भगवद्गीता 11.7

Vishvarupa Darshana Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 11.7 — "हे गुडाकेश ! आज (अब) इस मेरे शरीर में एक स्थान पर स्थित हुए चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को देखो तथा और "
भगवद्गीता 11.7 — Vishvarupa Darshana Yoga
संस्कृत

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् | मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ||११-७||

लिप्यंतरण

ihaikasthaṃ jagatkṛtsnaṃ paśyādya sacarācaram . mama dehe guḍākeśa yaccānyad draṣṭumicchasi ||11-7||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

श्री कृष्ण अर्जुन को अपने शरीर के भीतर सम्पूर्ण विश्व, जिसमें चलने और न चलने वाले सभी जीव शामिल हैं, देखने का आग्रह कर रहे हैं। यह वचन इस बात की पुष्टि करता है कि ईश्वर संपूर्ण ब्रह्मांड को एक ही स्थान पर समाहित करके प्रकट हो सकते हैं। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे जो भी देखना चाहते हों, वह सब उन्हें दिखा दिया जाएगा।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक ज्ञान योग (Jnana Yoga) और भक्ति योग (Bhakti Yoga) की मूल अवधारणाओं का मिलन है जो 'अद्वैत' या ईश्वर के सर्वव्यापक स्वरूप को दर्शाता है। यह सिद्धांत बताता है कि ब्रह्मांड में सभी जीव और जड़ वस्तुएं परम वात्सल्य (Brahman) का ही एक रूप हैं, जो व्यक्तिगत शरीर के भीतर समाहित हो सकते हैं।

शब्दार्थ
इह in this, एकस्थम् centred in one, जगत् the universe, कृत्स्नम् whole, पश्य behold, अद्य now, सचराचरम् with the moving and the unmoving, मम My, देहे in body, गुडाकेश O Gudakesa, यत् whatever, च and, अन्यत् other, द्रष्टुम् to see, इच्छसि (thou) desirest
पारंपरिक भाष्य
Anyat Other whatever else. Your success or defeat in the war, about which you,have entertained a doubt. (Cf. II.6)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र पर हुआ, जब अर्जुन ने संकटग्रस्त होकर धर्म की बात छोड़ दी थी। श्री कृष्ण ने पहले सांख्य और भक्ति का उपदेश दिया था, लेकिन अब उन्होंने अपने दिव्य रूप (विश्वरूप) के दर्शन करने का निर्णय लिया है। अर्जुन अभी भी विस्फोटित भावनाओं से गुजर रहे हैं, जबकि कृष्ण उन्हें उनके स्वामी होने की वास्तविकता और अपनी सर्वग्राही शक्ति दिखाकर उनकी भ्रम दूर करना चाहते हैं।

आज के जीवन में

जब हम किसी बड़ी समस्या या तनावपूर्ण निर्णय के सामने खड़े होते हैं, तो अक्सर हमें लगता है कि सब कुछ हमारे हाथ से बाहर हो रहा है। इस श्लोक का पाठ यह सिखाता है कि अपने आप को संकट में फंसा हुआ न समझकर विश्वास रखें कि सृष्टि के नियम और ईश्वर की योजना बहुत बड़ी हैं। जैसे कृष्ण ने अर्जुन से कहा 'देखो', हमें भी अपनी दशा को गहराई से देखना चाहिए, न कि डर के कारण भागना चाहिए।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

मित्रो, सोचिए जैसे आप एक छोटे सागर के बीच में खड़े हैं और पूरा समंदर उसी जगह पर दिखता है, वैसे ही भगवान कृष्ण अपने शरीर में सारे ब्रह्मांड को दिखा रहे थे। अर्जुन भी डरे हुए थे, इसलिए कृष्ण ने उन्हें मज़ाकिया तरीके से कहा कि 'अब तुम सब कुछ देखो जो तुम्हें दिखाने के लिए मैंने बनाया है।' यह एक जादू जैसा अनुभव था जिसमें समय और स्थान का कोई भ्रम नहीं था।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, क्या आपने कभी महसूस किया है कि वह जो सब कुछ बाहर दिखाई देता है, असल में आपके भीतर ही विद्यमान है? श्रीकृष्ण आज आपको उसी एक स्थान पर खड़े होने का आह्वान कर रहे हैं जहाँ से पूरा विश्व दिख सकता है। यह दृष्टि बदलती नहीं है कि आप कहीं और जाएं, बल्कि यह आपके भीतर की गहराई को पहचानने के बारे में है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के लिए, इस शरीर को ही विश्व का केंद्र मानकर बैठ जाएं। मन में सोचिए कि यह अत्यंत सूक्ष्म और व्यापक रूप है जिसमें आपका पूरा जगत् एक स्थान पर समाया हुआ है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. एक स्थित का महत्व (स्थिति)
    यह आदेश देता है कि पूर्ण जगत् एक ही केंद्र, यानी इस शरीर या चेतना में समाया हुआ है। अर्जुन को दौड़ने की नहीं बल्कि स्थिर होकर देखने का निर्देश दिया गया है।
  2. चराचर का एकीकरण
    संसार के चेतन (जीव) और अचेतन (निर्जीव तत्व) दोनों इसी एक आत्म-स्वरूप में समाहित हैं। यह सिखाता है कि भेदभाव की भावना को हटाकर सर्वत्र दृष्टि रखनी चाहिए।
  3. असीम देखने का साहस
    भगवान ने अर्जुन से कहा है कि यदि वे और कुछ भी देखना चाहते हैं तो वह भी दिखाया जाएगा, जो ईश्वर की पूर्ण शक्ति को दर्शाता है। यह हमें सीख देती है कि हमारी इच्छाओं के अनुसार ही परम सत्य का अनुभव संभव हो सकता है।

विषय

ईश्वर का विश्व रूपसर्वव्यापकताअर्जुन की भक्ति और श्रद्धादिव्य दृष्टिचराचर जगत्ज्ञान योग

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  1. 10.8 — यह अध्याय में ईश्वर के सभी रूपों का सारांश दिया गया है जो इस 'एक स्थान' की अवधारणा को और गहरा करता है।
  2. 13.2 — प्रकृति (Kshetra) और ज्ञेय (Kshetrajna) के बीच का संबंध समझने के लिए यह श्लोक इस विजुअल दर्शन की व्याख्या करता है।
  3. 18.64 — संपूर्ण ज्ञान और दृष्टि को अंतिम रूप से ग्रहण करने के लिए, जब भगवान सबसे महत्वपूर्ण उपदेश देते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप क्यों दिखाया?
अर्जुन युद्ध के मैदान में भ्रम और करुणा से घिरा हुआ था, इसलिए कृष्ण ने उन्हें अपनी अनंत शक्ति और सर्वव्यापक स्वरूप (विश्वरूप) का दर्शन कराया ताकि वे अपने डर को हरा सकें। यह दृश्य अर्जुन के ज्ञान में परिवर्तन लाने और उसे धर्मयुद्ध करने हेतु प्रेरित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
'सचराचर' शब्द का अर्थ क्या है?
इस श्लोक में 'सचराचर' (sacarācaram) का शाब्दिक अर्थ चलने और न चलने वाले सभी जीवों से है। इसमें वे प्राणी शामिल हैं जो स्वयं चले जाते हैं जैसे पशु-पक्षी, और वह सब कुछ भी जो स्थिर या जड़ होता है जैसे पहाड़, पेड़-पौधे और ग्रह।
क्या हम आज भी अपने शरीर में ईश्वर को देख सकते हैं?
यद्यपि अर्जुन के पास दिव्य दृष्टि (Divya Drishti) थी जो उन्हें यह स्वरूप दिखा सका, लेकिन इसका आध्यात्मिक संदेश यह है कि प्रकृति और जगत में ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करना एक अभ्यास का विषय है। गीता के अनुसार जब हम निष्काम भाव से कार्य करते हैं, तो हम अंततः उस सर्वव्यापक सत्य को अपने भीतर ही देखने लगते हैं।
इस श्लोक में 'गुडाकेश' शब्द का क्या संदर्भ है?
'गुडाकेश' (Gudakesha) अर्जुन की एक उपाधि है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है 'रात भर जागरण करने वाला' या 'सुरक्षा प्रदान करने वाले', जो उनकी योद्धा क्षमता और धैर्य को दर्शाता है। कृष्ण ने इस शीर्षक का उपयोग करके अर्जुन की आंतरिक ताकत और उनके संघर्षशील स्वभाव को याद दिलाया था।
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