भगवद्गीता 1.35

Arjuna Vishada Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 1.35 — "हे मधुसूदन !  इनके मुझे मारने पर अथवा त्रैलोक्य के राज्य के लिये भी मैं इनको मारना नहीं चाहता,  फिर "
भगवद्गीता 1.35 — Arjuna Vishada Yoga
संस्कृत

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन | अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ||१-३५||

लिप्यंतरण

etānna hantumicchāmi ghnato.api madhusūdana . api trailokyarājyasya hetoḥ kiṃ nu mahīkṛte ||1-35||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

इस श्लोक में अर्जुन श्री कृष्ण से विनम्रतापूर्वक कह रहे हैं कि वे अपने ही परिवार वालों को मारने के लिए तैयार नहीं हैं। भगवान 'माधव' (क्रोधित होने वाले) और उनके पुत्रों की हत्या से उन्हें कोई भी दुनियावी संपत्ति या राज्य प्राप्त करने में रुचि नहीं है। यह भावनात्मक संघर्ष दर्शाता है कि अत्यधिक प्रेम और नैतिक स्पष्टता के बिंदु पर, व्यक्ति भौतिक लाभ को त्याग देता है।

इसके पीछे का सिद्धांत

यह श्लोक 'कर्म योग' के संचालन को प्रारंभ करता है जहां आत्मा (आत्म-ज्ञान) और धर्म की अवधारणाएं भौतिक लोभ से ऊपर उठती हैं। यह भावना दर्शाता है कि जब तक व्यक्ति अपने कर्तव्य (धर्म) में स्पष्ट नहीं होता, वह 'मैत्री' या प्रेम के नाम पर भी अधर्म का मार्ग चुन सकता है; अर्जुन यहाँ अपना धर्म-संदिग्धा दिखा रहा है।

शब्दार्थ
एतान् these, न not, हन्तुम् to kill, इच्छामि (I) wish, घ्नतःअपि even if they kill me, मधुसूदन O Madhusudana (the slayer of Madhu, a demon), अपि even, त्रैलोक्यराज्यस्य dominion over the three worlds, हेतोः for the sake of, किम् how, नु then, महीकृते for the sake of the earth. No Commentary.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुক্ষেत्र पर स्थित भगवद गीता के प्रस्तावना अध्याय 'अर्जुन विषाद योग' में आता है। अर्जुन ने अपने सौतेले भाइयों और उनके पुराने गुरूओं को युद्ध की तैयारी करते देखकर, अपनी ब्रह्मास्त्र के धनुष से हथियार फेंक दिए थे। वे अब कृष्ण से कह रहे हैं कि यदि उन्हें अपने ही लोगों का वध करना होगा और उनकी प्रजा भी मारे जाएंगी, तो वह न केवल राजा बनना नहीं चाहता बल्कि पृथ्वी पर रहना भी नहीं चाहते।

आज के जीवन में

आजकल के करियर में अक्सर ऐसे स्थितियां आती हैं जहां एक कठोर निर्णय लेने या किसी को नौकर से निकालने का दबाव होता है, जिससे भविष्य की सुरक्षा मिल सकती है लेकिन पारिवारिक और सामाजिक संबंध टूट सकते हैं। इस श्लोक का उपयोग तब किया जा सकता है जब कोई व्यक्ति लाभ के लिए अपने मानवीय संवेदनाओं को त्याग रहा हो या किसी ऐसे निर्णय पर विचार कर रहा हो जो नैतिक रूप से सही नहीं लगता। यह हमें याद दिलाता है कि धन और पद की तुलना में इंसानी रिश्तों का सम्मान करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

अगर तुम्हें लगता हो कि एक दोस्त या परिवार का सदस्य गलत काम कर रहा है, तो क्या तुम उसे मार दोगे ताकि तुम राजा बन जाओ? अर्जुन ने कहा कि नहीं! वे कहते हैं कि उनका अपना परिवार और अपने रिश्तेदार इतने कीमती हैं कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के बदले दुनिया का पूरा साम्राज्य भी उन्हें नहीं मिल सकता। कभी-कभी प्यारा होना, हक्कोड़ बन जाने से ज्यादा जरूरी होता है।

दैनिक चिंतन

आज आप जब जीवन में कोई कठोर निर्णय लेने की स्थिति में हों, तो याद रखें कि अरुन्धन के रूप में अर्जुन ने भी संघर्ष किया था और उन्होंने महसूस किया कि सफलता से अधिक प्रेम और धर्म का पालन करना आवश्यक है। क्या आप अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किसी अन्य की भावनाओं या नैतिक मूल्यों को त्याग रहे हैं? कृष्ण की उपस्थिति आपके भीतर हमेशा उस गहरे करुणा-भाव को जगाती है जो आपको सही रास्ते पर वापस लाता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज की शुरुआत में, इस विचार को धीरे से दोहराएं कि वास्तविक शांति बाहरी उपलब्धियों या राज्यों में नहीं बल्कि प्रियजन के प्रति करुणा और नैतिकता में निहित है। अपने मन पर केंद्रित होकर सोचें कि यदि मैं किसी को दुःख पहुँचाऊंगा, तो मेरे भीतर का 'मध्यसूदन' (कृष्ण) कैसे प्रतिक्रिया करेंगे।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. करुणा का सर्वोच्च धर्म
    यह श्लोक दर्शाता है कि अशुद्ध संसार के राज्य या लाभ से अधिक, प्रेम और करुणा की भावना को प्राथमिकता देना ही वास्तविक धर्म है। जब व्यक्ति अपने स्वार्थ को त्यागकर दूसरों का कल्याण चाहता है, तो वह मधुसूदन (कृष्ण) के आशीर्वाद प्राप्त करता है।
  2. त्रैलोक्य राज्य की तुच्छता
    यहाँ अर्जुन स्पष्ट करते हैं कि यदि तीन लोकों का राजा बनने के लिए भी किसी को मारना पड़े, तो वह उसका विरोध करेंगे। यह सिखाता है कि नैतिक शुद्धि और प्रेम से अधिक महत्वपूर्ण कोई बाहरी सत्ता नहीं हो सकती।
  3. मधुसूदन के प्रति समर्पण
    अरुन्धन ने कृष्ण को 'मधुसूदन' कहकर संबोधित किया, जो यह दर्शाता है कि वे अपने निर्णयों में ईश्वरीय मार्गदर्शन की अपेक्षा रखते हैं। यह विचार हमें सिखाता है कि अर्जुन का संघर्ष न केवल भौतिक था बल्कि एक आध्यात्मिक ज्ञान की खोज थी।

विषय

कर्मयोग का प्रारंभिक संघर्षलौह और मानवीय संबंधों की प्राथमिकताप्राप्ति के लिए आत्म-त्यागअरजुन का विक्षिप्त मनोवृत्तिधर्म और अर्थ में संघर्षभक्ति और करुणा की शुरुआत

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  1. 2.47 — अर्जुन के इस संघर्ष के बाद, कृष्ण उन्हें 'कर्मयोग' का मूल सिद्धांत समझाते हैं कि फल की इच्छा किए बिना कार्य करना चाहिए।
  2. 3.30 — यह श्लोक आगे बताता है कि कैसे कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करके अकर्तृत्व (non-attachment) का मार्ग अपनाना चाहिए।
  3. 12.15 — इस श्लोक में कृष्ण भक्तों के गुणों की चर्चा करते हैं, जो करुणा और दुःख सहने वाले लोगों को प्यार करने वाला होता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्यों अर्जुन ने 'माधव' शब्द का उपयोग किया?
अर्जुन श्री कृष्ण को 'मधुसूदन' कहकर संबोधित कर रहे हैं, जो एक गहरे सम्मान और भक्ति भाव की अभिव्यक्ति है। यह नाम उन्हें उस दिव्य शक्तिके रूप में याद दिलाता है जिसने राक्षस मधु का वध किया था, और अर्जुन अपनी स्थिति से उनके उपाय के लिए विनम्र हो रहे हैं।
क्या यह श्लोक कहता है कि युद्ध बिल्कुल गलत था?
नहीं, इसका अर्थ नहीं है कि युद्ध स्वयं में बुरा था; बल्कि यह दर्शाता है कि जब तक व्यक्ति अपने कर्तव्य को स्पष्ट रूप से समझ ले, वह संघर्ष के कारण भ्रमित हो सकता है। अर्जुन की भावनाएं तब बदल जाती हैं जब वे 'धर्म' और 'अधर्म' के बीच का सही मार्ग स्वयं कृष्ण द्वारा समझाया जाता है।
त्रैलोक्य राज्य क्या होता है?
'त्रैलोक्य' का अर्थ है तीन लोक: भूतल (पृथ्वी), स्वर्ग और पाताल, या आकाश-महान् पृथ्वी। यह शब्द सर्वोच्च संपत्ति और शांति को दर्शाता है जो कोई भी राजा हासिल कर सकता है। अर्जुन कह रहे हैं कि इन सभी लोकों का राज्य प्राप्त करने के लिए भी उन्हें अपने रिश्तेदारों की हत्या नहीं करनी चाहिए।
यह श्लोक हमें जीवन में कैसे मदद करता है?
यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि कभी-कभी धन, पद और प्रसिद्धि से ज्यादा मानवीय संबंधों का सम्मान करना जरूरी होता है। यह संघर्ष के समय भी नैतिक स्पष्टता बनाए रखने की आवश्यकता को उजागर करता है ताकि हम भविष्य में अपनी आत्मा पर भारी बोझ न लाएं।
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