भगवद्गीता 1.36

Arjuna Vishada Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 1.36 — "हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों की हत्या करके हमें क्या प्रसन्नता होगी?  इन आततायियों को मारकर तो"
भगवद्गीता 1.36 — Arjuna Vishada Yoga
संस्कृत

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ||१-३६||

लिप्यंतरण

nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana . pāpamevāśrayedasmānhatvaitānātatāyinaḥ ||1-36||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में अर्जुन श्री कृष्ण को संबोधित करते हुए कहते हैं कि यदि वे धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध कर देंगे, तो उनमें कोई प्रसन्नता नहीं होगी। उन्हें ऐसा लग रहा है कि अपने ही स्वजन और पापियों (आततायियों) की हत्या करने से उन्हें केवल पाप मिलेगा न कि सुख। अर्जुन यहाँ यह समझा रहे हैं कि ऐसे कर्म जो धर्म विरुद्ध होते हैं, उनसे आत्मिक शांति नहीं मिल सकती है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'सांख्य' (Sankhya) दर्शन और कर्मयोग की तैयारी को चित्रित करता है, जहाँ अर्जुन व्यक्तिगत आसक्ति और पाप के भय का सामना कर रहा है। यह भावना 'क्लेश' या दुःख से उत्पन्न होती है जो बाद में श्री कृष्ण द्वारा 'ज्ञान योग' (Jnana Yoga) की शुरुआत पर आधारित उपदेशों, विशेष रूप से आत्मा के अमरत्व और कर्मफल का त्याग करने के सिद्धांत को विकसित करती है। यह दर्शाता है कि जब तक व्यक्ति पाप-पुण्य के द्वंद्व में फंसा रहता है, तब तक वह शुद्ध कर्तव्य निभाने की स्थिति नहीं पहुंच सकता।

शब्दार्थ
निहत्य having slain, धार्तराष्ट्रान् sons of Dhritarashtra, नः to us, का what, प्रीतिः pleasure, स्यात् may be, जनार्दन O Janardana, पापम् sin, एव only, आश्रयेत् would take hold, अस्मान् to us, हत्वा having killed, एतान् these, आततायिनः felons
पारंपरिक भाष्य
Janardana means one who is worshipped by all for prosperity and salvation -- Krishna. He who sets fire to the house of another, who gives poision, who runs with sword to kill, who has plundered wealth and lands, and who has taken hold of the wife of somody else is an atatayi. Duryodhana had done all these evil actions.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्ध का प्रारंभिक हिस्सा है जहाँ कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन अपनी सेना और विरोधी पक्ष को देखकर भौतिक रूप से हाथों की थरथराहट, सिर घूमने और मन में वैराग्य का अनुभव कर रहे हैं। धृतराष्ट्र के पुत्र, जिन्हें 'आततायि' (पापियों/अत्याचारी) कहा जा रहा है, ने पांडवों को धोखे से कसौटी पर लगाया और राज्य हड़प्न किया था। अर्जुन इस बिंदु पर हैं कि वे युद्ध के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि उनके अनुसार अपने ही कुल का नाश करना सबसे बड़ा पाप है, जो उन्हें आत्मा के विनाश की भावना में डाल देता है।

आज के जीवन में

आजकल कई बार ऐसा होता है कि किसी कठिन निर्णय (जैसे कंपनी से पदोन्नति लेने या रिश्तेदारों को नौकरियों देने) के लिए आपको ऐसे लोगों का विरोध करना पड़ता है जो गलत तरीके से काम कर रहे हैं, लेकिन आप डरते हैं कि इससे आपके प्रतिष्ठित परिवार में तनाव पैदा होगा। अर्जुन की यह भावना हमें बताती है कि जब कोई कठिन निर्णय लेने के लिए आपको अपने ही प्रियजनों या सामाजिक दायरे को नुकसान पहुंचाने पर मजबूर करता हो, तो तुरंत घबराने के बजाय अपनी आंतरिक चिंताओं और पाप-पुण्यात्मक भावनाओं की जांच करनी चाहिए। सच्चा धर्म कभी भी अन्यायी या नफ़रतपूर्ण नहीं होता, इसलिए आपको ऐसे कर्तव्यों को निभाने में संकोच करना ही ठीक है जब तक कि आप अपनी आत्मा के शांति का विश्लेषण न कर लें।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो अगर तुम अपने स्कूल के दोस्तों या परिवार के किसी सदस्य से नफ़रत करने वाले व्यक्ति को मारने की बात कर रहे हो, तो क्या तुम्हें अच्छा लगेगा? अर्जुन भी वही सोच रहा है। वे कहते हैं कि अगर हम अपने ही घर वालों का खूनी बनेंगे, तो हमारे मन में खुशी नहीं आएगी, बस गुनाह (पाप) होगा जो हमें डराएगा जैसे किसी बुरी नींद से।

दैनिक चिंतन

अगर आप आज किसी कठिन निर्णय की स्थिति में हैं जहाँ आपके दोस्त या रिश्तेदार शामिल हों, तो आगे बढ़ने से पहले अपने मन के गहरे कोनों को देखें। क्या आप सच्चे प्रेम और न्याय की भावनाओं का पालन कर रहे हैं या सिर्फ बाहरी परिस्थितियों पर भड़क उठे हैं? अर्जुन ने हमें यह सबक दिया कि जब तक हृदय में दयालुता नहीं होती, तब तक किसी भी कर्म को सफल मानना संभव नहीं है।

आज के लिए एक अभ्यास

अर्जुन की इस पीड़ा को देखकर, अपने मन में जगह देने के लिए एक क्षण रुकें कि क्या हम अपनी वास्तविक धर्म और प्रेम से हटाकर किसी भी परिस्थिति का निर्णय ले रहे हैं। यह ध्यान करें कि कठोर निर्णयों की सच्ची परीक्षा तब होती है जब हम अपने स्वार्थ के बजाय उच्चतम न्याय और दयालुता को प्राथमिकता देते हैं, जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. पाप की गहरी पहचान (Recognition of Sin)
    यहाँ अर्जुन यह समझते हैं कि अपने ही परिवार और धर्मगुरुओं को मारना केवल एक राजनीतिक जीत नहीं, बल्कि आत्मा के लिए अभिशाप है। वह 'आततायी' शब्द का उपयोग करके दिखाते हैं कि जब भी न्याय की सीमा पार हो जाती है, तो कर्म पाप बन जाता है।
  2. धर्म और प्रेम में संघर्ष (Conflict between Dharma and Love)
    अर्जुन 'कृत-युद्ध' के धर्म और अपने परिवार से जुड़े प्यार के बीच एक गहरे द्वंद्व का सामना कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि सच्चा धार्मिक व्यक्ति तभी होता है जो कठोर लेकिन निष्पक्ष न्याय की अनुभूति करता है, भले ही वह अपने प्रियजनों को चुनौती दे रहा हो।
  3. जनार्दन के प्रति समर्पण (Surrender to Janardana)
    अर्जुन सीधे 'हे जनार्दन' कहकर भगवान से शरण मांगते हैं, यह स्वीकार करते हुए कि अकेले उनकी बुद्धि इस गहरे द्वंद्व को हल नहीं कर सकती। वे अपने विचारों और भावनाओं को ईश्वर के चरणों में रखने की तैयारी दिखाते हैं ताकि सही मार्गदर्शन मिल सके।

विषय

धर्म और कर्तव्य की समझपाप का भयआत्मसाक्षात्कारसंन्यास या त्यागविषाद योगकलियुगी नैतिकता

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आगे पढ़ें

  1. 2.47 — अर्जुन के विसाद (उदास) भाव का समाधान और कर्मयोग की मूल सिद्धांत, जो अगले अध्याय में शुरू होता है।
  2. 3.30 — ईश्वर को समर्पित करके कार्य करने का विस्तृत उपादेश, जिससे हम पाप के भय से मुक्त हो सकते हैं और कर्म में स्थिर रहते हैं।
  3. 12.15 — भगवान की वह विशेष गुणों का वर्णन जो एक आत्मा को शांत, दयालु और पाप-रहित बनाता है, जिससे हम अर्जुन के भावनात्मक संघर्ष से सीख सकते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्यों अर्जुन धृतराष्ट्र के पुत्रों को 'आततायी' कह रहे हैं?
अर्जुन उन्हें आततायी इसलिए कहते हैं क्योंकि उन्होंने पांडवों पर अन्याय किया, उनका राज्य छीना और युद्ध में भी धोखेबाजी की थी। वे ऐसे लोग थे जो कर्मठ रूप से अत्याचार कर रहे थे और धार्मिक नियमों का उल्लंघन कर रहे थे, इसलिए उन्हें मारने को पाप नहीं बल्कि न्याय मानना चाहिए था, लेकिन अर्जुन के मन में कुल-हानि का डर ज्यादा था।
क्या इस श्लोक से यह साबित होता है कि युद्ध हमेशा पाप है?
नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि अर्जुन के मन में अभी 'ज्ञान' की कमी थी क्योंकि वे केवल परिणाम और पाप-पुण्य के डर पर आधारित थे। बाद में श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि यदि युद्ध धर्म (सत्य और न्याय) के लिए हो, तो वह पाप नहीं बल्कि एक पवित्र कर्तव्य है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यह नहीं है कि सैनिकों की हत्या करना हमेशा गलत है।
इस श्लोक में 'जनार्दन' किसका उपाय है और उसकी क्या महत्ता है?
'जनार्दन' श्री कृष्ण का एक प्रमुख नाम है जिसका अर्थ है जो सभी जीवों को संतुष्ट करता है या पापों से मुक्त करता है। अर्जुन इस शब्द के साथ उनसे बात कर रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि कृष्ण ही उन्हें सही मार्ग दिखा सकते हैं जब वे भ्रमित और विषादी हो चुके हों, इसलिए यह उपाय उनकी आस्था और शरण की भावना को दर्शाता है।
आज के युगीन जीवन में इस श्लोक का क्या उपयोग किया जा सकता है?
इसका उपयोग तब किया जा सकता है जब हमें किसी कठिन निर्णय को लेकर डर लगता हो कि वह हमारे रिश्तों या सामाजिक प्रतिष्ठा पर बुरा असर डालेगा। यह सिखाता है कि जब भी कोई स्थिति आती है जहाँ आपको अन्यायी लोगों का विरोध करना पड़े, तो केवल 'पाप' की चिंता न करें बल्कि अपने कर्तव्य (Dharma) और सत्य को समझें, क्योंकि अक्सर जो पाप लग सकता है वह वास्तव में धर्म की रक्षा हो सकती है।
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