भगवद्गीता 10.9

Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 10.9 — "मुझमें ही चित्त को स्थिर करने वाले और मुझमें ही प्राणों (इन्द्रियों) को अर्पित करने वाले भक्तजन, सदै"
भगवद्गीता 10.9 — Vibhuti Yoga
संस्कृत

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् | कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ||१०-९||

लिप्यंतरण

maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam . kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca ||10-9||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जिन भक्तों का मन और प्राण केवल उनमें केंद्रित होते हैं, वे सदा परस्पर एक-दूसरे को मेरा स्मरण कराते रहते हैं। इस प्रकार सामूहिक साधना से वे न केवल पूर्णांतरा (संतुष्ट) होते हैं बल्कि आनंद और रति भी प्राप्त करते हैं। यह श्लोक भक्ति योग की सर्वोच्च स्थिति को दर्शाता है जहाँ स्वयं सेवा में ही परम सुख निहित होता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भक्ति योग (Bhakti Yoga) की मुख्य धारा को प्रस्तुत करता है, जहाँ ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आसक्ति परम सुख का मार्ग बनती है। यह 'कर्मयोग' और 'ज्ञानयोग' का परिणाम भी है क्योंकि जब कर्म और ज्ञान भक्ति में लीन हो जाते हैं, तो वे नित्य संतोष (तुष्टि) और रति (रमणा) प्रदान करते हैं।

शब्दार्थ
मच्चित्ताः with their minds wholly in Me, मद्गतप्राणाः with their life absorbed in Me, बोधयन्तः,enlightening, परस्परम् mutually, कथयन्तः speaking of, च and, माम् Me, नित्यम् always, तुष्यन्ति are satisfied, च and, रमन्ति (they) are delighted, च and
पारंपरिक भाष्य
The characteristics of a devotee who has attained the realisation of oneness are described in this verse. The devotee constantly thinks of the Lord. His very life is absorbed in Him. He has consecrated his whole life to the Lord. According to another interpretation, all his senses (which function because of the Prana), such as the eye are absorbed in Him. He takes immense delight in talking about Him, about His supreme wisdom, power, might and other attributes. He has completely dedicated himself to the Lord. He feels intense satisfaction and is delighted as if he is in the company of his Beloved (God). The Purana says? The sum total of the sensual pleasures of this world and also all the great pleasures of the divine regions (heavens) are not worth a sixteenth part of that bliss which proceeds from the eradication of desires and cravings. (Cf. XII.8)

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत की युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र पर स्थित है, जहाँ अर्जुन संकट और विषाद (विश्राम) के बीच खड़ा था। गीता का अध्याय 10 'विवृति योग' से संबंधित है, जिसमें कृष्ण अपनी दिव्य महिमाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि अर्जुन उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति रख सके। इससे ठीक पहले कृष्ण ने अपने विश्वरूप का दर्शन कराया था, जो अत्यंत डरावना भी हो सकता है; अब वे संवेदना के साथ बता रहे हैं कि कैसे एक प्रेमपूर्ण संबंध (भक्ति) से भक्तजन निरंतर आनंदित रहते हैं।

आज के जीवन में

मान लीजिए आप और आपके परिवार का सदस्य किसी कठिन निर्णय या काम की वजह से तनाव में है; अगर दोनों मिलकर उस समस्या को ईश्वरीय दृष्टिकोण (ईश्वर पर विश्वास) के साथ साझा करें, तो तनाव कम हो जाएगा। आधुनिक जीवन में जहाँ हम अकेलेपन और चिंता का सामना करते हैं, ऐसे दोस्तों या सहयोगियों की जरूरत होती है जो ईमानदारी से धर्म (कर्तव्य) और कृष्ण के विषय में बातें कर सकें। इससे व्यक्ति को न सिर्फ मानसिक शांति मिलती है बल्कि एक सकारात्मक ऊर्जा भी प्राप्त होती है जिसके द्वारा वह अपने कामों में अधिक संतोष पाता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे जब दो या ज्यादा मित्र मिलकर अपने प्यारे विषय (जैसे क्रिकेट या कोई गेम) के बारे में बात करते हैं, तो उनकी खुशी दोगुनी हो जाती है और वे बहुत प्रसन्न महसूस करते हैं। कृष्ण कहते हैं कि अगर हमारा मन और प्राण भगवान की सेवा में लग जाएं, तो एक-दूसरे को भगवान के बारे में बताने से हमें असीम सुख मिलता है। यह दोस्ती का ऐसा रूप है जहाँ सब खुश होते हैं क्योंकि वे उसी 'बड़े प्यारे' के बारे में बात कर रहे हैं जिससे वे जुड़े हुए हैं।

दैनिक चिंतन

आज जब भी आप किसी से मिलते हैं, तो याद रखिए कि सच्चा भक्तजन एक-दूसरे को ईश्वर की बातें सुनाकर निरंतर आनंदित होता है। अपने मन और इन्द्रियों को संसार के विषयों में खोने के बजाय, उन्हें कृष्णचरणों में अर्पित करके देखिए कि कैसे आपका हृदय गहरा सन्तुष्टि महसूस करता है। यह आनंद बाहरी किसी उपहार से नहीं, बल्कि ईश्वर के नाम की निरंतर कथा को सुनने और मनाने में ही छिपा है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने चित्त को स्थापन करें और सभी प्राणों का समर्पण भगवान कृष्ण में करने की प्रार्थना करें। एक शांत स्थान पर बैठकर यह सोचें कि आपका पूरा अस्तित्व अब केवल उनके विचारों और वाणी में ही रम रहा है।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. चित्त का पूर्ण समर्पण (Maccitta)
    इस श्लोक की पहली सीख यह है कि भगवद्भक्त अपना पूरा मन और चेतना केवल परमात्मा में ही केंद्रित करता है। जब हमारा चित्त स्वयं से हटकर ईश्वर में स्थिर हो जाता है, तो आंतरिक शांति की प्राप्ति सुनिश्चित होती है।
  2. प्राणों का अर्पण (Madgataprana)
    केवल मन ही नहीं बल्कि अपनी जीवन शक्ति और इन्द्रियों को भी भगवान के चरणों में समर्पित करना इस योग की अनिवार्यता है। यह एक सक्रिय प्रक्रिया है जहाँ व्यक्ति अपने सभी कार्यों का फलदान ईश्वर को करने लगता है।
  3. परस्पर भक्ति-कथा और आनंद (Kathayantaḥ ca māṃ nityaṃ)
    सच्चे साधकों का एकत्रित होकर कृष्ण के गुणों की कथा करना ही उनकी सबसे बड़ी पूजा है। ऐसा समूह में निरंतर बोध और आनंद मिलता है, जो व्यक्तिगत तपस्या से भी अधिक संतोषजनक होता है।

विषय

भक्ति योग (Bhakti Yoga)ईश्वर में समर्पण (Surrender to God)संतुष्टि और आनंद (Contentment and Bliss)साधना का सहयोगी प्रभाव (Collective Spiritual Practice)चित्त स्थिरता (Steadiness of Mind)परस्पर बोध (Mutual Enlightenment)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — यह श्लोक कर्मयोग का मूल सिद्धांत देता है और बताता है कि फल के भोग में न रहकर कार्य को ईश्वरार्पण कैसे करना है।
  2. 3.30 — यह श्लोक प्राणों का पूर्ण समर्पण करने और कर्मों का त्याग करने की विधि के बारे में गहराई से बताता है, जो इस अध्याय की थीम को पूरा करता है।
  3. 12.15 — इस श्लोक में भगवान स्वयं उन भक्तों के गुणों का वर्णन करते हैं जो परस्पर प्रेम और सुखी रहते हैं, जो कि १०वें अध्याय की समाप्ति है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक में 'मद्गतप्राणाः' (Madgataprana) शब्द का क्या अर्थ है?
यह शब्द उन भक्तों को संदर्भित करता है जो अपने प्राणों और इन्द्रियों को पूर्णतया ईश्वर में समर्पित कर देते हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं कि वे बाहर जाकर रहें, बल्कि उनके सभी अंग-प्रत्यंग, जीवन शक्ति और वासनाएं केवल भगवान की सेवा या स्मरण के लिए ही केंद्रित होती हैं।
इस श्लोक का मुख्य संदेश 'तुष्टि' (संतोष) से क्या संबंधित है?
यह श्लोक बताता है कि जब चेतना ईश्वर में स्थिर होती है, तो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर रहने की जरूरत खत्म हो जाती है। भक्त सदैव आंतरिक संतोष (तुष्टि) और रति (आनंद) अनुभव करते हैं क्योंकि उनका स्रोत ईश्वर स्वयं हैं, न कि बाहरी वस्तुएं।
क्या यह श्लोक केवल भक्तों के लिए है या सभी मनुष्यों के लिए?
हालाँकि यह विशेष रूप से उन भक्तों (मच्चित्ताः, मद्गतप्राणाः) का वर्णन करता है जो पूर्ण समर्पण कर चुके हैं, लेकिन इसका संदेश सभी लोगों को ईश्वर में चेतना केंद्रित करने के लिए प्रेरित करता है। यह दर्शाता है कि यदि कोई भी व्यक्ति अपने मन और प्राणों को उच्च स्रोत में लगा दे, तो उसे वही सुख प्राप्त होगा जो भक्त पाते हैं।
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