्त बन जाते हैं।
दैनिक चिंतन
आज जब भी किसी के साथ विवाद या तनाव हो, तो रुककर सोचें कि श्री कृष्ण ने हमसे क्या कहा है—दुश्मन को मित्र समझना और हर प्राणी से करुणा रखना। आप अपने अहंकार को छोड़कर दूसरों की पीड़ा में शामिल होने का अवसर पा रहे हैं, जो आपके भीतर शांति लाएगा। याद रखें कि सुख-दुःख दोनों ही क्षणिक हैं; जब आप इनसे समभाव बनाएंगे तो आंतरिक स्थिरता मिलेगी और आपको सच्चा ममत्व नहीं बल्कि विश्व का कल्याण करने की भावना होगी।
आज के लिए एक अभ्यास
अपने मन में सभी जीवों के प्रति किसी भी प्रकार का द्वेष या नफरत बिल्कुल समाप्त कर दें और उन्हें अपने मित्र समझें। स्वयं को 'मैं' और 'मेरा' की भावना से मुक्त करते हुए, सुख-दुःख दोनों में समभाव बनाए रखने का अभ्यास करें कि आप क्षमाशील हैं।
मुख्य शिक्षाएँ
- सर्वभूतों के प्रति मित्रभाव (Maitri)
यह शिक्षा बताती है कि एक भक्त को सभी जीवों, चाहे वे दोस्त हों या शत्रु, के प्रति पूर्ण मित्रता और प्यार रखना चाहिए। द्वेष का अंत ही सच्ची आध्यात्मिक प्रगति की निशानी है। - निरहंकार और निर्ममत्व (Nirmama & Nirahankara)
जब हम 'मेरा' और 'मैं' का भाव त्याग देते हैं, तो दुनिया के घटनाओं से जुड़ाव कम हो जाता है। यह दृष्टिकोण हमें स्वार्थ मुक्त करके निःस्वार्थ सेवा की ओर ले जाता है। - समत्व और क्षमाशीलता (Samatva & Kshami)
शुभ और अशुभ परिस्थितियों में मन को समतल रखना योग का महत्वपूर्ण लक्षण है। जो व्यक्ति दुःखों के प्रति भी धैर्य से विचार करता है, वही क्षमाशील बनकर भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ता है।
विषय
संबंधित श्लोक
आगे पढ़ें
- 12.14 — यह श्लोक उसी विषय को आगे बढ़ाता है जहाँ कृष्ण समत्व और तपस्वी के गुणों का वर्णन करते हैं, जो इस पाठ से जुड़ा हुआ है।
- 13.7 — यह श्लोक 'ज्ञान' की सूची देता है जिसमें द्वेषरहित होना और समभाव शामिल है, यह दर्शाते हुए कि कैसे भक्ति ज्ञान से जुड़ती है।
- 12.4 — यह श्लोक उन लोगों के लिए आकर्षक है जो कृष्ण की निरंतर स्मरण और समर्पण मार्ग पर चलना चाहते हैं, जो इस अत्यंत ऊँचे भक्ति गुणों का आधार बनाता है।
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