भगवद्गीता 10.5

Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 10.5 — "अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान. यश और अपयश ऐसे ये प्राणियों के नानाविध भाव मुझ से ही प्रकट होते हैं।।"
भगवद्गीता 10.5 — Vibhuti Yoga
संस्कृत

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः | भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ||१०-५||

लिप्यंतरण

ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo.ayaśaḥ . bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ ||10-5||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि सभी जीवों के गुण और भाव, चाहे वे अच्छे हों या बुरे, सीधे उनकी ओर से ही उत्पन्न होते हैं। इस श्लोक में 'अहिंसा', 'समता', 'तपस्या' जैसे पवित्र गुणों का उल्लेख है और साथ ही 'यश' (प्रतिष्ठा) व 'अयश' (अप्रतिष्ठा) जैसी दुनिया की स्थितियाँ भी शामिल हैं। कृष्ण यह सिखाते हैं कि सभी भावनाएँ और गुण मूल रूप से ईश्वर के ही स्वरूप में विराजमान होते हैं, भले वे हमें अलग-अलग लगें। इसका मुख्य संदेश है कि प्रकृतिक गुणों को समझकर भी उनकी उत्पत्ति का स्रोत परमात्मा होना चाहिए, न कि स्वयं को ही सब कुछ मान लेना चाहिए।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक भगवान कृष्ण के 'विभूति योग' का एक अभिन्न हिस्सा है, जो ज्ञान (Jnana) और भक्ति (Bhakti) दोनों को एकात्म करता है। यह सिद्धांत बताता है कि सभी प्राकृतिक गुणों और भावनाओं की उत्पत्ति परब्रह्म से होती है, जिससे 'सर्वत्र ब्रह्मा' का ज्ञान विकसित होता है। इसमें कर्मयोग के अंतर्गत यह सिद्धांत भी निहित है कि सभी कार्यों को ईश्वर की अभिव्यक्ति मानकर करना चाहिए, न कि स्वयं को कर्ता समझना चाहिए।

शब्दार्थ
अहिंसा noninjury, समता eanimity, तुष्टिः contentment, तपः austerity, दानम् beneficence, यशः fame, अयशः illfame, भवन्ति arise, भावाः alities, भूतानाम् of beings, मत्तः from Me, एव alone, पृथग्विधाः of different kinds
पारंपरिक भाष्य
Ahimsa is noninjury to living beings in thought, word and deed. Samata is that state wherein there is neither Raga (like) nor Dvesha (dislike), when one gets pleasant or unpleasant objects. There is neither exhilaration when one gets pleasant or favourable objects nor depressions when one gets unpleasant or unfavourable objects. Tushtih is satisfaction or contentment. The man of contentment is satisfied with whatever object he gets through Prarabdha. He is satisfied with his present acisitions. He is free from greed and so he has peace of mind. Contentment makes a man very rich. It annihilates greed. Greed makes even a rich man a beggar of beggars. A greedy man is ever restless. Tapas is restraint of the senses, with bodily mortification through the practice of fasting and slow reduction of food. The strength of the body and the senses is reduced through fasting. Danam is beneficence. It is sharing of ones own things with others according to ones own means, or distribution of rice, gold, cloth, etc., to a worthy person, in a fit place and time, especially to one who can do nothign in return. Yasas is fame due to Dharma or virtuous actions. Ayasah is illfame or disgrace due to Adharma or sinful actions. All these different kinds of alities of living beings arise from Me alone, the great Lord of the worlds, according to their respective Karmas.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र में हुआ था, जहाँ अर्जुन ने भीड़ से लड़ने का संकल्प तोड़ दिया था और भगवान कृष्ण की ओर देखकर अपने कर्मों को लेकर विवश हो गए थे। इससे पहले कृष्ण ने 'संक्या' (ज्ञान) के मार्ग पर बातें शुरू करके अर्जुन का हतप्रभ मन समझाया था और अब वे 'विभूति योग' में अपनी दिव्य महिमा को बख़ीर हैं। इस संदर्भ में कृष्ण यह स्पष्ट करने जा रहे थे कि युद्ध या जीवन के सभी घटनाएँ, चाहे वह अहिंसा हो या यश-अपयश की स्थिति, ईश्वरीय प्रेरणा से ही चल रही है। अर्जुन जो भ्रम में था कि 'कर्म करने वाला मैं हूँ', कृष्ण उसे यह समझा रहे हैं कि सब कुछ उनकी अभिव्यक्ति (अवतार) का हिस्सा है और वे स्वयं सभी गुणों के मूल स्रोत हैं।

आज के जीवन में

कल्पना कीजिए आप एक बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं जो बहुत कठिन है, और अचानक आपके सहकर्मी या ग्राहकों से आपको 'यश' (सराहना) मिलता है फिर कुछ समय बाद 'अयश' (आलोचना) का सामना करना पड़ता है। इस श्लोक की शिक्षा यह होगी कि आप आलोचना को व्यक्तिगत न लें और सराहना में अहंकार न बढ़ने दें, बल्कि समझें कि ये दोनों स्थितियाँ आपके विकास के लिए परमात्मा द्वारा भेजी गई 'पृथग्विधा' (विभिन्न) परिस्थितियाँ हैं। जब आप तनाव या चिंता महसूस करते हैं, तो यह दृष्टिकोण आपको 'अहिंसा' और 'तुष्टि' (संतोष) की स्थिति में ला सकता है क्योंकि आप जानते हैं कि ये भाव अस्थायी परमात्मीय प्रयोग हैं।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

सोचिए जैसे एक बड़ा पेंटिंग कैनवस (Canvas) होता है और उस पर रंगों से अलग-अलग चित्र बनते हैं; वैसे ही भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि सब कुछ उनकी ओर से आता है। चाहे आप 'मिठाई' जैसा प्यार, 'दोस्ती' की समान भावना या 'कठोर तपस्या' करें, और चाहे लोग आपको सराहें ('यश') या डांटें ('अयश'), ये सब आपके भीतर वाले गुण हैं जो उस एक स्रोत से आते हैं। जैसे बिजली के चमत्कार में अलग-अलग रंग दिखते हैं लेकिन वह एक ही रोशनी का खेल है, वैसे ही हमारे जीवन की सभी स्थितियाँ भगवान के प्रेम और शक्ति की विभिन्न झलकें हैं।

दैनिक चिंतन

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके जीवन में जो सुख-दुःख, यश-अपयश या तपस्या जैसे भाव उभरते हैं, वे सब ईश्वरीय शक्ति के प्रकाशित रूप ही हैं? जब हम इन सभी विरोधी ध्रुवों को अपने भीतर देखते हैं, तो यह समझना आसान हो जाता है कि ये अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं। इसलिए आज के दिन आप किसी भी भाव में उलझे बिना, उस स्थिर चेतना में विश्राम करें जहाँ से ये सभी प्रवाह निकलते हैं और वे वापस वहीँ समाप्त होते हैं।

आज के लिए एक अभ्यास

आज के लिए अपने मन पर ध्यान केंद्रित करें और देखें कि आपके अहंकार, क्रोध या लालच जैसे भाव कैसे आपके भीतर उभर रहे हैं। इन सभी विपरीत भावों को एक ही स्रोत से आता हुआ जानकर ईश्वर के प्रति समर्पण की अनुभूति करें और मन को शांत करके उनमें उनके अस्तित्व का कारण खोजें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. द्वैत-रहित स्रोत का बोध
    यश, अपयश या अहिंसा जैसे विरोधी भाव वास्तव में एक ही परम सत्य से उत्पन्न होते हैं। जब हम इनके मूल को समझ लेते हैं, तो द्वंद्वों के बाहर खड़े होकर शांति प्राप्त की जा सकती है।
  2. सर्वशक्तिमान का विस्तार
    भगवान कृष्ण सभी प्राणियों के भीतर और उनके माध्यम से अपने गुणों को प्रकट करते हैं, चाहे वह दान हो या तपस्या। यह ज्ञान देता है कि ईश्वर हर विविधता में निहित सत्य का आधार हैं।
  3. संतुलन की प्राप्ति
    अहिंसा और समता जैसे भाव जीवन को संतुलित करने के लिए आवश्यक हैं, जो सीधे ईश्वरीय चेतना से जुड़े होते हैं। इनका अभ्यास हमें कर्मों में भी स्थिरचित्त बनाए रखने में सहायक होता है।

विषय

ईश्वर की विभूतियाँ (Divine Glories)जीवन के द्वंद्व और संतोष (Duality and Contentment)कर्मयोग का सार (Essence of Karma Yoga)मनोदशाओं का नियंत्रण (Control over Mental States)अहिंसा और तपस्या की महिमा (Glory of Non-violence and Austerity)सर्वाधिकारी भगवान (The Supreme Lord as Source)

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — कर्म करने पर ध्यान और फल की इच्छा न रखने के सिद्धांत को समझना इससे जुड़ा है कि कैसे भावों में बांधे बिना कर्म करना चाहिए।
  2. 3.27 — यह अंश स्पष्ट करता है कि प्राकृतिक गुण ही कार्य करते हैं और हम केवल साक्षी होते हैं, जो 10.5 वाले भावों की उत्पत्ति को समझने में मदद करेगा।
  3. 9.4 — इस श्लोक से पता चलता है कि भगवान सृष्टि और उसके सभी तत्वों में व्याप्त हैं, जो 10.5 के 'मत्त एव' (मुझसे ही) भाव की गहराई को उजागर करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस श्लोक का आधुनिक जीवन में क्या महत्व है?
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में यह श्लोक हमें 'तृप्ति' (Contentment) और 'समता' (Equanimity) सिखाता है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। यह आपको मानसिक शांति प्रदान करता है क्योंकि आप जानते हैं कि सभी भावनाएँ अस्थायी ईश्वरीय व्यवस्था का हिस्सा हैं और न तो सफलता में घमंड करना चाहिए, न ही विफलता में निराशा होनी चाहिए।
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