भगवद्गीता 9.33

Raja Vidya Raja Guhya Yoga · हिन्दी अनुवाद

भगवद्गीता 9.33 — "फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन (परम गति को प्राप्त होते हैं); (इसलिए) इस अन"
भगवद्गीता 9.33 — Raja Vidya Raja Guhya Yoga
संस्कृत

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा | अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ||९-३३||

लिप्यंतरण

kiṃ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā . anityamasukhaṃ lokamimaṃ prāpya bhajasva mām ||9-33||

इस श्लोक का अर्थ क्या है?

भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि पुण्यात्मा ब्राह्मण और राजर्षि जैसे पवित्र व्यक्ति भी भक्ति योग द्वारा मुझे प्राप्त कर लेते हैं, तो यह बात स्वतः सिद्ध है। वे बता रहे हैं कि इस संसार को अनित्य (अस्थायी) और सुखरहित माना जाना चाहिए। इसलिए कृष्ण अर्जुन से विनम्रतापूर्वक आग्रह करते हैं कि वह इन पवित्रों की भक्ति का अनुसरण करके केवल मेरी ही पूजा करें और मुझ पर समर्पित हो जाएं।

इसके पीछे का सिद्धांत

इस श्लोक का सार भगवद गीता के 'भक्तियोग' की मुख्य धारा को दर्शाता है, जहाँ समर्पण (Bhakti) को सबसे ऊच्च और सरल मार्ग माना गया है। यह सिद्धांत बताता है कि जब व्यक्ति इस अनित्य संसार का महत्व नहीं देता ('अनित्यमसुखं लोकम्'), तभी वह परमात्मा की प्राप्ति के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हो सकता है, जो ज्ञान और कर्म दोनों को भी समाहित करता है।

शब्दार्थ
किम् पुनः how much more, ब्राह्मणाः Brahmins, पुण्याः holy, भक्ताः devoted, राजर्षयः royal saints, तथा also, अनित्यम् impermanent, असुखम् unhappy, लोकम् world, इमम् this, प्राप्य having obtained, भजस्व worship, माम् Me
पारंपरिक भाष्य
Rajarshis are kings who have become saints while discharging the duties of the kingdom. It is very difficult to get a human birth which is the means of attaining the goal of life. Being born in this human body you should lead a life of devotion to the Lord. In the human body alone will you have the power to reflect (VicharaSakti), discrimination and dispassion. Even the gods envy the human birth. This body is impermanent. It perishes soon. It brings pain of various sorts. So give up the efforts for securing happiness and comfort for this body. If you do not aim at Selfrealisation even after attaining a human birth, you live in vain you are wasting your life and you are a slayer of the Self. You will again and again be caught in the wheel of birth and death.

यह कहाँ घटित होता है

यह श्लोक महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई 'राजविद्या राजगुह्य योग' (अध्याय 9) में आता है। इससे पहले, कृष्ण ने अपने सर्वव्यापी रूप और समस्त सृष्टि का स्वामित्व प्रदर्शित करके अर्जुन को चमत्कारिक ज्ञान दिया था, जिससे अर्जुन गहरे विचारों में डूब गए थे। इस संदर्भ में कृष्ण यह स्पष्ट करने के लिए बोल रहे हैं कि भक्ति का मार्ग सबसे सरल और शीघ्र फलदायी है, खासकर जब युद्ध की तैयारी के दौरान अर्जुन मानसिक रूप से उद्विग््न थे।

आज के जीवन में

आज के आधुनिक जीवन में कई लोग करियर या पैसे के पीछे भागते हुए निराश और चिंतित हो जाते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि ये सब कुछ अस्थायी है। इस श्लोक का उपयोग करते हुए, जब आप एक बड़ी विफलता (जैसे नौकरी जाने की स्थिति या रिश्तों में दरार) से गुजर रहे हों, तो आपको यह समझना चाहिए कि परिस्थितियां बदलने वाली हैं और इनमें स्थायी सुख नहीं है। इस अहसास के साथ आप अपनी ऊर्जा को बाहर के तनावों की बजाय आंतरिक शांति या अपने मूल्यों (धर्म/भक्ति) पर केंद्रित कर सकते हैं, जो आपको मानसिक स्थिरता देगी।

बच्चों के लिए सरल व्याख्या

कल्पना करो जैसे तुम्हें एक बहुत बड़ा खिलौने वाला खेलघर मिला है, लेकिन वहां सब कुछ टूटा-फूटा है और कभी नहीं ठीक होगा। अगर कोई बहुत अच्छे दोस्त भी कहते हैं कि 'चलो इस बिखरे हुए घर से निकलकर सच्चे प्यार वाले घर चलें', तो तुम उन्हें क्यों मानोगे? भगवान कृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे हैं कि यह दुनिया जल्दी खत्म हो जाती है और असली खुशी नहीं देती, इसलिए हमें अपने सच्चे दोस्त (भगवान) की ओर ध्यान लगाना चाहिए।

दैनिक चिंतन

प्रिय मित्र, जब हम जीवन में बार-बार बदलावों से घबराते हैं तो यह याद रखना आवश्यक है कि यह संसार 'अनित्य' यानी नश्वर है और इसमें स्थायी सुख नहीं मिल सकता। कृष्ण ने आपको एक उज्जवल रास्ता दिखाया है जहाँ आप ब्राह्मणों, ऋषियों और राजर्षियों की तरह पवित्र होकर केवल उनकी भक्ति में ही सच्ची शान्ति पा सकते हैं। आज से नई शुरुआत करते हुए अपने सभी कर्मों को उनके प्रति समर्पित करें और देखें कि कैसे यह एकमात्र आश्रय आपको निरंतर सुख की ओर ले जाता है।

आज के लिए एक अभ्यास

आज इस क्षण में अपने मन को यह समझने दें कि दुनिया का कोई भी सुख स्थायी नहीं है। जब आप निराशा या उदासी के पलों से गुजरते हैं, तो कृष्ण की ओर मुड़कर उनमें ही अपना आश्रय लें और भक्ति भावना को अपने अंतर में जगाएं।

मुख्य शिक्षाएँ

  1. संसार का नश्वर स्वरूप (Anitya Lokam)
    इस श्लोक में कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यह भौतिक लोक 'अनित्य' है, यानी इसका कोई भी सुख या स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहती। जब हम इसे स्थायी समझकर उसमें लगाव रखते हैं, तो निराशा ही बचती है क्योंकि सब कुछ बदलता रहेगा।
  2. भक्ति का महान मार्ग (Bhakti Yoga)
    कृष्ण प्रस्ताव देते हैं कि पुण्यात्माओं और ज्ञानी ऋषियों के लिए यह एकमात्र समाधान है: 'माम् भजस्व' अर्थात मेरी ही पूजा और सेवा में लीन हो जाओ। इससे हमें वह पारमार्थिक सुख मिलता है जो कभी क्षय नहीं होता और न ही दुःख का कारण बनता है।
  3. पुण्यशील भक्तों की गति (Bhaktas Rajarshayah)
    श्लोक में 'ब्राह्मण' और 'राजर्षि' का उल्लेख करके कृष्ण बताते हैं कि ज्ञान और पवित्रता वाले भक्त ही सबसे श्रेष्ठ गति को प्राप्त होते हैं। यह संदेश देता है कि धर्म, ज्ञान और भक्ति के समन्वय से मानव जीवन की सच्ची पूर्णता संभव है।

विषय

भक्ति योग (Bhakti Yoga)अनित्य संसार (Impermanence of World)कर्म और समर्पण (Action and Surrender)पवित्रता का महत्व (Importance of Holiness)मोक्ष की प्राप्ति (Attainment of Liberation)ईश्वर पर भरोसा (Faith in God)

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  1. 2.15 — यह अध्याय इस बात पर चर्चा करता है कि स्थायी सुख के लिए दुःख और सुख दोनों को समान रूप से कैसे देखना चाहिए।
  2. 9.26 — इस श्लोक में कृष्ण बताते हैं कि भक्तिपूर्ण हृदय से दिया गया छोटा सा फल या पुष्प भी उन्हें अत्यंत प्रिय होता है।
  3. 18.65 — अंतिम श्लोकों में कृष्ण पुष्टि करते हैं कि केवल उनमें ही पूर्ण समर्पण करके मानव जाति मोक्ष और असीम शांति प्राप्त कर सकती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह श्लोक सिर्फ ब्राह्मणों या राजर्षियों के लिए है?
नहीं, भगवान कृष्ण इस श्लोक में 'अतएव' (इसलिए) का प्रयोग करके एक तुलना स्थापित करते हैं। यदि इतने पवित्र और उच्च स्थिति वाले व्यक्ति भी भक्ति के लिए ही तत्पर होते हैं, तो यह संकेत है कि इस मार्ग की सार्वभौमिकता और महत्व सभी वर्णों और समाज के हर सदस्य के लिए समान रूप से लागू होती है।
'अनित्य असुखं लोकम्' का क्या अर्थ है?
इसका सरल अर्थ है कि यह विश्व या संसार स्थायी (अनित्य) नहीं है और इसमें वास्तविक, टिकाऊ सुख प्राप्त करना असंभव है। कृष्ण बता रहे हैं कि यदि हम केवल इस बाहरी दुनिया की प्राप्ति पर ध्यान देंगे तो परिणाम निराशाजनक होगा क्योंकि यह सब कुछ क्षणभंगुर है और अंत में विनाश को ही जन्म देता है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश क्या है?
मुख्य संदेश यह है कि भक्ति मार्ग सबसे सरल, तेजस्वी और निश्चित फलदायी साधना है जो सभी को मुक्त करा सकती है। कृष्ण अर्जुन से आग्रह कर रहे हैं कि वे इस पवित्र परंपरा का अनुसरण करें और अपने मन को केवल अपनी ओर (भगवान) ही समर्पित रखें, न कि अनिश्चित संसार में भटके।
क्या कर्म करने की जरूरत नहीं है यदि हम केवल भक्ति करते हैं?
नहीं, यह श्लोक कर्म का खंडन नहीं करता बल्कि उसमें समर्पण (Bhakti) जोड़ता है। गीता के अनुसार, जब आप अपने सभी कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देते हैं और भक्ति भाव से कार्य करते हैं, तो वह कर्म मोक्ष का कारण बन जाता है, न कि बंधन का।
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