भगवद्गीता 10.33

Vibhuti Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 10.33 — "मैं अक्षरों (वर्णमाला) में अकार और समासों में द्वन्द्व (नामक समास) हूँ; मैं अक्षय काल और विश्वतोमुख "
भगवद्गीता 10.33 — Vibhuti Yoga
संस्कृत

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च | अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ||१०-३३||

लिप्यंतरण

akṣarāṇāmakāro.asmi dvandvaḥ sāmāsikasya ca . ahamevākṣayaḥ kālo dhātāhaṃ viśvatomukhaḥ ||10-33||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन को बतला रहे हैं कि वे सभी वस्तुओं में अपने रूप के सबसे मूल और महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यह श्लोक कहता है कि वर्णमाला का पहला अक्षर 'अकार', समासों की संख्या 'द्वंद' (जैसे राम-सीता), समय का सार 'काल', और सब कुछ फैलाने वाले धाता स्वयं कृष्ण हैं। इसका मुख्य शिक्षा यह है कि ईश्वर केवल दूर नहीं, बल्कि हमारी भाषा, समय और प्रकृति के हर पहलू में विद्यमान हैं।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह ज्ञान योग (Jnana Yoga) की एक महत्वपूर्ण शाखा है जो 'सर्वमूर्ति' या सर्वव्यापक ईश्वर के दर्शन को विकसित करती है। यह सिद्धांत बताता है कि ब्रह्मान (परमात्मा) और जगत् में कोई अलगाव नहीं है, प्रत्येक सूक्ष्म और स्थूल घटना में वही सनातन तत्व निहित है। इसमें भक्ति योग के भी गहन पहलू शामिल हैं क्योंकि ईश्वर को उनकी महानता (विभूति) में देखकर समर्पण भाव जागृत होता है।

शब्दार्थ
अक्षराणाम् among letters, अकारः the letter A, अस्मि (I) am, द्वन्द्वः the dual, सामासिकस्य among all compounds, च and, अहम् I, एव verily, अक्षयः the inexhaustible or everlasting, कालः time, धाता the dispenser, अहम् I, विश्वतोमुखः the Allfaced (or having faces in all directions)
पारंपरिक भाष्य
Among the alphabets I am the letter A. Among the various kinds of compounds used in Sanskrit language I am the Dvandva (union of the two), the copulative. Time here refers to the moment, the ultimate element of time or to Paramesvara, the Supreme Lord Who is the time of even time, since He is beyond time. As the Supreme Being is allpervading it is said that He has faces in all directions.

यह कहाँ घटित होता है

यह संवाद महाभारत युद्ध के मैदान कुरुক্ষেत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया है, जहाँ 'विभूति योग' (अध्याय 10) का वर्णन चल रहा है। इससे ठीक पहले कृष्ण ने अपने विशाल रूप और प्रकृति में अपनी शक्ति के उदाहरण दिए हैं ताकि अर्जुन को यह समझ आए कि वे स्वयं सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म हैं। अर्जुन अभी भी युद्ध की तैयारी कर रहे थे, लेकिन इस ज्ञान से उनके मन में भगवान के प्रति श्रद्धा और निष्ठा गहराई से स्थापित हो रही थी कि वे किस महान सत्ता को अभिवादन करने वाले हैं।

आज के जीवन में

जब आप जीवन में कोई बड़ा निर्णय लेने की उलझन या भविष्य के डर (काल) का सामना करते हैं, तो यह श्लोक आपको याद दिलाएगा कि समय स्वयं ईश्वरीय है और वह अक्षय (खत्म न होने वाला) है। आप इस बात को समझ सकते हैं कि जैसे भाषा की नींव 'अ' अक्षर पर टिकी है, वैसे ही आपके जीवन के हर कर्म में दिव्य उपस्थिति मौजूद है जो आपको आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती है। किसी भी भारी निर्णय या काम को करते समय यह विचार करें कि आपका कार्य और उसकी शुरुआत स्वयं ईश्वर के स्वरूप से जुड़ी हुई है, जिससे भय मिटता है और विश्वास बढ़ता है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

जैसे एक लड़के की चमड़ी पर 'अ' अक्षर सबसे पहले लिखा जाता है या जैसे दो प्यारे दोस्तों का मिलना 'द्वंद' कहलाता है, वैसे ही भगवान कृष्ण हर जगह हैं। वे वह समय भी हैं जो हमेशा चल रहा है और कभी खत्म नहीं होता, बिल्कुल एक बहुत ताकतवर धाता की तरह जो सब कुछ संभाले रखते हैं। यह समझना आसान है कि जैसे आपकी पसंदीदा कहानी के हर शब्द में उसका जादू छुपा हो, वैसे ही कृष्ण हमारे अक्षरों और समय में भी रहते हैं।

दैनिक चिंतन

प्यारे मित्र, क्या आपने कभी सोचा कि आपके द्वारा बोले जाने वाले हर शब्द का मूल स्रोत स्वयं ईश्वर हैं? जैसे 'अकार' बिना किसी अक्षर के भी सब कुछ को परिभाषित करता है और समास संकेतात्मक रूप से एकता लाते हैं, वैसे ही आपकी जीवन की प्रत्येक क्रिया में वह दिव्य ऊर्जा कार्य कर रही है। काल का यह स्वरूप आपको याद दिलाता है कि समय भी अक्षय है और धाता (सृजक) विश्व के हर कोने से आपके लिए देख रहा है, इसलिए आप निरंतर अपने कामों में ईश्वरीय समर्पण रखें।

आज के लिए एक अभ्यास

आज अपने मन को स्थिर करके सुनिए कि आपकी ध्वनि और शब्द भी ईश्वर के स्वरूप हैं, क्योंकि 'अकार' ही सबसे मूलभूत आवाज़ है। जब भी कोई नया शब्द या समास बनता है, तब प्रत्येक क्षण में भगवान की उपस्थिति को पहचानें और अस्तित्व के इस विस्तार को महत्व दें।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. ध्वनि और अक्षरों की दिव्यता
    भगवान कहते हैं कि वे शब्दमाला के सबसे मूलभूत 'अकार' हैं, जो सभी उच्चारणों का आधार है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति और संस्कृत की ध्वनियां भी ईश्वर के विस्तारित स्वरूप हैं और उनमें पूजा करनी चाहिए।
  2. समाधियों में एकता का सत्य
    'द्वन्द्व' समास दो पदों को जोड़कर नया अर्थ देता है, जो ईश्वर की उस शक्ति को दर्शाता है जिससे भिन्न-भिन्न चीजें एक साथ मिल कर पूर्ण होती हैं। यह सिखाता है कि विविधता के बावजूद सृष्टि में वह अखंडता और संगति बनी रहती है जो ईश्वर ही हैं।
  3. काल और विश्वतोमुखी धाता
    ईश्वर 'अक्षय काल' (विनाशकारी समय) और सृजक (धाता) के रूप में भी विराट् स्वरूप में हैं, जो सब ओर से देखते हुए सभी को नियंत्रित करते हैं। यह सिखाता है कि न तो समय कोई बाहरी शक्ति है और न ही रचना का कर्ता अलग, बल्कि वे दोनों स्वयं भगवान के गुण हैं।

विषय

ईश्वर की सर्वव्यापकतासमय और अक्षय काल का महत्वभाषा और धर्म में दिव्य उपस्थितिभक्ति योग के दृश्य रूपअहंकार से मुक्तिप्रकृति का सार

संबंधित श्लोक

2.473.304.186.518.66

आगे पढ़ें

  1. 10.32 — इससे पहले की कड़ी जहां भगवान बताते हैं कि वे सभी 'अक्षरों' में और भी किस रूप में विद्यमान हैं, इसका संदर्भ समझने के लिए।
  2. 10.34 — इसके बाद की कड़ी जहां भगवान 'काल' को मृत्यु और विनाश का रूप मानते हैं, जो इस श्लोक में उल्लिखित धाता के अंतिम पहलू को पूरा करता है।
  3. 13.24 — सृजक (धाता) और विश्व की देखभाल करने वाले भगवान के गुणों का विस्तारित वर्णन, जो इस अध्याय में 'विश्वतोमुख' शब्द से जुड़ा है।

अनुशंसित पुस्तकें

GitaQ earns from qualifying purchases as an Amazon Associate.

इस श्लोक को साझा करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

काल (Time) को ईश्वर क्यों कहा गया है?
भगवान कृष्ण ने 'अक्षय' या अविनाशी समय के रूप में स्वयं का वर्णन किया है क्योंकि वे ही वह शक्ति हैं जो सृष्टि की रचना, स्थिति और विनाश को नियंत्रित करती है। समय कोई वस्तु नहीं बल्कि एक दिव्य शक्ति है जो कभी खत्म नहीं होती और यह सब कुछ करने वाला 'धाता' स्वयं ईश्वर हैं।
'विश्वतोमुख धाता' से तात्पर्य क्या है?
इसका अर्थ है कि भगवान की दृष्टि और शक्ति हर दिशा में फैली हुई है, वे सब कुछ देख रहे हैं और सभी सृजनात्मक कार्यों के मूल कारण (धाता) हैं। यह दर्शाता है कि ईश्वर सीमित नहीं बल्कि सर्वव्यापी हैं जो प्रत्येक प्राणी की ओर से कार्य कर रहे हैं।
समासों में 'द्वंद' (Dvandva) क्यों विशेष उल्लेखित है?
हिंदी व्याकरण और संस्कृत में 'द्वंद' समास दो या अधिक पदों के समानार्थक मिश्रण को दर्शाता है, जो एक नई शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। कृष्ण यह बता रहे हैं कि वे ही वह मूल तत्व हैं जिससे सभी संयुक्त अर्थ और संबंध उत्पन्न होते हैं, जैसे 'राम-सीता' या 'शिव-शक्ति' जो एक सत्ता के रूप में कार्य करते हैं।
क्या यह श्लोक हमें सिर्फ धर्म की बात करता है?
नहीं, यह श्लोक केवल धर्म नहीं बल्कि ईश्वर की सर्वव्यापकता और उनकी उपस्थिति का वर्णन करता है जो भाषा (अक्षरा), समय (काल) और प्रकृति में विद्यमान हैं। इसका उद्देश्य हमें यह समझाना है कि ईश्वर दूर नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व के हर पहलू में मौजूद हैं जो ध्यान और भक्ति द्वारा अनुभव किया जा सकता है।
अन्य भाषाओं में: भगवद्गीता 10.33 →